समाजख़बर ‘लव जिहाद’ की राजनीति और विवाह पर बढ़ता सामाजिक-राज्य नियंत्रण

‘लव जिहाद’ की राजनीति और विवाह पर बढ़ता सामाजिक-राज्य नियंत्रण

भारत में अलग-अलग धर्म और जाति के लोगों की शादियों का अक्सर विरोध किया जाता है। यह विरोध सिर्फ हिंदू-मुस्लिम शादी तक सीमित नहीं है। कई बार हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और यहां तक कि एक ही धर्म की अलग-अलग जातियों के लोगों को भी शादी करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।   

बीते दिनों गुजरात सरकार ने घोषणा की कि वह राज्य विवाह पंजीकरण प्रणाली में संसोधन करेगी, जिसके तहत गुजरात में लव मैरिज का पंजीकरण तभी किया जाएगा, जब युवा जोड़े को  शादी के लिए माता-पिता और परिजनों की सहमति हो। द हिन्दू में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का मानना है कि यह कदम प्रक्रियात्मक खामियों को दूर करने और मौजूदा प्रणाली के कथित दुरुपयोग को रोकने के मकसद से उठाया गया है। वहीं राज्य के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने तर्क दिया कि वर्तमान सरकार को व्यक्तियों और सामाजिक संगठनों से विवाह पंजीकरण प्रक्रिया में सख्त मानदंडों की मांग करने वाले आवेदन मिले हैं। उनके अनुसार राज्य में ‘लव जिहाद’ के अंतर्गत लड़कियों को फंसाया जा रहा है और दावा किया कि ऐसी प्रथाएं समाज में तेजी से फैल रही है। संघवी ने लव जिहाद पर बात करते हुए इसे सांस्कृतिक खतरा बताया।

इसके साथ उन्होंने कहा कि सरकार नियमों में संशोधन करके सुरक्षा उपायों को मजबूत करेगी और सरकार ने जरूरी कदम कथित तौर पर लव जिहाद को रोकने के उद्देश्य से उठाया है। गुजरात सरकार के इस प्रस्ताव के अनुसार, विवाह पंजीकरण कराने वाले जोड़ों को राज्य को एक घोषणा पत्र देना होगा जिसमें यह उल्लेख होगा कि उन्होंने अपनी शादी के बारे में अपने माता-पिता को सूचित किया है या नहीं। उन्हें अपने माता-पिता का नाम, संपर्क, पता और आधार नंबर भी प्रशासन को देना होगा। इसके बाद प्राधिकरण को 10 कामकाजी दिनों के भीतर माता-पिता को शादी के बारे में सूचना देना होगा। यदि माता-पिता की सहमति होती है और अन्य सभी दस्तावेज पूरे होते हैं, तो शादी का पंजीकरण 30 दिनों के भीतर कर दिया जाएगा। सरकार पंजीकरण का विवरण अपलोड करने के लिए एक सरकारी पोर्टल भी तैयार करेगी।

गुजरात में आज भी सामंती व्यवस्था कायम है। सामंती व्यवस्था में जातिगत भेदभाव अधिक रहता है तो ऐसे समाज में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों के लिए कोई जगह नहीं रह जाती है। यह अधिनियम समाज में जाति, वर्ग और जेंडर आधारित भेदभाव को और मजबूत करेगा।

क्या है कथित लव जिहाद की अवधारणा?

‘लव जिहाद’ शब्द का पहली बार 2007 में हिंदू जनजागृति समिति ने इस्तेमाल किया था, लेकिन तब यह ज्यादा चर्चा में नहीं आया। साल 2009 में शब्द लव जिहाद केरल में तब चर्चा में आया जब दो महिलाओं का अपहरण का मामला सामने आया और ये कहा गया कि उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया और उन्हें मुस्लिम पुरुषों से शादी के लिए मजबूर किया गया। इस मामले में राज्य ने तुरंत हस्तक्षेप किया। लेकिन जांच में सरकार को लव जिहाद का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। सरकार ने कहा कि यह धार्मिक नफरत और झूठा प्रचार फैलाने का अभियान था। हालांकि ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट अनुसार बाद में केरल हाई कोर्ट ने एक दूसरे अंतरधार्मिक विवाह (मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला) को कथित लव जिहाद का मामला मानते हुए अमान्य घोषित कर दिया। इस मामले में पति ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट की जांच में लव जिहाद का कोई ऐसा सबूत नहीं मिला जिस पर कानूनी कार्रवाई की जा सके। केरल का यह मामला आम लोगों की सोच में लव जिहाद को एक सुरक्षा मुद्दा बनाने में अहम रहा। ऐसे मामलों का इस्तेमाल हिंदुत्व ताकतों को मजबूत करने के लिए किया गया, जिससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता गया। इस विषय पर दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ रहे गुजरात के 22 वर्षीय नोमान खान कहते हैं, “गुजरात में आज भी सामंती व्यवस्था कायम है। सामंती व्यवस्था में जातिगत भेदभाव अधिक रहता है तो ऐसे समाज में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों के लिए कोई जगह नहीं रह जाती है। यह अधिनियम समाज में जाति, वर्ग और जेंडर आधारित भेदभाव को और मजबूत करेगा।” 

