समाजख़बर जेंडर बजट के बावजूद क्यों पीछे रह जाती हैं महिलाएं?

जेंडर बजट के बावजूद क्यों पीछे रह जाती हैं महिलाएं?

बजट में महिला उद्यमिता के लिए शी-मार्ट (SHE-सेल्फ हेल्प एंटरप्रेन्योर मार्ट) की घोषणा एक नई योजना है जिसका प्रचार जोर-शोर से किया जा रहा है। यह 2023 में केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई लखपति दीदी योजना का ही एक विस्तार है।

भारत का 2026–27 का केंद्रीय बजट ऐसे समय में आया है जब देश में महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी में कमी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 में भारत 148 देशों में 131वें स्थान पर था, जो पिछले साल के तुलना में 2 स्थान और नीचे था। ऐसे में केंद्रीय बजट में जेंडर बजटिंग को लेकर काफ़ी उम्मीदें थी। हालांकि सरकार ने इस बजट में महिलाओं के लिए जेंडर बजट में बढ़ोत्तरी तो की है लेकिन यह सवाल अभी भी कायम है कि यह बढ़ोत्तरी ज़मीनी स्तर तक बदलाव लाने में कामयाब होगी या फिर महज कागजों तक सीमित होकर रह जाएगी?

कर्तव्य भवन में बना 2026-27 का यह बजट केवल यह नहीं बताता कि सरकार महिलाओं के लिए कितना खर्च कर रही है बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि महिलाओं को आर्थिक विकास का कितना लाभ मिल रहा है। इसमें पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की हिस्सेदारी और भागीदारी बढ़ाने के दावे तो किए गए हैं लेकिन महिलाओं की सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दे की अनदेखी भी दिख रही है।

महिलाओं और बच्चों के लिए काम करने वाले महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट 2026–27 में बढ़कर ₹28,183 करोड़ हो गया है, जो कि 2025-26 में 26,889.69 करोड़ था। हालांकि 2025-26 के दौरान बजट का सिर्फ़ ₹24,373 करोड़ ही खर्च हो पाया था।

जेंडर बजटिंग से जुड़े ज़रूरी आंकड़े 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार महिलाओं और लड़कियों के लिए इस साल का बजट 5 लाख करोड़ कर दिया गया है, जो कि 2025–26 के ₹4.49 लाख करोड़ से लगभग 11.36 फीसद ज़्यादा है। कुल बजट में ख़ासतौर पर महिलाओं का हिस्सा अब 9.37 फीसद तक पहुंच गया है, जबकि पिछले साल यह कुल बजट का 8.86 फीसद था। बजट दस्तावेज़ में ₹5 लाख करोड़ को जेंडर-रिस्पॉन्सिव खर्च बताया गया है। बजट में यह बढ़ोत्तरी महिलाओं के लिए ख़ासतौर पर चलाई जाने वाली नई योजनाओं और पहले से चल रही कुछ योजनाओं में आवंटन बढ़ाने की वजह से हुई है। महिलाओं और बच्चों के लिए काम करने वाले महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट 2026–27 में बढ़कर ₹28,183 करोड़ हो गया है, जो कि 2025-26 में 26,889.69 करोड़ था। हालांकि 2025-26 के दौरान बजट का सिर्फ़ ₹24,373 करोड़ ही खर्च हो पाया था।

इस तरह से देखा जाए तो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बजट आवंटन में लगभग 15 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह महिलाओं के लिए पहले से चल रही मुख्य योजनाओं में बजट का मिला-जुला असर देखने को मिलता है। सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 को इस बार ₹23,100 करोड़ मिले हैं, जो पिछले साल यानी 2025-26 के ₹20,949 करोड़ से करीब 10 फीसद ज़्यादा है। इसी प्रकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए चल रहे मिशन शक्ति योजना को ₹3,605 करोड़ तय किए गए, जो पिछले साल ₹3,150 करोड़ थे। हालांकि इसके मुकाबले उच्च शिक्षा विभाग का बजट ₹50,078 करोड़ से बढ़कर ₹55,727 करोड़ हो गया, लेकिन इसका सीधा लाभ लड़कियों को नहीं मिल पाता है बल्कि बहुत छोटा हिस्सा ही उन तक पहुंच पाता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार महिलाओं और लड़कियों के लिए इस साल का बजट 5 लाख करोड़ कर दिया गया है, जो कि 2025–26 के ₹4.49 लाख करोड़ से लगभग 11.36 फीसद ज़्यादा है। कुल बजट में ख़ासतौर पर महिलाओं का हिस्सा अब 9.37 फीसद तक पहुंच गया है, जबकि पिछले साल यह कुल बजट का 8.86 फीसद था।

