संस्कृतिकिताबें हिंदी साहित्य में विधवाओं का चित्रण: सहानुभूति की पात्र से आज़ादी तक

हिंदी साहित्य में विधवाओं का चित्रण: सहानुभूति की पात्र से आज़ादी तक

हिंदी साहित्य में जब भी विधवा जीवन को लिखा गया है, तो सबसे पहले वह सहानुभूति के नजर से ही देखी गई है। बेटों की माँ होकर विधवा महिला समाज में अपनी साख बनाए रखने के लिए, अपने ही घर में अपने अस्तित्व को खो देती है। जैसे प्रेमचंद के उपन्यास प्रतिज्ञा में नायिका के पति की मृत्यु के बाद उसे घर से निकाल दिया जाता है।

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की चर्चा विधवा महिलाओं के उल्लेख के बिना अधूरी रहती है। सदियों से समाज जिस सफेद वस्त्र को अभिशाप मानता आया, साहित्य ने उसे अपनी संवेदनाओं के केंद्र में रखा। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या साहित्य ने विधवाओं को केवल दया का पात्र माना या उन्हें एक आज़ाद इकाई के रूप में भी देखा? विधवा शब्द सुनते ही हमारे मन में एक प्रतिबिंब उभरता है। हालांकि विधवा होने में किसी महिला का कोई दोष नहीं है, फिर भी समाज उसे फटे-पुराने मलिन कपड़ों में, गरीब या दूसरों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर रहने वाली किसी महिला के रूप में देखता है। समाज और परिवार इनके साथ कमतर और अपमानजनक व्यवहार करता है।  

इन महिलाओं के जीवन को दृष्टि में रखकर अगर हम हिन्दी साहित्य का विष्लेषण करें तो, हमें कुछ ऐसी ही छवि देखने को मिलती है। हिंदी साहित्य में जब भी विधवा जीवन को लिखा गया है, तो सबसे पहले वह सहानुभूति के नजर से ही देखी गई है। बेटों की माँ होकर विधवा महिला समाज में अपनी साख बनाए रखने के लिए, अपने ही घर में अपने अस्तित्व को खो देती है। जैसे प्रेमचंद के उपन्यास प्रतिज्ञा में नायिका के पति की मृत्यु के बाद उसे घर से निकाल दिया जाता है। हालांकि यह उपन्यास सामाजिक सुधार के दृष्टिकोण से लिखा गया है और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करता है। लेकिन यह साफ़ तौर पर दिखाता है कि पुनर्विवाह इसलिए ज़रूरी है, ताकि महिलाएं  समाज की कुरीतियों से बची रहें। 

हिंदी साहित्य में जब भी विधवा जीवन को लिखा गया है, तो सबसे पहले वह सहानुभूति के नजर से ही देखी गई है। बेटों की माँ होकर विधवा महिला समाज में अपनी साख बनाए रखने के लिए, अपने ही घर में अपने अस्तित्व को खो देती है।

पुरुष और महिला राइटर्स के चित्रण में अंतर

पुरुष लेखक और महिला लेखिकाओं के चित्रण में देखा जा सकता है, कि पुरुष लेखन में विधवा महिलाओं को अक्सर सहानुभूति और करुणा की दृष्टि से चित्रित किया गया है। प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने निर्मला और प्रतिज्ञा जैसे उपन्यासों में विधवा विवाह, सामाजिक रूढ़ियों और स्त्री दुख का मार्मिक चित्रण किया है। लेकिन, वहां उन महिलाओं की अपनी आवाज़ कम सुनाई देती है। पुरुष लेखक उन महिलाओं को सुधार और दया का पात्र बनाकर प्रस्तुत करते हैं। इसके उलट महिला लेखन में विधवा महिलाओं का चित्रण उनके अनुभव पर आधारित है। महिला लेखिकाएं विधवा महिलाओं को केवल करुणा की मूर्ति न मानकर संघर्षशील, स्वाभिमानी और जीवंत रूप में दिखाती हैं।

