समाजख़बर रेप कल्चर को बढ़ावा देते राजनीतज्ञ, मीडिया की चुप्पी और सर्वाइवर का संघर्ष

रेप कल्चर को बढ़ावा देते राजनीतज्ञ, मीडिया की चुप्पी और सर्वाइवर का संघर्ष

भारत में बलात्कार के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। यह केवल एक अपराध तक सीमित नहीं रहें है, बल्कि यह राजनीति का सबसे शक्तिशाली टूल बन चुके हैं। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में रुढ़िवादी मानसिकता वाले लोग और नेता इसे जाति, धर्म, कपड़ों, समय या गलती से जोड़कर सर्वाइवर को ही दोषी ठहरा देते हैं।  

भारत एक ऐसा देश है, जहां यौन हिंसा एक गंभीर समस्या बनी हुई है। जहां कथित बलात्कार की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। गौरतलब है कि  द प्रिंट में छपी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)  की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि, भारत में साल 2021 में बलात्कार के कुल 31,677 मामले, यानी लगभग 86 फीसदी मामले दर्ज किए गए। वहीं उस साल महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 49 मामले हर घंटे दर्ज किए गए थे। इससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि, भारत में बलात्कार के मामले कितने तेज़ी से बढ़ रहे हैं। यह केवल एक अपराध तक सीमित नहीं रहें है, बल्कि यह राजनीति का सबसे शक्तिशाली टूल बन चुके हैं। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में रुढ़िवादी मानसिकता वाले लोग और नेता इसे जाति, धर्म, कपड़ों, समय या गलती से जोड़कर सर्वाइवर को ही दोषी ठहरा देते हैं।  

इसका एक उदाहरण, हाल ही में एक विधायक का बलात्कार को धार्मिक ग्रंथों से जोड़ने वाले बयान को देखा जा सकता है। ऐसे बयान किसी एक व्यक्ति की निजी सोच भर नहीं होते, बल्कि वे उस रुढ़िवादी पितृसत्तात्मक संरचना को सामने लाते हैं, जिसमें महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश की जाती है। ऐसे में जब देश का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता या विधायक ही हिंसा को धर्म, संस्कृति या इतिहास से जोड़ते हैं, तब वे न केवल अपराध की गंभीरता को कम करते हैं, बल्कि एक ऐसी रेप कल्चर को भी मज़बूत करते हैं। जिसमें दोष सर्वाइवर पर और सहानुभूति अक्सर अपराधी या व्यवस्था के साथ खड़ी दिखती है। 

बीते दिनों मध्य प्रदेश में उस समय राजनीतिक विवाद शुरू हो गया, जब एक वीडियो सामने आया। जिसमें कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया को बलात्कार को धार्मिक ग्रंथों से जोड़ते हुए देखा गया।

राजनीतज्ञों के बयान और बलात्कार का सामान्यीकरण

बीते दिनों मध्य प्रदेश में उस समय राजनीतिक विवाद शुरू हो गया, जब एक वीडियो सामने आया। जिसमें कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया को बलात्कार को धार्मिक ग्रंथों से जोड़ते हुए देखा गया। इंडिया टुडे में छपी एक खबर के मुताबिक, वीडियो में उन्हें यह कहते हुए सुना जा सकता है कि भारत में बलात्कार के सबसे अधिक मामले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अधिकांश अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों में होते हैं। हालांकि जब कोई पुरुष, चाहे उसकी मानसिक स्थिति कैसी भी हो, सड़क पर चलते हुए किसी बेहद खूबसूरत महिला को देखता है, तो उसका दिमाग विचलित हो सकता है और बलात्कार हो सकता है।

लेकिन आदिवासियों, अनुसूचित जनजातियों और ज्यादातर अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों में ऐसी खूबसूरत महिलाएं हैं क्या? बलात्कार क्यों होता है? क्योंकि धार्मिक ग्रंथ ऐसे निर्देश देते हैं। इसके बाद उन्होंने अपने बयान को सही ठहराने के लिए धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए कहा कि, वह हिंदू धर्मग्रंथों के बारे में कोई विशिष्ट या विशेष टिप्पणी नहीं करना चाहते, लेकिन उनका तात्पर्य यह है, कि ग्रन्थों में लिखा है कि ऐसा करने पर व्यक्ति को तीर्थयात्रा का फल मिलता है। अगर कोई तीर्थयात्रा पर नहीं जा सकता, तो उसे घर पर रहकर उनकी महिलाओं के साथ यौन हिंसा करके वही फल प्राप्त करने का विकल्प दिया गया है। वीडियो के सामने आने के बाद कई लोग उनके बयान की आलोचना कर रहे हैं और उन्हें निलंबित करने की मांग कर रहे हैं।

