नारीवाद साइबर स्पेस और नारीवादी राजनीति में साइबर फेमिनिज़्म का उभार

साइबर स्पेस और नारीवादी राजनीति में साइबर फेमिनिज़्म का उभार

साइबर फेमिनिज़्म का विचारधारा सबसे पहले अमेरिकी प्रोफेसर और नारीवादी विचारक डोना हार्वे के साल 1985 में लिखे गए एक लेख ‘अ साइबॉर्ग मेनिफेस्टो’ में मिलता है। इस लेख में हार्वे ने साइबर फेमिनिज़्म शब्द का इस्तेमाल सीधे तौर पर नहीं किया लेकिन जेंडर, टेक्नोलॉजी और फेमिनिज़्म के आपसी संबंधों के बारे में नए सिरे से लिखने का काम किया।

इंटरनेट आज हमारी ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा बन चुका है। सामाजिक, राजनीतिक हो या फिर नेटवर्किंग डिजिटल दुनिया ने हर मामले में नई संभावनाओं के रास्ते खोले हैं। सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने लोगों को अपनी आवाज़ उठाने के लिए भरपूर अवसर दिए हैं। इसी के साथ नारीवादी आंदोलनों और अभियानों पर भी इसका असर देखा जा सकता है। आज के डिजिटल युग में फेमिनिज़्म केवल सड़कों, विश्वविद्यालय या फिर सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं रहा बल्कि इंटरनेट और नई तकनीक के इस्तेमाल से दुनिया भर में अपनी पहुंच बना रहा है। महिलाओं और हाशिए पर मौजूद दूसरे जेंडर्स को अपनी बात रखने और उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने में इंटरनेट ख़ासकर सोशल मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है।फेमिनिज़्मऔर तकनीक के इस मेल को ही साइबर फेमिनिज़्म कहा जाता है।

साइबर फेमिनिज़्म एक ऐसा नजरिया है जो डिजिटल तकनीक के माध्यम से महिलाओं और दूसरे हाशिए पर मौजूद समुदाय की आवाज़, अधिकार और विचार को समझने की कोशिश करता है। यह तकनीक के इस्तेमाल से जेंडर इक्वलिटी और समावेशिता सुनिश्चित करने की बात करता है। यह बताता है कि डिजिटल दुनिया केवल तकनीक का क्षेत्र नहीं है बल्कि यह ऐसा सामाजिक और राजनीतिक मंच भी है जिसके माध्यम से लैंगिक भेदभाव ख़त्म कर बराबरी के लिए रास्ते बनाए जा सकते हैं। 1990 के दशक में शुरू हुआ साइबर फेमिनिज़्म आज ऑनलाइन एक्टिविज़्म का मजबूत पैरोकार बन चुका है।

साइबर फेमिनिज़्म एक ऐसा नजरिया है जो डिजिटल तकनीक के माध्यम से महिलाओं और दूसरे हाशिए पर मौजूद समुदाय की आवाज़, अधिकार और विचार को समझने की कोशिश करता है। यह तकनीक के इस्तेमाल से जेंडर इक्वलिटी और समावेशिता सुनिश्चित करने की बात करता है।

साइबर फेमिनिज़्म की शुरुआत और इतिहास 

साइबर फेमिनिज़्म का विचारधारा सबसे पहले अमेरिकी प्रोफेसर और नारीवादी विचारक डोना हार्वे के साल 1985 में लिखे गए एक लेख ‘अ साइबॉर्ग मेनिफेस्टो’ में मिलता है। इस लेख में हार्वे ने साइबर फेमिनिज़्म शब्द का इस्तेमाल सीधे तौर पर नहीं किया लेकिन जेंडर, टेक्नोलॉजी और फेमिनिज़्म के आपसी संबंधों के बारे में नए सिरे से लिखने का काम किया। इन्होंने साइबॉर्ग का कॉन्सेप्ट दिया जिसका मतलब है- आधा इंसान+आधा मशीन यानी इंसान की मशीनों पर निर्भरता इतनी बढ़ती जा रही है कि उसे मशीनों से अलग देखना मुश्किल है। साइबर फेमिनिज़्म शब्द का इस्तेमाल पहली बार 90 के दशक में ब्रिटिश फिलॉसफर और नारीवादी विचारक सैडी प्लांट ने किया था।