शिक्षा और स्किल से जुड़े प्रावधान

महिलाओं के लिए बजट में की गई सबसे बड़ी घोषणाओं में से एक है हर जिले में लड़कियों के लिए हॉस्टल उपलब्ध कराना। इसके लिए भारत के 806 जिलों में हर एक में कम से कम एक गर्ल्स हॉस्टल का लक्ष्य रखा गया है। इसका मकसद है महिलाओं की उच्च शिक्षा और रोजगार की राह में आने वाली सबसे बड़ी बाधा को दूर करना है। हर जिले में हॉस्टल होने से छोटे शहरों और गांव की महिलाओं को सस्ते में सुरक्षित आवास मुहैया कराया जा सकता है। इससे ड्रॉप आउट रेट कम होने की संभावना जताई जा रही है। अगर इसे ठीक तरीके से लागू किया गया तो इससे लड़कियों की कम उम्र में शादी पर भी रोक लगाई जा सकती है। इसके साथ ही कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मदद मिलेगी।

देश में आमतौर पर बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और बच्चों की देखभाल का काम महिलाओं पर डाल दिया जाता है। इसके लिए उन्हें किसी भी तरह का मेहनताना नहीं मिलता है। इस बार के बजट में 1.5 लाख मल्टी स्किल्ड महिला केयरगिवर्स को प्रशिक्षित करने की योजना भी है। इसका मकसद है इस तरह के देखभाल वाले काम करने वाली महिलाओं को रोजगार से जोड़ना। इससे देखभाल वाले काम को आर्थिक रूप से महत्त्व मिलेगा और यह देश के आर्थिक विकास में भी सहायक साबित हो सकता है।

महिलाओं के लिए बजट में की गई सबसे बड़ी घोषणाओं में से एक है हर जिले में लड़कियों के लिए हॉस्टल उपलब्ध कराना। इसके लिए भारत के 806 जिलों में हर एक में कम से कम एक गर्ल्स हॉस्टल का लक्ष्य रखा गया है।

महिला उद्यमिता और रोजगार 

बजट में महिला उद्यमिता के लिए शी-मार्ट (SHE-सेल्फ हेल्प एंटरप्रेन्योर मार्ट) की घोषणा एक नई योजना है जिसका प्रचार जोर-शोर से किया जा रहा है। यह 2023 में केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई लखपति दीदी योजना का ही एक विस्तार है। यह पहले से ही देश भर में चल रहे स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग को बढ़ावा देने का काम करेगा। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के लिए लोकप्रिय मनरेगा योजना जिसे अब विकसित भारत जीरामजी योजना में बदल दिया गया है। इसके तहत काम के दिन साल भर में 100 से बढ़कर 125 कर दिए गए हैं। कुल ग्रामीण रोजगार का बजट इस साल ₹1.25 लाख करोड़ रखा गया है, जो पिछले साल से 43 फीसद ज़्यादा है। ग़ौरतलब है कि ग्रामीण रोजगार योजना की लाभार्थी आदि से ज्यादा महिलाएं होती हैं। इसलिए माना जा रहा है कि यह अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं को फायदा पहुंचाएगी। हालांकि पहले इसका पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी जबकि अब इसे बदल दिया गया है। अब ग्रामीण रोजगार के तहत होने वाले कुल खर्च का 60 फीसद केंद्र सरकार जबकि 40 फीसद राज्यों को उठाना पड़ेगा। इस प्रावधान की वजह से राज्यों में इसे ठीक से लागू होने में कठिनाई आ सकती है।

