मुख्यधारा की हिंदी सिनेमा में जब भी मजबूत स्त्री की बात होती है, वह अक्सर या तो अपवाद बनाकर पेश की जाती है या फिर एक ऐसे नैरेटिव में बांध दी जाती है जहां उसकी ताक़त पितृसत्तात्मक ढांचे की स्वीकृति से मापी जाती है। महिला का गुस्सा, उसका नैतिक द्वंद्व और उसकी थकान, इन सबके लिए वहां बहुत कम जगह होती है। पुलिस वर्दी में दिखाई देने वाली स्त्री अक्सर या तो प्रतीक भर रह जाती है या फिर एक रोमांचक फैंटेसी, जिसमें व्यवस्था की जटिलताएं हाशिए पर चली जाती हैं। हिंदी सिनेमा में मर्दानी सीरीज उन गिनी-चुनी फिल्मों में है, जो महिला केंद्रित होने के साथ-साथ सत्ता, हिंसा और पितृसत्तात्मक सोच पर सीधा सवाल उठाती है। यह सीरीज़ सिर्फ़ एक मज़बूत महिला पुलिस अफ़सर की कहानी नहीं कहती, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करती है, जहां लड़कियों की सुरक्षा और ज़िंदगी को अब भी प्राथमिकता नहीं मिलती।
मर्दानी की हर कड़ी यह याद दिलाती है कि जेंडर आधारित हिंसा कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक समस्या है। मर्दानी 3 में रानी मुखर्जी एक बार फिर आईपीएस शिवानी शिवाजी रॉय के रूप में लौटती हैं। यह किरदार सिर्फ़ अपराधियों से नहीं लड़ता, बल्कि उस वर्गीय और पितृसत्तात्मक सोच को भी चुनौती देता है, जिसमें कुछ ज़िंदगियां ज़्यादा कीमती और कुछ कम अहम मानी जाती हैं। फिल्म कानून-व्यवस्था के सवाल से आगे बढ़कर संवेदनशीलता, बराबरी और सामाजिक ज़िम्मेदारी की बात करती है। मर्दानी 3 दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि लड़कियों के खिलाफ़ अपराध सिर्फ़ क़ानून की विफलता नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चुप्पी का नतीजा भी है।
अभिराज मीनावाला का निर्देशन फिल्म को एक गंभीर और ठोस आधार देता है। कहानी को बेवजह भावुक बनाने के बजाय तथ्यों और माहौल के सहारे आगे बढ़ाया गया है। फिल्म के एक्शन सीक्वेंस मज़बूत हैं, लेकिन वे शोर-शराबे के लिए नहीं, बल्कि कहानी को आगे ले जाने के लिए रचे गए हैं।
सधा हुआ निर्देशन और रानी मुखर्जी का अभिनय
अभिराज मीनावाला का निर्देशन फिल्म को एक गंभीर और ठोस आधार देता है। कहानी को बेवजह भावुक बनाने के बजाय तथ्यों और माहौल के सहारे आगे बढ़ाया गया है। फिल्म के एक्शन सीक्वेंस मज़बूत हैं, लेकिन वे शोर-शराबे के लिए नहीं, बल्कि कहानी को आगे ले जाने के लिए रचे गए हैं। महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का इस्तेमाल फिल्म की आत्मा को और मज़बूती देता है। यह सिर्फ़ पृष्ठभूमि संगीत नहीं रह जाता, बल्कि नारी शक्ति का प्रतीक बनकर उभरता है—एक ऐसी शक्ति, जो सहनशील भी है और ज़रूरत पड़ने पर अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ी भी होती है। रानी मुखर्जी एक बार फिर आईपीएस शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार में पूरी तरह विश्वसनीय और प्रभावशाली नज़र आती हैं। उनका अभिनय इस किरदार को केवल एक सख़्त और निडर पुलिस अफ़सर तक सीमित नहीं रहने देता। चेहरे के सूक्ष्म भाव, आंखों की दृढ़ता और नियंत्रित बॉडी लैंग्वेज के ज़रिये वह शिवानी के भीतर चल रहे संघर्ष, ग़ुस्से और संवेदनशीलता—तीनों को साथ लेकर चलती हैं।
वह एक ऐसी अफ़सर के रूप में सामने आती हैं जो कानून का पालन भी करती है और ज़रूरत पड़ने पर व्यवस्था से टकराने का साहस भी रखती है। फिल्म के कई दृश्य ऐसे हैं जहां रानी मुखर्जी संवादों से ज़्यादा अपनी ख़ामोशी के ज़रिये असर छोड़ती हैं। बच्चियों की पीड़ा को महसूस करते समय उनकी आंखों में दिखती बेचैनी और अपराधियों के सामने उनकी सधी हुई सख़्ती किरदार को गहराई देती है। यही वजह है कि दर्शक शिवानी शिवाजी रॉय से भावनात्मक रूप से जुड़ पाते हैं। इस बार फिल्म भारी-भरकम डायलॉगबाज़ी के बजाय अभिनय और हालात की गंभीरता पर ज़्यादा भरोसा करती है, जो कहानी को यथार्थ के और क़रीब ले आती है। सहायक कलाकार अपने-अपने किरदारों में ईमानदार नज़र आते हैं और कहानी को मज़बूती देते हैं। ख़ासतौर पर विलेन का किरदार बिना ज़्यादा शोर किए डर पैदा करता है। उसकी ठंडी और संयमित मौजूदगी फिल्म के तनावपूर्ण माहौल को और असरदार बनाती है। कुल मिलाकर, मर्दानी 3 में अभिनय कहानी की सबसे बड़ी ताक़त बनकर उभरता है और फिल्म को गंभीरता, विश्वसनीयता और भावनात्मक गहराई प्रदान करता है।
मर्दानी 3 की सबसे बड़ी ताक़त उसका विषय और उसकी ईमानदार, बिना समझौते वाली प्रस्तुति है। फिल्म अपराध को सनसनी या मनोरंजन के रूप में नहीं दिखाती। वह उसे एक गंभीर सामाजिक समस्या के तौर पर सामने रखती है।
