समाज कैसे ऑनलाइन हिंसा से माध्यम से इस्लामोफ़ोबिया को मिल रहा है बढ़ावा

कैसे ऑनलाइन हिंसा से माध्यम से इस्लामोफ़ोबिया को मिल रहा है बढ़ावा

मेनस्ट्रीम मीडिया इस समस्या को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह मीडिया न केवल मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद, लव जिहाद या कोरोना जिहाद जैसे स्टीरियोटाइप्स से जोड़कर चित्रित करता है, बल्कि फेक न्यूज, सनसनीखेज रिपोर्टिंग और राजनीतिक एजेंडे के साथ मिलकर घृणा फैलाता है।

आज का समय डिजिटल युग का है, जहां सूचनाएं पहले से कहीं अधिक तेजी से फैलती हैं और दुनिया एक क्लिक में जुड़ी हुई है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मीडिया ने मानव जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसी डिजिटल स्पेस ने नफ़रत, भेदभाव और गलत धारणाओं को भी हवा दी है। इन्हीं बढ़ते खतरों में से एक है इस्लामोफ़ोबिया, यानी इस्लाम और मुसलमानों के प्रति डर, घृणा या पूर्वाग्रह। डिजिटल दुनिया में इसका प्रभाव और भी गहरा और खतरनाक हो गया है। अमूमन लोग बिना सोचे-समझे किसी फ़र्जी या भ्रामक वीडियो या पोस्ट को शेयर कर देते हैं। आम तौर पर एल्गोरिद्म ऐसी सामग्री को बढ़ावा देता है जो विवादित हो। घृणा फैलाने वाले समूह संगठित तरीक़े से प्रोपीगेंडा चलाते हैं। इसके कारण कई इंटरनेट यूजर्स के मन में मुसलमानों को लेकर गलत धारणाएं बन जाती हैं। इस्लामोफ़ोबिया इनमें से एक बेहद गंभीर मुद्दा है, जो न केवल मुसलमानों को प्रभावित करता है, बल्कि समाज की एकता, शांति और मानवता की भावना को भी कमजोर करता है।

मुस्लिम महिलाओं पर दोहरी मार

इस डिजिटल नफरत का सबसे अधिक असर मुस्लिम महिलाओं पर पड़ता है, जिन्हें धर्म और जेंडर दोनों आधारों पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऑनलाइन स्पेस में मुस्लिम महिलाओं के हिजाब को अक्सर आतंकवाद, पिछड़ेपन या दमन के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता है। इस तरह की सोच न केवल गलत है, बल्कि किसी की धार्मिक पहचान पर अनुचित दखल भी है। कई मुस्लिम महिलाएं सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने पर दोहरी ट्रोलिंग का सामना करती हैं। ‘तुम मुसलमान हो’, ‘तुम महिला हो’ जैसे सोच उन्हें नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। उनके कपड़ों, धार्मिक पालन और स्वतंत्रता पर तंज कसे जाते हैं। कुछ मामलों में यह यौनिक दुरुपयोग और धमकियों तक पहुंच जाता है। पत्रकार राणा अय्यूब की साल 2002 में हुए गुजरात दंगे पर उनकी एक खोजी रिपोर्ट गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए क’वर अप’ को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की बहुत चर्चा हुई।

पत्रकार राणा अय्यूब की साल 2002 में हुए गुजरात दंगे पर उनकी एक खोजी रिपोर्ट गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए क’वर अप’ को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की बहुत चर्चा हुई। इसके लिए उन्हें कई बार धमकियां मिली और उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर अपमानजनक पोस्ट किए गए। साल 2018 में, अय्यूब का चेहरा दिखाते हुए एक फ़र्ज़ी अश्लील वीडियो क्लिप व्हाट्सएप पर प्रसारित किया गया था।