बजट में शहरी और औद्योगिक रोजगार में महिलाओं के लिए कोई ख़ास प्रावधान नहीं किया गया है। हालांकि एम्प्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव (ELI) योजना में 3.5 करोड़ नौकरियों की बात कही गई है। लेकिन इनमें महिलाओं के लिए आरक्षण या अलग से कोई प्रावधान नहीं है। देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम करने वाले मजदूरों का लगभग एक तिहाई हिस्सा महिलाएं हैं। इसी तरह टेक सेक्टर में भी महिलाओं की हिस्सेदारी 30 फीसद के करीब है। इसके बावजूद इन क्षेत्रों में उनके लिए कोई ख़ास योजना नहीं है। हालांकि STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथमेटिक्स) फील्ड में महिलाओं के हिस्सेदारी बढ़ाने की बात बजट में की गई है लेकिन उसके लिए किसी ख़ास योजना या लक्ष्य की कमी नज़र आती है। 

बजट में महिला उद्यमिता के लिए शी-मार्ट (SHE-सेल्फ हेल्प एंटरप्रेन्योर मार्ट) की घोषणा एक नई योजना है जिसका प्रचार जोर-शोर से किया जा रहा है। यह 2023 में केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई लखपति दीदी योजना का ही एक विस्तार है।

बजट की चुनौतियां और सीमाएं

साल 2026-27 के इस बजट में महिलाओं के लिए कई सकारात्मक घोषणाएं की गई है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाने में सक्षम होंगी? जेंडर बजट का आकार बढ़ना एक अच्छी पहल है। लेकिन, इसका एक बड़ा हिस्सा पहले से ही चल रही योजनाओं में जा रहा है। द हिंदू में प्रकाशित जेंडर गैप रिपोर्ट के अनुसार देश में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 10 गुना ज़्यादा घरेलू अवैतनिक काम करना पड़ता है, जिसका उन्हें न तो कोई भुगतान मिलता है न ही कोई इन्सेंटिव, इन कामों को उनकी ज़िम्मेदारी समझी जाती है भले ही महिला वर्किंग हो। इसके बावजूद महिलाओं के अवैतनिक घरेलू काम, सुरक्षा, समानता और स्वतंत्रता जैसे बुनियादी मुद्दों के बारे में बजट लगभग चुप है। शी मार्ट योजना पहले से ही चल रहे स्वयं सहायता समूहों से ज़्यादा अलग नहीं है।

न ही इसके बारे में कोई निश्चित धनराशि या समय सीमा का प्रावधान किया गया है जिससे ठीक समय पर समीक्षा की जा सके। इसी तरह प्रत्येक जिले में एक हॉस्टल की जो घोषणा की गई है उसमें भी किसी समय सीमा का पाबंदी नहीं है साथ ही अलग से बजट का आवंटन भी नहीं किया गया है। द प्रिंट में प्रकाशित ख़बर में अपने 9वें ऐतिहासिक बजट भाषण के दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, “मैं महिलाओं को कर्ज़ पर आधारित आजीविका से आगे ले जाकर, उन्हें अपने व्यवसाय की मालिक बनाने की दिशा में काम करना चाहती हूँ।” वित्त मंत्री के ऐसे बयान के बावजूद बजट में महिलाओं के लिए आसान ऋण या सब्सिडी उपलब्ध कराने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इसी तरह एआई, आईटी और स्टेम जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात की गई है पर इसके लिए कोई ठोस योजना मौजूद नहीं है। 

आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, घरेलू कामगार और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की न्यूनतम आय, पेंशन, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए कोई ठोस व्यवस्था इस बजट में नजर नहीं आती। महिलाओं की विशेष ज़रूरतें मुख्यधारा की योजनाओं में दब जाती हैं। बिना स्पष्ट लक्ष्य और नतीजा मापने की व्यवस्था के महिला सशक्तीकरण के लिए बजट में की गई बातें लोक लुभावन वादे के सिवा कुछ भी नहीं हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यह बजट महिलाओं को लाभार्थी के तौर पर तो देखा है लेकिन आर्थिक विकास में बराबर का साझेदार बनाने में पीछे रह जाता है। यह बजट पिछले साल की तुलना में थोड़ा आगे ज़रूर बढ़ा है लेकिन महिलाओं की ग़ैर बराबरी को ख़त्म करने के लिए अभी लम्बा रास्ता तय करना बाकी है।

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