फिल्म की खूबियां और सीमाएं
मर्दानी 3 की सबसे बड़ी ताक़त उसका विषय और उसकी ईमानदार, बिना समझौते वाली प्रस्तुति है। फिल्म अपराध को सनसनी या मनोरंजन के रूप में नहीं दिखाती। वह उसे एक गंभीर सामाजिक समस्या के तौर पर सामने रखती है। बच्चियों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों को जिस संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी के साथ दिखाया गया है, वही इस फिल्म को भीड़ से अलग करता है। यहां हिंसा न तो बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई है और न ही उसे छुपाया गया है। फिल्म उसकी भयावह सच्चाई को सीधे और स्पष्ट रूप से दर्शक के सामने रखती है। फिल्म की एक और अहम ख़ूबी यह है कि वह अपराध के पीछे छिपी सोच पर सवाल उठाती है। मर्दानी 3 साफ़ तौर पर दिखाती है कि कैसे आज भी कई जगहों पर स्त्री के शरीर को नियंत्रण, प्रयोग और मुनाफ़े की वस्तु माना जाता है। यह फिल्म सिर्फ़ अपराधियों को नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करती है जो गरीब, लावारिस और हाशिये पर खड़ी बच्चियों को बार-बार अनदेखा कर देती है। वर्गीय असमानता को कहानी में जिस सहजता से पिरोया गया है, वह फिल्म को सामाजिक रूप से और अधिक मज़बूत बनाता है।
रानी मुखर्जी का संयमित और परिपक्व अभिनय फिल्म की रीढ़ है। उनका किरदार न तो किसी अवास्तविक सुपरहीरो जैसा लगता है और न ही भावनात्मक रूप से कमज़ोर। वह एक ऐसी पुलिस अफ़सर के रूप में सामने आती हैं, जो कानून, संवेदना और अपने सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाकर काम करती है। यही वजह है कि मर्दानी 3 सिर्फ़ एक महिला-केंद्रित एक्शन फिल्म नहीं बनती, बल्कि एक विचारोत्तेजक सिनेमा बन जाती है। कमियों की बात करें तो फिल्म का दूसरा हिस्सा कुछ जगहों पर थोड़ा खिंचा हुआ लगता है। कुछ सहायक किरदारों को और गहराई दी जा सकती थी। इसके अलावा, पहले की फिल्मों की तुलना में संवाद कुछ दर्शकों को कम प्रभावशाली लग सकते हैं। हालांकि ये कमियां फिल्म के मूल उद्देश्य और उसके असर को कमज़ोर नहीं करतीं।
आईपीएस शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार के ज़रिये फिल्म साफ़ करती है कि कानून का मक़सद केवल सजा देना नहीं है। उसका उद्देश्य हर उस जीवन की रक्षा करना भी है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। शिवानी के लिए किसी बच्ची का परिवार, उसकी हैसियत या सामाजिक दर्जा कोई मायने नहीं रखता।
एक ज़िम्मेदार संदेश देने की कोशिश
मर्दानी 3 सिर्फ़ एक फिल्म नहीं है, बल्कि एक सख़्त और ज़रूरी चेतावनी है। यह समाज के सामने कई असहज सवाल खड़े करती है। फिल्म सीधे पूछती है कि आखिर हर दौर में हिंसा, शोषण और अमानवीय अपराधों का सामना लड़कियां ही क्यों करती हैं। कभी मानव तस्करी के नाम पर, कभी यौन हिंसा के ज़रिये और कभी विज्ञान और विकास की आड़ में किए जाने वाले प्रयोगों के बहाने। फिल्म यह दिखाने से नहीं हिचकती कि समय और तकनीक बदलने के बावजूद स्त्री के प्रति सोच में बदलाव बेहद धीमा रहा है। मर्दानी 3 का सबसे अहम संदेश यही है कि लड़कियां कमज़ोर नहीं होतीं। उन्हें कमज़ोर मानने वाली मानसिकता ही असली अपराध है। यह मानसिकता सिर्फ़ अपराधियों में नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था में भी गहराई से मौजूद है।
आईपीएस शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार के ज़रिये फिल्म साफ़ करती है कि कानून का मक़सद केवल सजा देना नहीं है। उसका उद्देश्य हर उस जीवन की रक्षा करना भी है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। शिवानी के लिए किसी बच्ची का परिवार, उसकी हैसियत या सामाजिक दर्जा कोई मायने नहीं रखता। उनके लिए हर बच्ची की ज़िंदगी बराबर कीमती है। फिल्म यह भी दिखाती है कि वर्गीय असमानता किस तरह न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। बड़े घर की बच्ची और सड़क पर रहने वाली लावारिस बच्ची, दोनों के साथ होने वाला व्यवहार समाज की प्राथमिकताओं को उजागर करता है। मर्दानी 3 इस असमानता पर सवाल उठाती है और दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी संवेदनशीलता भी वर्ग के आधार पर तय होती है। यह फिल्म सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करती। यह आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है। मर्दानी 3 को केवल देखा नहीं जाना चाहिए, बल्कि समझा जाना चाहिए क्योंकि इसमें उठाए गए सवाल आज भी हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है।