भारत में बलात्कार के सबसे अधिक मामले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अधिकांश अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों में होते हैं। हालांकि जब कोई पुरुष, चाहे उसकी मानसिक स्थिति कैसी भी हो, सड़क पर चलते हुए किसी बेहद खूबसूरत महिला को देखता है, तो उसका दिमाग विचलित हो सकता है और बलात्कार हो सकता है।

भारत में यह इकलौती घटना नहीं है, इससे पहले भी कई नेताओं ने इस तरह की टिप्पणियां की हैं। उदाहरण के लिए, बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी एक खबर के मुताबिक, साल 2014 में समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि ‘लड़के तो लड़के होते हैं, उनसे गलती हो जाती है।’ और बलात्कार के लिए फांसी की सजा को बहुत कठोर बताया। इसके अलावा हाल ही में कर्नाटक कांग्रेस विधायक रमेश कुमार केसाल 2021 के एक पुराने बयान, जब बलात्कार अपरिहार्य हो तो लेट जाओ और मजा लो ने फिर से विवाद खड़ा किया। इस तरह के बयान पितृसत्तात्मक मानसिकता को सामने लाते हैं, जो बलात्कार को युवावस्था की भूल या सामाजिक गलती मानती है।

यौन हिंसा से हाशिए के समुदायों को दबाना

भारत में हाशिए पर रह रहे समुदाय के व्यक्तियों के बीच डर पैदा करने के लिए यौन हिंसा को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जबकि कई मामलों में, जाति और धर्म के आधार पर ही प्रतिक्रिया तय की जाती है, कि वो अपराध हुआ है या नहीं। उदाहरण के लिए, टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपी एक खबर के मुताबिक, साल 2017 में उन्नाव में एक नाबालिग लडकी का सामूहिक बलात्कार हुआ था, जिसमें एक विधायक कुलदीप सिंह सेंगर भी उसमें शामिल था। शुरुआत में इस मामले में कार्रवाई न के बराबर हुई थी। यहां तक कि साल 2018 में सर्वाइवर के पिता को ही किसी झूठे केस में हिरासत में ले लिया गया और जेल में उनकी मृत्यु हो गई। इस मामले में दोषी को सजा मिलने में 2 साल का वक्त लग गया उसके बाद आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इसी तरह साल 2018 में कश्मीर के कठुआ जिले में आठ वर्षीय मुस्लिम बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या की घटना सामने आई। 

साल 2018 में कश्मीर के कठुआ जिले में आठ वर्षीय मुस्लिम बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या की घटना सामने आई। अलजज़ीरा में छपी खबर के मुताबिक, सर्वाइवर पर हुआ हमला इसलिए हुआ क्योंकि वह मुस्लिम बकरवाल समुदाय से थी। इस घटना के सुर्खियों में आने से पहले, बकरवाल समुदाय को कथित हिंदू बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों के दबाव का सामना करना पड़ा।ताकि वे इस बारे में आवाज़ न उठाएं।

अलजज़ीरा में छपी खबर के मुताबिक, आधिकारिक जांच से पहले ही यह साफ हो गया था कि सर्वाइवर पर हुआ हमला इसलिए हुआ क्योंकि वह मुस्लिम बकरवाल समुदाय से थी। इस घटना के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आने से पहले, बकरवाल समुदाय को कथित हिंदू बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों के दबाव का सामना करना पड़ा।ताकि वे इस बारे में आवाज़ न उठाएं। गौरतलब है कि इस मामले के दोषियों की गिरफ्तारी के बाद, उनके समर्थन में विरोध प्रदर्शन किए ताकि उन्हें रिहाई मिल सके। हिंदू एकता मंच जैसे संगठन उनका समर्थन कर रहे थे, और यह सब कथित तौर पर भाजपा के कुछ मंत्रियों की मौजूदगी में हुआ। इसी तरह साल 2020 हाथरस गैंगरेप में दलित महिला पर कथित स्वर्ण जाति के लोगों ने हमला किया और पुलिस ने जल्दबाजी में शव जला दिया। इन उदाहरणों से साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह सत्ताधारी दल अपने लोगों को बचाने की कोशिश करते हैं। 

