मलयालम सिनेमा की 2022 की फिल्म जया जया जया जया हे का निर्देशन विपिन दास ने किया है। यह फिल्म एक ऐसी महिला की कहानी है, जो पितृसत्तात्मक सोच और महिलाओं पर परिवार व समाज के नियंत्रण पर करारा प्रहार करती है। यह कोई साधारण कहानी नहीं है, बल्कि इसमें नारी सशक्तिकरण को नए ढंग से दिखाया गया है। फिल्म उत्तर और दक्षिण भारतीय सिनेमा के पारंपरिक फॉर्मूलों से अलग नजर आती है। कहानी की मुख्य पात्र जया है, जिसका किरदार दर्शना राजेंद्रन ने निभाया है। जया एक मध्यमवर्गीय परिवार से है और अपने घर में लैंगिक भेदभाव का सामना करती है।
उसके माता-पिता उसकी “सुरक्षा” के नाम पर उसके जीवन के हर फैसले खुद लेते हैं। वह बालिग होने के बावजूद अपने लिए निर्णय नहीं ले पाती। जया को ‘एंथ्रोपोलॉजी’ विषय में रुचि है और वह इसमें करियर बनाना चाहती है। लेकिन परिवार उसे शहर से बाहर नहीं भेजता और एक साधारण कॉलेज में दाखिला लेने के लिए मजबूर कर देता है। दूसरी ओर, उसके छोटे भाई जगन को एक महंगे कॉलेज में पढ़ने भेजा जाता है। यह परिवार की दोहरी सोच को दिखाता है।
फिल्म उत्तर और दक्षिण भारतीय सिनेमा के पारंपरिक फॉर्मूलों से अलग नजर आती है। कहानी की मुख्य पात्र जया है, जिसका किरदार दर्शना राजेंद्रन ने निभाया है। जया एक मध्यमवर्गीय परिवार से है और अपने घर में लैंगिक भेदभाव का सामना करती है।
विवाह और पितृसत्ता का असली चेहरा
कहानी तब मोड़ लेती है जब जया का अपने कॉलेज के एक लेक्चरर से प्रेम संबंध बनता है। जया उसे प्रगतिशील और महिलाओं का समर्थन करने वाला समझती है, लेकिन बाद में वह भी पितृसत्तात्मक सोच वाला व्यक्ति साबित होता है। जब जया के माता-पिता को इस संबंध के बारे में पता चलता है, तो वे बिना उसकी सहमति के उसकी शादी तय कर देते हैं। इसी कारण उसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हो पाती। उसकी शादी राजेश (जिसका किरदार बेसिल जोसेफ ने निभाया है) से कर दी जाती है, जो एक मुर्गीपालन फार्म का मालिक है। शादी के बाद जया की स्थिति और खराब हो जाती है। राजेश एक हिंसक और गुस्सैल व्यक्ति है, जो घर में तोड़-फोड़ करता है। वह शुरुआत में जया की पढ़ाई पूरी कराने का वादा करता है, लेकिन बाद में लापरवाह और अत्याचारी पति साबित होता है। धीरे-धीरे जया अपने ससुराल में खुद को कैद महसूस करने लगती है। राजेश उसके साथ घरेलू हिंसा करता है, और जया रोज इस हिंसा का सामना करती है।
घरेलू हिंसा और भावनात्मक शोषण
राजेश जिद्दी और स्वार्थी स्वभाव का व्यक्ति है। वह चाहता है कि हर काम उसकी मर्जी से हो। अगर जया उसकी बात नहीं मानती, तो वह उसके साथ मारपीट करता है। उसे खाने में केवल चिकन पसंद है, इसलिए जया को हमेशा वही बनाना पड़ता है। यहां तक कि रेस्तरां में भी वह जया को उसकी पसंद का खाना मंगाने नहीं देता। यह उसके असंवेदनशील और नियंत्रित करने वाले स्वभाव को दिखाता है। जब जया के लिए शारीरिक और भावनात्मक हिंसा सहना मुश्किल हो जाता है, तो वह अपने परिवार से मदद मांगती है। लेकिन परिवार उसका साथ देने के बजाय उसे समझौता करने की सलाह देता है। इस तरह, जो परिवार उसका सहारा होना चाहिए था, वही उसके लिए बोझ बन जाता है। आखिरकार साफ दिखता है कि जया की इस स्थिति के लिए उसका परिवार भी जिम्मेदार है, जिसने बिना उसकी इच्छा के उसका जीवन तय कर दिया।
फिल्म दिखाती है कि कैसे शादी और “एडजस्टमेंट” के नाम पर एक महिला के सपनों और इच्छाओं को दबा दिया जाता है। जया का संघर्ष पढ़ाई छूटने से लेकर खाने की मेज पर अपनी पसंद खोने तक यह बताता है कि घरेलू हिंसा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी होती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी कहने की शैली है।
जया का पलटवार और ब्लैक कॉमेडी
