जलवायु संकट को अक्सर सिर्फ पर्यावरण की समस्या माना जाता है। लेकिन सच यह है कि यह एक संकट को बढ़ाने वाली समस्या है। यानी यह समाज में पहले से मौजूद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असमानताओं को कई गुना बढ़ा देता है। आज दुनिया के कई हिस्सों में प्राकृतिक आपदाएं लगातार बढ़ रही हैं। भारत में पंजाब में सतलुज नदी का उफान, बिहार के आरा में गंगा की बाढ़, हिमाचल प्रदेश के मंडी में भूस्खलन और जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में तवी नदी का कहर इसके उदाहरण हैं। वैश्विक स्तर पर स्थिति और भी गंभीर है। सूडान में सूखे से गांव उजड़ रहे हैं। बांग्लादेश में बाढ़ से परिवार विस्थापित हो रहे हैं। केन्या में लोग भूख और पानी की कमी से जूझ रहे हैं। इस संकट का असर सबसे अधिक कमजोर समुदायों पर पड़ता है। खासतौर पर महिलाएं इससे ज्यादा प्रभावित होती हैं।
सामाजिक मानदंड, लैंगिक भेदभाव और संसाधनों तक सीमित पहुंच उनकी स्थिति को और कठिन बना देते हैं। कई महिलाओं के पास जमीन का स्वामित्व नहीं होता। उन्हें शिक्षा, बैंक ऋण और स्वास्थ्य सेवाओं तक बराबर पहुंच नहीं मिलती। जब बाढ़ या सूखा आता है, तो ये असमानताएं और गहरी हो जाती हैं। कई बार पुरुष काम की तलाश में दूसरे शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। ऐसे में महिलाएं गांव में ही रह जाती हैं। उन पर खेती और घर दोनों की जिम्मेदारी आ जाती है। इस दोहरे बोझ के कारण वे आर्थिक और सामाजिक रूप से और असुरक्षित हो जाती हैं।
यूएन वुमन की साल 2025 जेंडर स्नैपशॉट रिपोर्ट बताती है कि जलवायु संकट लैंगिक असमानता को और गहरा करता है। विकासशील देशों में महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक निर्भर होती हैं। जब सूखा या बाढ़ आती है, तो उनकी आय, भोजन और सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है।
जलवायु परिवर्तन और महिलाएं
जलवायु परिवर्तन अब मानव प्रवास को भी प्रभावित कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बाढ़, सूखा और तूफान जैसी आपदाएं हर साल 2 करोड़ से अधिक लोगों को विस्थापित कर रही हैं। अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती है। इंटरनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर के अनुसार, साल 2024 में भारत में 5.4 मिलियन लोग आपदाओं के कारण अपने ही देश में विस्थापित हुए। इनमें से 2.4 मिलियन लोग केवल असम में आई बाढ़ से प्रभावित थे। यह 2012 के बाद का सबसे अधिक दर्ज किया गया आंकड़ा है। वर्ष 2020 में भी तूफान और बाढ़ के कारण 4 मिलियन लोग विस्थापित हुए थे।
विश्व बैंक की ‘ग्राउंडस्वेल’ रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक दक्षिण एशिया में 40.5 मिलियन लोग जलवायु परिवर्तन के कारण आंतरिक रूप से विस्थापित हो सकते हैं। ये लोग उन क्षेत्रों से पलायन करेंगे जहां पानी की कमी है, फसल उत्पादन घट गया है और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन कोई भविष्य की समस्या नहीं है। यह आज की सच्चाई है। इसका असर अभी और यहीं दिखाई दे रहा है, खासकर भारत जैसे देशों में, जहां बड़ी आबादी सीधे प्रकृति पर निर्भर है।
जलवायु-प्रेरित विस्थापन केवल जगह बदलने का मामला नहीं है। यह लोगों के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य जीवन को भी गहराई से प्रभावित करता है। इसका असर महिलाओं और पुरुषों पर अलग-अलग पड़ता है।
जलवायु-प्रेरित विस्थापन केवल जगह बदलने का मामला नहीं है। यह लोगों के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य जीवन को भी गहराई से प्रभावित करता है। इसका असर महिलाओं और पुरुषों पर अलग-अलग पड़ता है। अक्सर पुरुष काम की तलाश में बाहर चले जाते हैं। वहीं महिलाएं गांव या अस्थायी बस्तियों में रहकर खेती, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, पानी और ईंधन लाने की जिम्मेदारी उठाती हैं। इस तरह उनका काम और बोझ दोनों बढ़ जाते हैं। यूएन वुमन की साल 2025 जेंडर स्नैपशॉट रिपोर्ट बताती है कि जलवायु संकट लैंगिक असमानता को और गहरा करता है। विकासशील देशों में महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक निर्भर होती हैं। जब सूखा या बाढ़ आती है, तो उनकी आय, भोजन और सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है।