साल 2020 में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने लोकसभा में स्पष्ट किया था कि कि ‘लव जिहाद’ शब्द मौजूदा भारतीय कानूनों के तहत कोई परिभाषित शब्द नहीं है। इसके साथ उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी धर्म को स्वीकारने, उस पर अमल करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की आजादी देता है।

जब न्यायपालिका ने मानवाधिकार को किया स्पष्ट

साल 2020 में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने लोकसभा में स्पष्ट किया था कि कि ‘लव जिहाद’ शब्द मौजूदा भारतीय कानूनों के तहत कोई परिभाषित शब्द नहीं है। इसके साथ उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी धर्म को स्वीकारने, उस पर अमल करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की आजादी देता है। भारतीय संविधान का आर्टिकल 21 सभी को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अगर सरल शब्दों में कहे तो, आर्टिकल 21 के तहत राज्य बिना कानूनी और न्यायसंगत प्रक्रिया के किसी व्यक्ति की जीवन, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित नहीं कर सकता है। इसके अंतर्गत शादी करने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अहम हिस्सा है और साथ ही यह इंसान की व्यक्तिगत पसंद का मामला है। बीते दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में इस बात को साफ किया कि अपनी मर्जी से शादी करने वाले युवाओं को अपने लाइफ पार्टनर का चुनाव करने के लिए समाज की स्वीकृति की जरूरत नहीं है। समाज, परिवार और माता-पिता ऐसे मामलों में कोई दखल नहीं कर सकते है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के मामले में जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि सहमति से शादी करना एकदम सही है। ऐसे निर्णयों को समाज और परिवार द्वारा सम्मान दिया जाना चाहिए, खासकर जब दोनों व्यक्ति युवा हों। भारतीय न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से विवाह करने का मौलिक अधिकार है। साल 2018 के शफीन जहान बनाम अशोकन के.एम. (हादिया केस) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपनी पसंद से शादी करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। साल 2021 के लक्ष्मीबाई चंदरागी बनाम कर्नाटक राज्य में भी कोर्ट ने दलील दी कि विवाह के लिए परिवार या समुदाय की अनुमति आवश्यक नहीं है। साथ ही, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि साथी विवाह संवैधानिक अधिकार है और उत्तर प्रदेश का धर्मांतरण-विरोधी कानून अंतरधार्मिक विवाह या लिव-इन संबंधों पर रोक नहीं लेगा। इसलिए, विवाह पंजीकरण से जुड़े ऐसे बदलाव जो इन अधिकारों को सीमित करें, वे संवैधानिक और मानवीय अधिकारों का उल्लंघन हो सकते हैं।

यह एक व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। लेकिन मुझे लगता है कि गुजरात में इसे बहुत अधिक विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि यह कानून केवल इस्लामोफ़ोबिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह गहराई से पितृसत्तात्मक और जातिवादी सामाजिक धारणा से पैदा हुआ है।

गुजरात सरकार के हालिया फैसले को लेकर दिल्ली में पढ़ाई कर रही गुजरात की 26 वर्षीय जान्हवी सोधा कहती हैं, “यह एक व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। लेकिन मुझे लगता है कि गुजरात में इसे बहुत अधिक विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि यह कानून केवल इस्लामोफ़ोबिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह गहराई से पितृसत्तात्मक और जातिवादी सामाजिक धारणा से पैदा हुआ है। यह एक ऐसे समाज का विचार है, जहां प्रेम को समाज और संस्कृति के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है।” आंकड़ें बताते हैं कि देश में आज अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों की संख्या बहुत कम है। साल 2025 की इंडिया टुडे की सकल घरेलू व्यवहार सर्वेक्षण में देश में 61 फीसदी लोगों ने अंतरधार्मिक शादियों और 56 फीसदी लोगों ने अंतरजातीय शादियों को लेकर विरोध जताया था। भारत में अलग-अलग धर्म और जाति के लोगों की शादियों का अक्सर विरोध किया जाता है। यह विरोध सिर्फ हिंदू-मुस्लिम शादी तक सीमित नहीं है। कई बार हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और यहां तक कि एक ही धर्म की अलग-अलग जातियों के लोगों को भी शादी करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।   