फिल्म जया जया जया जया हे में जया एक सर्वाइवर के रूप में सामने आती है। वह तय करती है कि अब वह अपनी स्थिति खुद संभालेगी। घर के बाथरूम में वह यूट्यूब की मदद से कलारीपयट्टू और कराटे सीखती है और रोज अभ्यास करती है। यह एक ब्लैक कॉमेडी फिल्म है। जब भी राजेश उस पर हाथ उठाता है, जया उसका डटकर सामना करती है और उसे सबक सिखाती है। ये दृश्य हास्यपूर्ण होने के साथ-साथ संतोष भी देते हैं। राजेश अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाता, क्योंकि वह पितृसत्तात्मक और टाक्सिक मर्दानगी की सोच में फंसा हुआ है। वह खुद भी कराटे और कलारीपयट्टू सीखने की कोशिश करता है, ताकि जया से बच सके, लेकिन उसकी यह कोशिश भी बेकार साबित होती है।
समाज की भूमिका
राजेश के दोस्त भी उसकी तरह गलत सोच रखते हैं। वे उसे समझाने के बजाय उसका साथ देते हैं। इससे पता चलता है कि समाज में पितृसत्ता कितनी गहराई तक जमी हुई है। वे जया को घर में बांधकर रखने की साजिश करते हैं। राजेश बाहर से सुधरे हुए पति का नाटक करता है, लेकिन अंदर से वही हिंसक और स्वार्थी इंसान रहता है। उसका यह दिखावा जया को अंदर तक आहत करता है। फिल्म में राजेश की बहन राजी भी भावनात्मक शोषण का शिकार होती है। राजेश उसे बॉडी शेम करता है और “थडिची” (मोटी) कहकर बुलाता है। इससे पता चलता है कि वह महिलाओं के प्रति कितना असंवेदनशील है। फिल्म के अंत में जया एक मजबूत और आत्मसम्मानी महिला के रूप में सामने आती है। वह अपने अधिकार के लिए आवाज उठाती है। उसका भाई उसका साथ देता है, लेकिन उसके माता-पिता और राजेश उसका समर्थन नहीं करते। जया खुद इस रिश्ते से बाहर निकलने का फैसला करती है और समाज को चुनौती देती है।
निर्देशक विपिन दास ने एक गंभीर विषय को ब्लैक कॉमेडी के रूप में पेश किया है। दर्शक हंसते जरूर हैं, लेकिन वह हंसी अंदर तक सोचने पर मजबूर करती है। जब जया कराटे के जरिए पलटवार करती है, तो वह केवल अपने पति को नहीं, बल्कि उस पितृसत्तात्मक सोच, माता-पिता की उदासीनता और जहरीली मर्दानगी पर प्रहार करती है, जिसने उसे कमजोर समझा था।
फिल्म का कोर्ट सीन बहुत प्रभावशाली है। अंत में कहानी को किसी सामान्य रोमांटिक मेल-मिलाप की तरह नहीं दिखाया गया है। जया का किरदार भारतीय समाज की सच्चाई को दर्शाता है। उसे केवल पीड़िता के रूप में नहीं दिखाया गया, बल्कि उसकी भावनात्मक, शारीरिक और आर्थिक स्वतंत्रता को भी महत्व दिया गया है। जया जया जया जया हे सिर्फ एक मनोरंजन फिल्म नहीं है। यह भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर एक तीखा व्यंग्य है। फिल्म दिखाती है कि कैसे शादी और “एडजस्टमेंट” के नाम पर एक महिला के सपनों और इच्छाओं को दबा दिया जाता है। जया का संघर्ष पढ़ाई छूटने से लेकर खाने की मेज पर अपनी पसंद खोने तक यह बताता है कि घरेलू हिंसा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी होती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी कहने की शैली है।
निर्देशक विपिन दास ने एक गंभीर विषय को ब्लैक कॉमेडी के रूप में पेश किया है। दर्शक हंसते जरूर हैं, लेकिन वह हंसी अंदर तक सोचने पर मजबूर करती है। जब जया कराटे के जरिए पलटवार करती है, तो वह केवल अपने पति को नहीं, बल्कि उस पितृसत्तात्मक सोच, माता-पिता की उदासीनता और जहरीली मर्दानगी पर प्रहार करती है, जिसने उसे कमजोर समझा था। अंत में, फिल्म यह संदेश देती है कि नारी सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ आर्थिक आजादी नहीं है, बल्कि अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना भी है। जया की कहानी एक पीड़िता से सर्वाइवर बनने की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को फिर से हासिल करने की कहानी है। यह फिल्म बताती है कि जब समाज और परिवार साथ न दें, तब भी एक महिला अपने अधिकार और सम्मान के लिए खुद खड़ी हो सकती है।