इसके लिए उन्हें कई बार धमकियां मिली और उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर अपमानजनक पोस्ट किए गए। साल 2018 में, अय्यूब का चेहरा दिखाते हुए एक फ़र्ज़ी अश्लील वीडियो क्लिप व्हाट्सएप पर प्रसारित किया गया था। एनपीआर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था, “मेरे ख़िलाफ़ उत्पीड़न एक दशक से भी ज़्यादा समय से चल रहा है, मेरी तस्वीर के साथ छेड़छाड़ करके उसे एक अश्लील वीडियो में बदल दिया गया और पूरे देश में प्रसारित कर दिया गया, मेरे ख़िलाफ़ आरोप यह है कि मैं एक मुसलमान हूं और इसलिए मेरी रिपोर्टिंग में पूर्वाग्रह है।” हालांकि ये हिंसा और पूर्वाग्रह सिर्फ पत्रकारों तक सीमित नहीं है। सामन्य मुस्लिम महिलाएं भी हर रोज इस्लामोफ़ोबिया का सामना करती हैं।

दिल्ली में रहने वाली फरहत खातून बताती हैं, “मैं द्वारिका क्षेत्र में रहती हूं। मैं हिजाबी महिला हूं। मुझे अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जब मैं अपने ऑफिस के लिए निकलती हूं तो मुझे मेट्रो जाने के लिए बैटरी रिक्शा लेने की ज़रूरत होती है। पर कई बार मुझे हिजाब में देखकर कुछ लोग रिक्शा नहीं रोकते। ऐसे में मुझे मेट्रो तक अक्सर पैदल ही जाना पड़ता या कई मिनट तक दूसरी बैटरी रिक्शा का इंतज़ार करना पड़ता जिससे मैं अक्सर लेट हो जाती हूं। कहीं-न-कहीं डिजिटल मीडिया के जरिए फैलाया जा रहा इस्लामोफ़ोबिया भी ऐसे निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के दिमाग को प्रभावित करने का काम कर रहा है, जो एक धर्म विशेष के लोगों के कपड़ों तक से नफ़रत करते हैं।”

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, मॉरल पुलिसिंग और उत्पीड़न

सोशल मीडिया पर इस्लामोफ़ोबिया के नाम पर ट्रोलिंग अब व्यक्तिगत राय या असहमति तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक व्यवस्थित हिंसा का रूप ले चुकी है। खासकर ट्रोलिंग, मॉरल पुलिसिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न आज सबसे खतरनाक डिजिटल हथियार बन चुके हैं। मॉरल पुलिसिंग वह प्रक्रिया है जिसमें सोशल मीडिया यूज़र्स दूसरों के निजी जीवन, पहनावे, धार्मिक प्रथाओं या अभिव्यक्ति पर नैतिकता थोपते हैं। इस्लामोफ़ोबिया के संदर्भ में मुस्लिम समुदाय को खासतौर पर निशाना बनाया जाता है। इसमें किसी मुसलमान के नाम, हिजाब, दाढ़ी, खान-पान या धार्मिक मान्यताओं पर तंज कसना शामिल है। ऑनलाइन मुस्लिम यूज़र्स को ‘आतंकवादी’, ‘देशद्रोही’, ‘असभ्य’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है। अमूमन किसी भी सामाजिक या राजनीतिक मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के लोगों की राय को ‘समुदायवादी’ करार देकर नीचा दिखाया जाता है। ये सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स पर आम हो गया है।

बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले दिल्ली में मीडिया की पढ़ाई कर रहे मोहम्मद नैयर आज़म बताते हैं, “मैं ट्विटर पर एक्टिव रहता हूं। वहां लिखता, पढ़ता और विचार साझा करता रहता हूं। ऐसे में लोग मेरे कमेंट बॉक्स में कई प्रकार के अभद्र टिप्पणियां जैसे आतंकवादी, जिहादी, पंचर छाप लिखते रहते हैं। मेरे नाम के आधार पर मुझे डिजिटली लिंच करते हैं। ये ज़्यादातर ऐसे अकाउंट्स होते हैं, जिनपर किसी व्यक्ति विशेष की आइडेंटिटी नहीं होती।” इस तरह की घटनाएं सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर आम हो गई हैं। लेकिन, इन घटनाओं से उत्पीड़ित लोगों पर कहीं न कहीं मानसिक तनाव बना रहता है। कई बार इन कॉमेंट्स में हत्या और जान से मारने तक की धमकी होती है। इन सब घटनाओं का मूल कारण किसी धर्म विशेष के लोगों के प्रति पूर्वाग्रह होता है जिसे आज मेनस्ट्रीम मीडिया आगे बढ़ा रही है।