मीडिया कवरेज की असमान राजनीति

मीडिया कवरेज इससे जुड़ा हुआ एक ज़रूरी पहलु है, इसमें यह तय किया जता है कि किसकी घटना को बलात्कार माना जाएगा और किस को नज़रंदाज़ किया जाएगा। यहां सर्वाइवर की जाति, धर्म, वर्ग और सामाजिक स्थिति निर्णायक भूमिका निभाती है। जैसे हाथरस जैसे मामलों में दलित और ग्रामीण सर्वाइवर को शुरू में कम कवरेज मिला, जिस कारण घटना के बाद पहले 10 दिनों तक अपराधियों की कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। जबकि निर्भया जैसे शहरी मामलों में पूरे देश में एकदम बड़े आंदोलन खड़े हो जाते हैं। द न्यूज़ मिनट में साल 2021 में छपे मीडिया एक्शन अगेंस्ट रेप (एमएएआर) के  किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि ज़्यादातर समाचार पत्र ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाओं को प्राथमिकता देते हैं। सर्वेक्षण में शामिल समाचार पत्रों में से 49 फीसदी ने शहरी क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाओं को प्राथमिकता दी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में घटी घटनाओं पर केवल 22 फीसदी समाचार पत्रों ने ही ध्यान दिया।

द न्यूज़ मिनट में साल 2021 में छपे मीडिया एक्शन अगेंस्ट रेप के किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि ज़्यादातर समाचार पत्र ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाओं को प्राथमिकता देते हैं।

साक्षात्कार में शामिल 22.2 फीसदी पत्रकारों का मानना था कि उन्हें जिन भी बलात्कार मामलों की जानकारी मिलती है, वे सभी खबर के रूप में छाप दी जाती हैं। इसके बाद 20.6 फीसदी पत्रकारों ने कहा कि अगर मामला हाई-प्रोफाइल हो यानी उसमें कोई प्रभावशाली या प्रसिद्ध व्यक्ति शामिल हो,तो उसके छपने की संभावना बढ़ जाती है।इसके अलावा, 16.7 फीसदी पत्रकारों के मुताबिक कानून-व्यवस्था से जुड़ा पहलू खबर बनने में ज़रूरी  होता है। जबकि 14 फीसदी ने मामले की गंभीरता, 13.2 फीसदी ने स्थानीयता और 7 फीसदी ने संपादक के फैसले को कारण बताया। खास तौर पर दक्षिण भारत से आए जवाबों में, कानून-व्यवस्था से जुड़े कारण 20 फीसदी से भी ज़्यादा रहे। इसके अलावा बलात्कार से जुड़ी खबरों में से करीब 39 फीसदी रिपोर्टें हमले के विवरण पर ही केंद्रित थीं, जिनमें घटना से पहले क्या हुआ, इस पर ज़्यादा ध्यान दिया गया।

वहीं केवल 9 फीसदी रिपोर्टों में ही यौन हिंसा को एक सामाजिक समस्या के रूप में देखा गया। यह आंकड़े दिखाते हैं कि मीडिया में बलात्कार की खबरें छपने का फैसला अक्सर सर्वाइवर की ज़रूरत या न्याय से ज़्यादा, खबर के महत्व और संस्थागत प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है। इस समस्या से निपटने के लिए बलात्कार की घटनाओं को राजनीति से अलग करके देखा जाना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है। इसके लिए प्रशासन को जल्दी और निष्पक्ष न्याय करने की ज़रूरत है। इसके साथ ही नेताओं और पुलिस की संवेदनशीलत का होना बहुत ज़रूरी है, ताकि लोग बिना डरे अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा सकें । इसके अलावा  पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देने वाली शिक्षा की जरूरत है ताकि लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें। मीडिया को भी हर मामले पर बराबरी से कवरेज देने की ज़रूरत है, ताकि हर सर्वाइवर की आवाज़ सुनी जा सके, जब तक दोषियों को बचाने, गलत बयानों और चुनिंदा कवरेज पर रोक नहीं लगेगी, तब तक एक समावेशी और सुरक्षित समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है ।  

About the author(s)

मेरा नाम सविता है और मैं हिमाचल प्रदेश से हूँ । मैंने एक साल का जेंडर फेलोशिप प्रोग्राम हिमाचल क्वीयर फाउंडेशन के साथ पूरा किया है। इसके अलावा, मुझे 'बोबो दियां गल्लां' ग्रामीण पत्रकारिता में एक साल का अनुभव है। मुझे  कहानियाँ और कविताएँ लिखना बहुत अच्छा लगता है और साथ ही तस्वीरें लेने का भी बहुत शौक है।

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