वैश्विक स्तर पर महिलाओं को हेल्थ केयर तक पहुंचने में ज़्यादा रुकावटों का सामना करना पड़ता है, जिससे वे ड्रग-रेसिस्टेंट इन्फेक्शन से होने वाली दिक्कतों के प्रति ज़्यादा कमज़ोर हो जाती हैं। इन रुकावटों के पीछे बायोलॉजिकल, सोशल, कल्चरल और इकोनॉमिक फैक्टर्स का एक जटिल मिश्रण है। कई कम आय वाले इलाकों में, खाना बनाने, देखभाल करने और पानी इकट्ठा करने में महिलाओं और लड़कियों की भूमिका उन्हें ड्रग-रेसिस्टेंट पैथोजन के संपर्क में ज़्यादा ला सकती है। महिलाएं ग्लोबल हेल्थ वर्कफोर्स का 70 फीसद हिस्सा भी बनाती हैं, जिससे वे खतरनाक पैथोजन के संपर्क में आती हैं। यौन हिंसा की ज़्यादा दरें भी महिलाओं में ड्रग-रेसिस्टेंट यौन संचारित संक्रमणों के बढ़ते जोखिम का कारण बन सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के अनुमान अनुसार साल 2019 में बैक्टीरियल एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) सीधे तौर पर दुनिया भर में 1.27 मिलियन मौतों के लिए ज़िम्मेदार था और 4.95 मिलियन मौतों में इसका योगदान था।
नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट अनुसार यह अनुमान लगाया गया है कि साल 2025 से 2050 तक एएमआर से लगभग 39 मिलियन मौतें होंगी। एएमआर हेल्दी माइक्रोबायोम कॉन्सेप्ट का भी एक हिस्सा है। लेकिन स्वास्थ्य के लिए इसके महत्व के बावजूद, इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस लिंग सहित सामाजिक-जनसांख्यिकीय ग्रेडिएंट्स के साथ कैसे फैला हुआ है, जो हस्तक्षेपों को लक्षित करने में मदद कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने एएमआर रिसर्च के लिए कहा है जिसमें जेंडर और सामाजिक-जनसांख्यिकीय विचारों को शामिल किया जाए और महिलाओं को एएमआर के संपर्क में आने के संभावित बढ़े हुए जोखिम पर प्रकाश डाला है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने एएमआर रिसर्च के लिए कहा है जिसमें जेंडर और सामाजिक-जनसांख्यिकीय विचारों को शामिल किया जाए और महिलाओं को एएमआर के संपर्क में आने के संभावित बढ़े हुए जोखिम पर प्रकाश डाला है।
एएमआर क्यों है खतरनाक
एएमआर उस स्थिति को कहते हैं जब बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी जैसे सूक्ष्म जीवाणु दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। यानी जो दवा पहले इन सूक्ष्म जीवाणुओं से होने वाले संक्रमणों को ठीक करती थी, अब वह शरीर पर असर नहीं करती। जब एक साधारण संक्रमण का इलाज नहीं हो पाता, तो वह जानलेवा भी बन सकता है। यह समस्या मुख्य रूप से एंटीबायोटिक्स और अन्य दवाओं के अधिक और गलत इस्तेमाल से पैदा होती है। भारत में लोगों का बीमार होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के फार्मेसी या दवाई की दुकानों से एंटीबायोटिक्स खरीदकर खाना आम हो चुका है। जब एंटीबायोटिक्स बार-बार और गलत तरीके से लोग बिना डॉक्टर की सलाह के खाते हैं, तो कुछ सूक्ष्म जीवाणु जीवित रह जाते हैं और वे उन दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। ये प्रतिरोधी जीवाणु फिर तेजी से फैलते हैं और आम एंटीबायोटिक्स से खत्म नहीं हो पाते। डबल्यूएचओ के अनुसार जेंडर का संबंध डायग्नोसिस और इलाज में बड़े अंतर से भी है।
महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अपने पूरे जीवन में एंटीबायोटिक्स मिलने की संभावना 27 फीसद ज़्यादा होती है। महिला डॉक्टर अपने पुरुष साथियों की तुलना में एंटीबायोटिक्स प्रिस्क्राइब करने के लिए ज़्यादा सतर्क ‘इंतज़ार करो और देखो’ वाला तरीका अपनाती हैं। डबल्यूएचओ बताती है कि पुरुष फार्मासिस्ट के एंटीबायोटिक्स का सबसे अच्छा इस्तेमाल कैसे करें, इस बारे में दी गई सलाह को उनकी महिला सहकर्मियों की सलाह की तुलना में ज़्यादा स्वीकार किया जाता है। इसके अलावा, सांस्कृतिक नियम जो महिलाओं की फ़ैसले लेने की शक्ति और वित्तीय आज़ादी को सीमित करते हैं, अक्सर उन्हें सेल्फ-डायग्नोसिस और गलत इलाज की ओर धकेलते हैं, जिससे प्रतिरोधी इन्फेक्शन के बने रहने की समस्या और बढ़ जाती है।
महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अपने पूरे जीवन में एंटीबायोटिक्स मिलने की संभावना 27 फीसद ज़्यादा होती है। महिला डॉक्टर अपने पुरुष साथियों की तुलना में एंटीबायोटिक्स प्रिस्क्राइब करने के लिए ज़्यादा सतर्क ‘इंतज़ार करो और देखो’ वाला तरीका अपनाती हैं।
महिलाओं पर एएमआर का असर
एएमआर एक वैश्विक स्वास्थ्य समस्या है, लेकिन इसका असर सभी पर एक जैसा नहीं होता। महिलाएं और लड़कियां इस संकट से ज़्यादा प्रभावित होती हैं। यह फर्क सिर्फ़ आंकड़ों में नहीं, बल्कि महिलाओं के रोज़मर्रा के जीवन और स्वास्थ्य अनुभवों में साफ़ दिखता है। खासकर उन इलाकों में, जहां स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित है। महिलाओं का शरीर, उनके हार्मोनल बदलाव और जीवन के अलग-अलग चरण उन्हें संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं। जब एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर देती हैं, तो महिलाओं में होने वाले आम संक्रमण—जैसे मूत्र मार्ग संक्रमण (यूटीआई), श्वसन तंत्र के संक्रमण और प्रजनन अंगों से जुड़ी बीमारियां गंभीर रूप ले लेती हैं। जो बीमारी पहले कुछ दिनों में ठीक हो जाती थी, वह अब हफ्तों या महीनों तक चल सकती है। कई बार हालत इतनी बिगड़ जाती है कि अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है।
इसके पीछे कुछ जैविक कारण भी हैं। महिलाओं की शारीरिक बनावट उन्हें कुछ संक्रमणों के प्रति स्वाभाविक रूप से अधिक असुरक्षित बनाती है। अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं में यूटीआई होने की संभावना पुरुषों की तुलना में लगभग 30 गुना अधिक होती है। इसकी एक वजह यह है कि महिलाओं की पेशाब की नली (यूरेथ्रा) बहुत छोटी होती है। ये लगभग 1 से 2 इंच होती है जबकि पुरुषों में यह करीब 6 इंच लंबी होती है। छोटी नली होने के कारण बैक्टीरिया को मूत्राशय तक पहुंचने में कम समय लगता है। इसके अलावा, महिलाओं की यूरेथ्रा मलद्वार के क़रीब होती है और उनके जननांग बाहरी वातावरण के ज़्यादा संपर्क में रहते हैं। इससे बैक्टीरिया के संक्रमण का ख़तरा और बढ़ जाता है।
द लैंसेट के अनुसार, साल 2050 तक दुनिया भर में एंटीबायोटिक-रेसिस्टेंट संक्रमणों की वजह से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 39 करोड़ लोगों की मौत हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हमारे देश में करीब 29.9 लाख लोगों की मौत सेप्सिस के कारण हुई है। सेप्सिस को आम भाषा में ब्लड पॉइज़निंग कहा जाता है।
वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य कार्यबल में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं। नर्स, आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सफाई कर्मचारी और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के रूप में महिलाएं रोज़ाना खतरनाक रोगाणुओं के संपर्क में आती हैं। अस्पताल और क्लीनिक ऐसे स्थान हैं जहां दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया सबसे अधिक पाए जाते हैं, और इन जगहों पर काम करने वालों में ज़्यादातर महिलाएं ही होती हैं। इसके बावजूद, महिला स्वास्थ्य कर्मियों को अक्सर पर्याप्त सुरक्षा उपकरण नहीं मिलते। पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट—जैसे दस्ताने, मास्क, गाउन, फेस शील्ड और जूता कवर; संक्रमण से बचाने के लिए ज़रूरी होते हैं। भारत में कोविड महामारी से पहले हुए अध्ययनों में यह सामने आया था कि उच्च जोखिम वाले अस्पताल क्षेत्रों में भी एन-95 मास्क की उपलब्धता सीमित थी।