मेनस्ट्रीम मीडिया का मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह और नफ़रत किसी से छिपा नहीं है। मीडिया कई बार बिना तथ्यों की ठीक तरह से जांच पड़ताल किए ही ख़बरें प्रकाशित कर देती है। मैंने कई बार देखा है कि जब कोई मुस्लिम लड़की हिंदू लड़के से शादी करती है, तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसपर जश्न मनाता है और मोहब्बत में टूटी मज़हब की दीवार जैसे पंच लाइंस लिखता है।

राजनीतिक नैरेटिव और मीडिया का पक्षपाती रोल

डिजिटल दुनिया की कई बड़ी चुनौतियों में से एक बड़ी चुनौती फ़ेक न्यूज़ है। इस्लामोफ़ोबिया को बढ़ाने में एक बड़ा योगदान फेक न्यूज़ और अफ़वाहों का है। कई बार घटनाओं को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर प्रचारित किया जाता है। मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर फैलाए जाने वाले झूठे वीडियो, एडिटेड फ़ोटो और अफवाहें मुस्लिम समुदाय के लिए अविश्वास और डर पैदा करती है। उदाहरण के तौर पर किसी अपराध को महज मुस्लिम समुदाय से जोड़कर सामूहिक बदनामी करना, धार्मिक प्रथाओं और पहनावे का मज़ाक उड़ाना, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को मुस्लिम समुदाय विरोधी एजेंडे से जोड़कर प्रस्तुत करना। 

दिल्ली में एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे 25 वर्षीय पत्रकार साहिल रज़वी इस्लामोफ़ोबिया को बढ़ाने में मीडिया की भमिका पर बात करते हुए कहते हैं, “मेनस्ट्रीम मीडिया का मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह और नफ़रत किसी से छिपा नहीं है। मीडिया कई बार बिना तथ्यों की ठीक तरह से जांच पड़ताल किए ही ख़बरें प्रकाशित कर देती है। मैंने कई बार देखा है कि जब कोई मुस्लिम लड़की हिंदू लड़के से शादी करती है, तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसपर जश्न मनाता है और मोहब्बत में टूटी मज़हब की दीवार जैसे पंच लाइंस लिखता है। वहीं अगर हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़का हो, तो यही मीडिया उसे लव जिहाद बताती है। उसके अलावा मीडिया मुस्लिम समुदाय के प्रति फ़र्ज़ी खबरें फ़ैलाने में भी पीछे नहीं है।”

वे आगे बताते हैं, “मैंने इस तरह के कई घटना देखी है जहां नारा लग रहा होता है कि नासिर साब जिंदाबाद। लेकिन, मीडिया उसे पाकिस्तान जिंदाबाद बताकर आगे बढ़ाता है और कई बारी पुलिस ने ऐसे मामलों में एफआईआर तक दर्ज कर दी है। मुस्लिम समुदाय के चलाए जा रहे ढाबों पर अक्सर रोटियां बनाने वाला लड़का रोटी बनाते वक़्त रोटी की तरफ झुकता है। दक्षिणपंथी समूह के लोग इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं, मीडिया वीडियो को उठाती है और बिना जांच पड़ताल ही लड़के को दोषी बना देती है और उसे थूक जिहाद बनाकर आगे परोसती है। मुझे लगता है कि मीडिया के इस गिरते हुए स्तर पर ध्यान देने की जरूरत है।”

मैंने इस तरह के कई घटना देखी है जहां नारा लग रहा होता है कि नासिर साब जिंदाबाद। लेकिन, मीडिया उसे पाकिस्तान जिंदाबाद बताकर आगे बढ़ाता है और कई बारी पुलिस ने ऐसे मामलों में एफआईआर तक दर्ज कर दी है।