इससे गरीबी, यौन हिंसा और अनचाहे गर्भधारण का खतरा बढ़ जाता है। गर्भवती महिलाओं को बाढ़ के समय नाव में घंटों सफर करना पड़ता है। पीरियड्स के दौरान उन्हें साफ पानी और स्वच्छता की कमी का सामना करना पड़ता है। विस्थापन शिविरों में हालात और कठिन हो जाते हैं। साफ पानी, शौचालय और सैनिटरी पैड की कमी आम है। बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में कई महिलाओं को खुले में शौच करना पड़ता है। इससे यौन हिंसा का खतरा बढ़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाएं कपड़े का इस्तेमाल करती हैं, जिससे यूटीआई, फंगल संक्रमण और टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम का जोखिम बढ़ता है। आपदा प्रबंधन योजनाएं अक्सर पीरियड्स स्वच्छता को नजरअंदाज करती हैं। यह एक बड़ी नीतिगत कमी है।
विकासशील देशों में महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक निर्भर होती हैं। जब सूखा या बाढ़ आती है, तो उनकी आय, भोजन और सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है। इससे गरीबी, यौन हिंसा और अनचाहे गर्भधारण का खतरा बढ़ जाता है। गर्भवती महिलाओं को बाढ़ के समय नाव में घंटों सफर करना पड़ता है।
पंजाब के राहत शिविरों में एनीमिया के मामले बढ़े। आरा में डायरिया फैला। दूषित पानी से कोलेरा जैसी बीमारियां फैलती हैं, जिनका असर महिलाओं पर अधिक पड़ता है। अस्थायी बस्तियों में स्वच्छता की कमी से 3.4 अरब लोग प्रभावित हैं। यूएनएचसीआर के अनुसार, शिविरों में पानी लाने के दौरान महिलाओं को लैंगिक हिंसा का खतरा रहता है। साल 2025 की वैश्विक बाढ़ों में एक-तिहाई विस्थापित महिलाएं थीं। बाढ़ या सूखे से प्रभावित गर्भवती महिलाओं में अबॉर्शन का खतरा 300 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। मोनाश यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार, बाढ़ के बाद अस्पताल में भर्ती 26 प्रतिशत बढ़ जाती है। हृदय रोग के मामले 35 प्रतिशत, श्वसन रोग 30 प्रतिशत और संक्रामक रोग 26 प्रतिशत बढ़ते हैं। डबल्यूएचओ का अनुमान है कि साल 2030 तक जलवायु परिवर्तन के कारण 2.5 लाख अतिरिक्त मौतें होंगी, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक हो सकती है।
जलवायु संकट खाद्य उत्पादन और वितरण को भी प्रभावित करता है। इससे खाद्य असुरक्षा बढ़ती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, सूखा और खाद्य असुरक्षा महिलाओं में कुपोषण बढ़ाते हैं। खाद्य असुरक्षित महिलाओं में एनीमिया की संभावना 1.6 गुना अधिक होती है। विस्थापन की स्थिति में सामाजिक मानदंडों के कारण महिलाएं परिवार में सबसे अंत में भोजन करती हैं। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। इससे कम वजन वाले शिशु, समय से पहले प्रसव और शिशु मृत्यु दर बढ़ती है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। विस्थापन के बाद चिंता, अवसाद और पीटीएसडी के मामले बढ़ते हैं। डबल्यूएचओ के अनुसार, शरणार्थी और प्रवासी समुदायों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं अधिक पाई जाती हैं। आजीविका का नुकसान, सामाजिक अलगाव और भेदभाव इस स्थिति को और खराब करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण साल 2090 तक भारत में घरेलू हिंसा में 23.5 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, सूखा और खाद्य असुरक्षा महिलाओं में कुपोषण बढ़ाते हैं। खाद्य असुरक्षित महिलाओं में एनीमिया की संभावना 1.6 गुना अधिक होती है।
जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नीतियां
भारत में जलवायु प्रवासियों के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय नीति नहीं है। साल 2022 में ‘क्लाइमेट माइग्रेंट्स (प्रोटेक्शन एंड रिहैबिलिटेशन) बिल’ पेश किया गया था, लेकिन ‘जलवायु प्रवासी’ की कानूनी परिभाषा न होने के कारण इसे पारित नहीं किया गया। इस कानूनी खालीपन के कारण विस्थापित लोगों को नियमित और संरक्षित सहायता नहीं मिल पाती। लिंग-विभाजित डेटा की कमी भी नीति निर्माण में बाधा बनती है। जब तक ‘जलवायु प्रवासी’ को मान्यता नहीं मिलेगी, तब तक संवेदनशील और प्रभावी नीतियां बनाना मुश्किल रहेगा। हालांकि, महिलाओं को केवल ‘पीड़ित’ के रूप में देखना गलत है। वे बदलाव की वाहक भी हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं संसाधन प्रबंधन और देखभाल में अहम भूमिका निभाती हैं।
‘सोलर ममास’ कार्यक्रम इसका उदाहरण है, जहां महिलाएं सौर तकनीशियन बनकर अपने गांवों में ऊर्जा और आजीविका के नए अवसर पैदा कर रही हैं। लैंगिक समानता केवल न्याय का सवाल नहीं है। यह प्रभावी जलवायु समाधान की शर्त भी है। जलवायु संकट एक वैश्विक समस्या है। लेकिन इसका बोझ समान रूप से नहीं बंटता। महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा के बिना कोई भी जलवायु नीति सफल नहीं हो सकती। अब समय है कि नीतियों में जेंडर संवेदनशीलता को केंद्र में रखा जाए और विस्थापित महिलाओं को अधिकार, सुरक्षा और संसाधन दिए जाएं।