जैविक कारणों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां भी महिलाओं को एएमआर के खतरे में डालती हैं। कम आय वाले परिवारों में घर का ज़्यादातर अवैतनिक काम महिलाएं ही करती हैं। खाना बनाना, बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल करना, सफाई करना और पानी लाने जैसे काम मुख्य रूप से उनकी जिम्मेदारी होती है। इन सभी कामों के दौरान उनका संपर्क बार-बार दवा-प्रतिरोधी जीवाणुओं से होता है। जब महिलाएं घर में किसी बीमार व्यक्ति की देखभाल करती हैं, सफाई का काम करती हैं या दूषित पानी के स्रोतों से पानी लाती हैं, तो इन खतरनाक जीवाणुओं के शरीर में प्रवेश का जोखिम बढ़ जाता है।
एएमआर के मामले में देश की स्थिति
द प्रिन्ट में मेडिकल पत्रिका द लैंसेट की रिपोर्ट आधारित खबर अनुसार साल 2019 में भारत में एंटीबायोटिक-रेसिस्टेंट सुपरबग्स की वजह से 10.4 लाख तक मौतें हुईं। रिपोर्ट बताती है कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (ग्राम) प्रोजेक्ट पर नई ग्लोबल रिसर्च के अनुसार, उस साल देश में बैक्टीरियल एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की वजह से 3 से 10.4 लाख लोगों की मौत हुई। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया अब एंटीबायोटिक्स पर प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। द लैंसेट के अनुसार, साल 2050 तक दुनिया भर में एंटीबायोटिक-रेसिस्टेंट संक्रमणों की वजह से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 39 करोड़ लोगों की मौत हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हमारे देश में करीब 29.9 लाख लोगों की मौत सेप्सिस के कारण हुई है। सेप्सिस को आम भाषा में ब्लड पॉइज़निंग कहा जाता है।
वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य कार्यबल में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं। नर्स, आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सफाई कर्मचारी और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों के रूप में महिलाएं रोज़ाना खतरनाक रोगाणुओं के संपर्क में आती हैं।
इसमें शरीर किसी संक्रमण पर बहुत ज़्यादा प्रतिक्रिया करता है, जिससे मरीज की हालत गंभीर हो जाती है। एएमआर के कारण सेप्सिस का इलाज अब और भी मुश्किल हो गया है। इसी वजह से एएमआर को एक बड़ी वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति माना जा रहा है। ये आंकड़े इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस रिसर्च एंड सर्विलांस नेटवर्क (IAMRSN) की हाल ही में जारी वार्षिक रिपोर्ट के बाद सामने आए हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2017 से 2023 के बीच देश के 21 बड़े अस्पतालों में सुपरबग्स की मौजूदगी बढ़ी है। सुपरबग्स ऐसे कीटाणु होते हैं जो कई एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं दिखाते, जिससे इनका इलाज करना बहुत कठिन हो जाता है।
महिलाओं में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां और एएमआर
महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। परिवार में निर्णय लेने की कमी और आर्थिक निर्भरता के कारण वे अक्सर अपना इलाज टाल देती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों की दूरी, परिवहन की कमी और सामाजिक झिझक भी समय पर इलाज में रुकावट बनती है। इलाज न मिलने पर कई महिलाएं बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं ले लेती हैं, जिससे एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस बढ़ता है। गर्भावस्था के दौरान संक्रमण का खतरा अधिक होता है, लेकिन एएमआर के कारण अब इनका इलाज कठिन हो गया है, जिससे माँ और नवजात दोनों का जोखिम बढ़ता है। गंभीर बीमारियों, सर्जरी और कैंसर के इलाज में भी एंटीबायोटिक की भूमिका अहम है। जब दवाएं असर नहीं करतीं, तो इलाज जटिल हो जाता है। हालांकि डबल्यूएचओ ने एएमआर और जेंडर के संबंध को स्वीकार किया है, लेकिन नीतियों में महिलाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। एएमआर से निपटने के लिए महिलाओं को केंद्र में रखना, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देना और उन्हें अपने स्वास्थ्य से जुड़े फैसले लेने का अधिकार देना बेहद ज़रूरी है।