महादेवी वर्मा की भक्तिन में उसकी सहनशीलता और श्रद्धा उभरकर आती है। वहीं मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम और उषा प्रियंवदा जैसी लेखिकाओं ने विधवा महिलाओं की पीड़ा, अस्मिता और अधिकारों की खोज को सामने रखा। इस प्रकार पुरुष लेखन में विधवा विमर्श सहानुभूति और सुधार तक सीमित रहता है, जबकि महिला लेखन में यह आत्मसम्मान और सशक्तिकरण की आवाज़ बन जाती है। समकालीन साहित्य को देखा जाए तो एक उम्मीद की किरण नजर आती है, जिसमें वे अपने लिए लड़ती हैं, आवाज़ उठाती हैं और अपने अंतरात्मा की आवाज़ को जिंदा रखती हैं। आज के समय में वे किसी पर निर्भर नहीं बल्कि बाहर निकल कर अपने जीवन को सफल बनाने के लिए काम करती हैं।

प्रेमचंद के उपन्यास प्रतिज्ञा में नायिका के पति की मृत्यु के बाद उसे घर से निकाल दिया जाता है। हालांकि यह उपन्यास सामाजिक सुधार के दृष्टिकोण से लिखा गया है और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करता है। लेकिन यह साफ़ तौर पर दिखाता है कि पुनर्विवाह इसलिए ज़रूरी है, ताकि महिलाएं  समाज की कुरीतियों से बची रहें। 

पितृसत्ता और आर्थिक निर्भरता

विधवा महिलाओं की स्थिति का मुख्य कारण पितृसत्तात्मक ढांचा और आर्थिक असुरक्षा है। महादेवी वर्मा ने शृंखला की कड़ियां में प्रश्न खड़ा किया है कि किसी महिला के विधवा होते ही उसके भरण-पोषण और रक्षा की समस्या क्यों आ जाती है? समाज ने हमेशा पुरुषों को ही रक्षक माना, जबकि अक्सर वही भक्षक सिद्ध हुए। इसमें महादेवी लिखती हैं कि विधवाओं की भी हमारे समक्ष एक ही समस्या है। किसी महिला के विधवा होते ही प्रश्न उठता है कि उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा कौन करेगा। अगर खाने-पीने और गुज़ारे की चिंता न भी हो, तो भी सुरक्षा और सहारे के अभाव में इंसान गलत इरादों और शोषण के ख़तरों से घिरा रहता है।

प्रेमचंद की कहानी बेटों वाली विधवा इसका एक उदाहरण है, जहां नायिका अपनी साख बचाने के लिए घर में ही अपना अस्तित्व खो देती है क्योंकि सत्ता का अधिकार पति के बाद पुत्र को मिल जाता है। वह महिला केवल एक परजीवी बनकर रह जाती है। वहीं ‘प्रतिज्ञा‘ की नायिका जब पुरुष (कमला प्रसाद) की पाशविक प्रवृत्तियों का सामना करती है, तो वह घर छोड़कर समाज-सेविका के रूप में उभरती है। यह बदलाव साफ़ तौर पर दिखता है कि आर्थिक आज़ादी ही गरिमापूर्ण जीवन की पहली शर्त है।

महादेवी वर्मा ने शृंखला की कड़ियां में प्रश्न खड़ा किया है कि किसी महिला के विधवा होते ही उसके भरण-पोषण और रक्षा की समस्या क्यों आ जाती है? समाज ने हमेशा पुरुषों को ही रक्षक माना, जबकि अक्सर वही भक्षक सिद्ध हुए।

 यौनिकता और आकांक्षाओं की वर्जनाओं से बाहर साहित्य

लंबे समय तक साहित्य ने विधवाओं की यौनिकता और व्यक्तिगत इच्छाओं को अनदेखा किया। उन्हें अक्सर ऐसा दिखाने की कोशिश की गई जैसे वे बहुत पवित्र हों और उनकी कोई इच्छा ही न हो। लेकिन आज का (समकालीन) साहित्य इस विषय पर खुलकर और बेझिझक अपनी बात रख रहा है। कृष्णा सोबती का उपन्यास डार से बिछुड़ी एक कम उम्र की विधवा के यौन शोषण और विस्थापन की भयावह दास्तां सुनाता है। वहीं, योगिता यादव की कहानी नए घर की अम्मा एक क्रांतिकारी मोड़ लेती है।

जहां वृद्ध विधवा अम्मा को पूरा गाँव अपनी जागीर समझता है, लेकिन आखिर में वह अपनी चुप्पी तोड़ती है। ‘रोवनवारी अम्मा’ से ‘जबरजंग अम्मा’ बनने की यह कहानी विधवाओं पर होने वाली सोच और बहस में एक नया और ज़रूरी अध्याय जोड़ती है, जहां वह अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए खुद खड़ी होती है। यहां योगिता यादव की प्रमुख पात्र प्रधानीन को रेखांकित करना ज़रूरी है। यह हिंदी साहित्य में नए शब्दों के साथ नई सोच को प्राथमिकता देता है, जो बताता है कि समाज में महिलाओं  को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राजनीति में उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण है। 