इस पर दिल्ली में पढ़ाई कर रही गुजरात की रहने वाली 24 वर्षीय निकिता चौहान (बदला हुआ नाम) कहती हैं, “मेरे विचार में यदि दो लोग कानूनी रूप से अडल्टस् हैं और अपनी मर्जी से शादी करने का निर्णय लेते हैं, तो कोई भी सरकार उन्हें अपने माता-पिता से अनुमति लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। युवाओं को अपने जीवन के निर्णय खुद लेने का अधिकार है, जिसमें यह भी शामिल है कि वह किससे विवाह करें। सरकार को लोगों को जबरदस्ती, धोखे और दबाव में कराए गए विवाह से संरक्षण देना चाहिए। लेकिन इसके लिए माता-पिता की अनुमति अनिवार्य करने के बजाय, सरकार ऐसे अन्य नियम बना सकती है जो धोखाधड़ी और शोषण को रोके। महिलाओं की सुरक्षा के नाम उनके निर्णय लेने की स्वतंत्रता को छीना नहीं जाना चाहिए।”

मेरे विचार में यदि दो लोग कानूनी रूप से अडल्टस् हैं और अपनी मर्जी से शादी करने का निर्णय लेते हैं, तो कोई भी सरकार उन्हें अपने माता-पिता से अनुमति लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। युवाओं को अपने जीवन के निर्णय खुद लेने का अधिकार है, जिसमें यह भी शामिल है कि वह किससे विवाह करें।

गुजरात सरकार का दावा है कि उन्हें प्रेम विवाह से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन शादी के नाम पर महिलाओं के साथ धोखा और शोषण करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाई कर रहे गुजरात के 22 वर्षीय नोमान खान कहते हैं, “मैं एक गुजराती मुस्लिम हूं। मेरे मां-बाप खुद मुझसे अपेक्षा रखते है कि मैं एक मुस्लिम लड़की से ही शादी करूं। शादी जैसे फैसले पर कोई किसी लड़की पर क्यों दबाव डालेगा। अगर सरकार के तर्क को मान भी लिया जाए तो यह साफ तौर पर यह उनकी महिलाओं के प्रति लैंगिक पूर्वाग्रह की सोच को उजागर करता है।” भारतीय समाज में महिलाओं को अक्सर सुरक्षा की वस्तु के रूप में देखा जाता है, जिससे उनकी एजेंसी प्रभावित होती है। राज्य द्वारा माता-पिता को सूचना देने का जोर पितृसत्तात्मक सोच और लैंगिक पूर्वाग्रह को मजबूत करता है। इससे प्रेम, अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों में भी महिलाओं की पसंद पर परिवार और समाज का नियंत्रण बना रहता है।

दिल्ली में रहने वाले गुजरात के 24 वर्षीय जतिन सिंह कहते हैं, “यह कानून महिलाओं के अधिकार को कम करता है। विवाह पंजीकरण के समय उन्हें अपने माता-पिता की जानकारी देना ज़रूरी किया जाता है। इस तरह राज्य महिलाओं के निजी जीवन में दखल देता है और खुद को उनकी सुरक्षा करने वाला दिखाकर नियंत्रण बनाए रखता है।” गुजरात सरकार का विवाह पंजीकरण में नया नियम, जिसमें माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य किया गया है, लोगों के विशेष कर महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर सीधे प्रभाव डालता है। जबकि सरकार इसे महिलाओं की सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने के लिए ठहराती है, असल में ये पितृसत्तात्मक और जातिवादी सोच को मजबूत करने वाला कदम है। यह नियम विशेष रूप से अंतरजातीय, अंतरधार्मिक और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं की एजेंसी और स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। न्यायपालिका की स्पष्ट राय और संविधान के अनुच्छेद 21 के अधिकारों के अनुसार, शादी का निर्णय व्यक्ति की अपनी मर्जी और अधिकार का हिस्सा होना चाहिए।

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