भारत में इस्लामोफोबिया एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक समस्या बन चुकी है, जो सामाजिक विभाजन, हिंसा और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को बढ़ावा दे रही है। मेनस्ट्रीम मीडिया इस समस्या को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह मीडिया न केवल मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद, लव जिहाद या कोरोना जिहाद जैसे स्टीरियोटाइप्स से जोड़कर चित्रित करता है, बल्कि फेक न्यूज, सनसनीखेज रिपोर्टिंग और राजनीतिक एजेंडे के साथ मिलकर घृणा फैलाता है। रिसर्च पब्लिशिंग नेटवर्क साइंस ओपन.कॉम पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अन्य मीडिया संस्थानों का दावा है कि वर्तमान में दक्षिणपंथी सरकार के शासनकाल में लीचिंग की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इंडियास्पेंड के अनुसार, साल 2015 से भारत में गोरक्षा से संबंधित हिंसा की 117 घटनाएं हुई हैं।

क्विंट के अनुसार, साल 2015 से देश भर में लिंचिंग से 88 लोग मारे गए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, साल 2020 में भारत में मॉब लिंचिंग की 23 घटनाएं हुईं, जबकि साल 2019 में 107 घटनाएं हुई थीं। ‘लव जिहाद’, ‘भूमि जिहाद’, ‘यूपीएससी जिहाद’, ‘कोरोना जिहाद’, ‘गोहत्या’, ‘जनसंख्या विस्फोट’ और ‘इस्लामी आतंकवाद’ जैसे मुद्दों को बार-बार उछाला जाता है। इसके लिए कुछ मीडिया चैनल और दक्षिणपंथी समूहों के आईटी सेल संगठित होकर काम करते हैं, जो सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश फैलाते हैं कि लोगों के मन में मुस्लिम समुदाय के प्रति नफ़रत बढ़े। 

क्या हो सकता है इसका हल 

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर इस्लामोफ़ोबिया का बढ़ना एक गंभीर समस्या है। इसे रोकने के लिए बहुआयामी और व्यावहारिक उपायों की जरूरत है, जो व्यक्तिगत, सामुदायिक, तकनीकी और नीतिगत स्तर पर काम करे। सोशल मीडिया कंपनियों को अपने कम्युनिटी गाइडलाइन्स में इस्लामोफ़ोबिया को स्पष्ट रूप से ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में रखना चाहिए और इसके खिलाफ जीरो-टॉलरेंस पॉलिसी अपनानी चाहिए। गाँव-कस्बों तक फेक न्यूज़ और नफ़रत पहचानने की वर्कशॉप चलाया जा सकता है, जहां खास तौर व्हाट्सएप के माध्यम से फैलाए जा रहे सामग्री को रोका जा सके और लोग ऐसे खबरों और भ्रामक बातों के लिए सतर्क रहें। भारत की दंड संहिता में आईपीसी की धारा 295A के तहत किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से ठेस पहुंचाना दंडनीय अपराध है। इस कानून को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर भी सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

यूरोपीय संघ का डिजिटल सर्विसेज़ ऐक्ट (डीएसए) एक ऐसा कानून है जो ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म को नियंत्रित करता है। इसका उद्देश्य अवैध सामग्री, गलत जानकारी और हानिकारक गतिविधियों पर रोक लगाना है। भारत में भी डीएसए जैसा एक मजबूत कानून बनाया जाना चाहिए, ताकि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर फैल रही नफरत और भ्रामक जानकारी को रोका जा सके। साथ ही, राष्ट्रीय एकता परिषद जैसे और संगठनों का गठन किया जाना चाहिए। ये संगठन डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर इस्लामोफोबिया, जातिगत टिप्पणियां और महिला-विरोधी सामग्री को रोकने का काम करें तथा लोगों को जागरूक बनाएं। इस तरह के कदमों से समाज में आपसी सम्मान, शांति और एकता को बढ़ावा मिलेगा।

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