लंबे समय तक साहित्य ने विधवाओं की यौनिकता और व्यक्तिगत इच्छाओं को अनदेखा किया। उन्हें अक्सर ऐसा दिखाने की कोशिश की गई जैसे वे बहुत पवित्र हों और उनकी कोई इच्छा ही न हो। लेकिन आज का (समकालीन) साहित्य इस विषय पर खुलकर और बेझिझक अपनी बात रख रहा है।

 भक्तिन और सरला में स्वायत्तता की नई परिभाषा

विधवा महिलाओं के संदर्भ में उसने बोलना महादेवी वर्मा की भक्तिन बनकर सीखा। भक्तिन महादेवी वर्मा की संस्मरणात्मक रचना है, जो कि उनके प्रसिद्ध किताब अतीत के चलचित्र का हिस्सा है। यह एक भावनात्मक और सच्चाई से भरी कहानी है। इसमें एक वृद्ध विधवा महिला भक्तिन के जीवन का चित्रण है। इसकी कहानी समाज से मेल खाता है, जब कोई महिला तीन – तीन बेटियों की माँ हो तो उसका वैधव्य जीवन और दुर्गम या संघर्षपूर्ण हो जाता है। उसने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया है।उसने समाज के तानों को छोड़कर अपनी आज़ादी को चुना। परिवार और सामंती व्यवस्था से परेशान होकर, वह अपना स्वाभिमान बचाने के लिए नौकरी की तलाश में निकल पड़ी। उसे महादेवी वर्मा के यहां काम मिलता है और वे अपना गुजर बसर करती है। उसमें करुणा और आत्मीयता की झलक है,लेकिन अपनी बेटियों के लिए वो सबसे लड़ जाती है। दूसरी ओर, सरला: एक विधवा की आत्मजीवनी समाज के दोहरे मापदंडों को साफ़-साफ़ सामने लाती है।

लेखिका की शादी उस उम्र में होती है, जब उन्हें शादी शब्द का अर्थ भी नहीं पता था और कुछ ही सालों के बाद वह विधवा हो जाती है। वह इसका उल्लेख करती है कि जहां एक विधवा को बचपन में ही अपमानित किया जाता है, जब वह यह समझ पाने में असमर्थ है कि उसके साथ क्या हो रहा है। वहीं उसके भाई की पत्नी की मृत्यु होने पर तुरंत दूसरी शादी की तैयारी शुरू हो जाती है। जिस लड़की से वह भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी थी, उसके साथ ऐसा व्यवहार देखकर उसका मन आहत हो जाता है। लेखिका की आत्म जीवनी यही संदेश देती है कि महिलाओं का अपना कोई अस्तित्व नहीं है।

वह एक पुरुष के लिए पाली पोसी जाती है। पुरुष के न होने पर उसकी पहचान पूरी तरह खत्म हो जाती है। यह अभिशाप और अधिकार का जो दोहरा पैमाना है, वही इस समस्या की जड़ है।हम कह सकते हैं कि साहित्य की यात्रा सहानुभूति से शुरू होकर अब अस्तित्व के बोध तक पहुंच  चुकी है। आज की विधवा महिलाएं किसी पुरुष रक्षक की मोहताज नहीं है। समकालीन लेखन यह स्पष्ट करता है कि, जब तक समाज विधवाओं को मंदिरों के बाहर और शुभ कामों से दूर रखेगा, तब तक हम एक सभ्य समाज नहीं कहला सकते। आर्थिक आज़ादी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक मानसिकता में बदलाव ही उन्हें वह सम्मान दिला सकता है, जिसकी वे हकदार हैं।

About the author(s)

मैं सरला , मैंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक किया है और लखनऊ विश्वविद्यालय से परास्नातक कर रहीं हूं। मैं आजाद ख्यालों वाली लड़की हूं। समाज की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। समाज में व्याप्त रूढ़ियों और विषमताओं को खत्म कर समाज में समानता लाना अपना कर्तव्य समझती हूं। हिंदी साहित्य में घोर दिलचस्पी है अपना खाली समय किताबों के साथ बिताती  सौखियां कविताएं लिखती हूं।

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