इन्होंने इसके साथ ही यह समझने की कोशिश की थी कि महिलाएं किस तरह से साइबर स्पेस और नई तकनीक के साथ जुड़कर एकजुट हो सकती हैं और अपनी आवाज़ को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचा सकती हैं। 90 के ही दशक में ऑस्ट्रेलियन महिलाओं का जाना माना आर्ट ग्रुप वी एन एस मैट्रिक्स में साइबर फेमिनिज़्म के कॉन्सेप्ट को आर्ट्स के साथ डिजिटल दुनिया से जोड़ा। इस तरह से सैडी प्लांट और ‘वी एन एस मैट्रिक्स’ ने साइबर फेमिनिज़्म के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिये। इस पर थर्ड वेव फेमिनिज़्म का भी असर था जिसने फेमिनिज़्म के क्षेत्र में विविधता, समावेशिता और इंटरसेक्शनैलिटी को महत्त्व दिया।

जर्मनी में साल 1997 से 2001 तक सक्रिय रहा साइबर फेमिनिस्ट अलायंस ओबीएन (ओल्ड बॉयज नेटवर्क) का कहना था कि साइबर फेमिनिज़्म को एक परिभाषा में बांधना ही ग़लत है। यह पूरी तरह से खुला और लचीला है। ओबीएन ने 100 ऐसी बातें लिखी जो कि साइबर फेमिनिज़्म नहीं है, जो कि ‘100 एंटीथीसिस’ के नाम से जाना जाता है।

क्या है साइबर फ़ेमिनिज़्म?

साइबर फेमिनिज़्म को एक ऐसी विचारधारा या आंदोलन के रूप में समझा जा सकता है जो फेमिनिज़्म को इंटरनेट, साइबर स्पेस और डिजिटल टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ता है। 1990 के दशक में जब इंटरनेट और कंप्यूटर आम लोगों तक पहुंचने लगा था, उस समय कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी को ज़्यादातर पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। इसी समय नारीवादी आंदोलनों में सक्रिय कुछ कार्यकर्ताओं ने पितृसत्ता के पारंपरिक ढांचे को तोड़ने और बराबरी लाने के अपने मुहिम को टेक्नोलॉजी से जोड़ने का काम किया। अपनी आवाज़ को मजबूती से रखने और दुनिया तक पहुंचाने के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल उस समय में एक बड़ी क्रांति की शुरुआत थी, जिसका असर समय के साथ बढ़ता गया। इस तरह अब इंटरनेट के माध्यम से फेमिनिस्ट मूवमेंट्स जेंडर, जाति, धर्म और जगह की सीमाओं को पार करते हुए दुनिया भर में फैलने लगे।

जर्मनी में साल 1997 से 2001 तक सक्रिय रहा साइबर फेमिनिस्ट अलायंस ओबीएन (ओल्ड बॉयज नेटवर्क) का कहना था कि साइबर फेमिनिज़्म को एक परिभाषा में बांधना ही ग़लत है। यह पूरी तरह से खुला और लचीला है। ओबीएन ने 100 ऐसी बातें लिखी जो कि साइबर फेमिनिज़्म नहीं है, जो कि ‘100 एंटीथीसिस’ के नाम से जाना जाता है। साल 2017 में महिलाओं के यौन हिंसा के ख़िलाफ़ अमेरिका से शुरू होकर दुनिया भर में फैला #मीटू मूवमेंट साइबर फेमिनिज़्म की कैटेगरी में ही आता है। इस तरह किसी भी तरह के भेदभाव और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ और बराबरी के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से किया गया आंदोलन साइबर फेमिनिज़्म है।

1990 के दशक में जब इंटरनेट और कंप्यूटर आम लोगों तक पहुंचने लगा था, उस समय कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी को ज़्यादातर पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। इसी समय नारीवादी आंदोलनों में सक्रिय कुछ कार्यकर्ताओं ने पितृसत्ता के पारंपरिक ढांचे को तोड़ने और बराबरी लाने के अपने मुहिम को टेक्नोलॉजी से जोड़ने का काम किया।

इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स, एआई, गेमिंग, कोडिंग, क्रिप्टो करेंसी और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना भी इसी का हिस्सा है। इस तरह से साइबर फेमिनिज़्म तकनीक और डिजिटल दुनिया में पहले से मौजूद पुरुष वर्चस्व को चुनौती देने का काम भी करता है। इसके साथ ही यह डिजिटल दुनिया जैसे विज्ञापन, फ़िल्म और दूसरे ऑनलाइन कंटेंट्स में महिलाओं को ऑब्जेक्टिफ़ाई करने की आलोचना करता है। साइबर फेमिनिज़्म आज इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और एक्स जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर तेजी से फैल रहा है और ख़ासतौर पर हाशिए मौजूद लोगों के लिए एक मंच देने का काम कर रहा है।

भारत में साइबर फेमिनिज़्म का विकास 

भारत में साइबर फेमिनिज़्म पश्चिमी देशों से काफ़ी अलग है। यहां ये ज़्यादातर जेंडर आधारित भेदभाव का विरोध, किसी भी तरह की हिंसा की ऑनलाइन और ऑफलाइन हिंसा के ख़िलाफ़ सामूहिक रूप से आवाज उठाने और हैशटैग एक्टिविज्म के रूप में देखा जा सकता है। इसे फोर्थ वेवफेमिनिज़्म का हिस्सा माना जाता है जहां सोशल मीडिया ने महिलाओं को एकजुट होने, अपनी बात रखने और पितृसत्ता को चुनौती देने का मौका दिया। यहां की पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में जाति, धर्म, जेंडर और यौनिकता के आधार पर पूर्वाग्रह, हिंसा और भेदभाव शामिल है। एआई और टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही नई तरह की चुनौतियां देखी जा रही हैं। डीपफ़ेक, डॉक्सिंग, आउटिंग, ट्रोलिंग, मॉर्फ्ड इमेज और ब्लैकमेलिंग जैसी समस्याएं एआई और टेक्नोलॉजी का ग़लत इस्तेमाल करके बनाई जा रही हैं। 

पिछले लगभग एक दशक से डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का इस्तेमाल कर बहुत सारे हैशटैग आंदोलन चलाए गए जिसका काफ़ी असर देखा गया। #मीटूइंडिया, #व्हाईलॉइटर, #पिंजरातोड़, #दलितलाइव्समैटर जैसे आंदोलन सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे देश भर में फैले और अपना असर छोड़ा। इसके अलावा महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले यौन उत्पीड़न और हिंसा के ख़िलाफ़ भी समय-समय पर हैशटैग मूवमेंट्स चले जिसने देश की जनता को आंदोलित किया जिसका असर प्रशासनिक कार्रवाइयों में भी देखा गया। देश में होने वाला साइबर फेमिनिज़्म इंटरसेक्शनल और समावेशी पहलू को भी दिखाता है जिसने न सिर्फ़ महिलाओं बल्कि हाशिए पर मौजूद समुदायों जैसे एलजीबीटीक्यू+, दलित और अल्पसंख्यकों को भी शामिल किया।

पिछले लगभग एक दशक से डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स का इस्तेमाल कर बहुत सारे हैशटैग आंदोलन चलाए गए जिसका काफ़ी असर देखा गया। #मीटूइंडिया, #व्हाईलॉइटर, #पिंजरातोड़, #दलितलाइव्समैटर जैसे आंदोलन सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे देश भर में फैले और अपना असर छोड़ा।

साइबर फेमिनिज़्म के सामने आने वाली चुनौतियां

डिजिटल स्पेस में जेंडर इक्वलिटी की लड़ाई लड़ रहा साइबर फेमिनिज़्म आज कई चुनौतियों से जूझ रहा है। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल जहां बराबरी और सशक्तीकरण के लिए किया जा रहा है वहीं पर इसका ग़लत इस्तेमाल नई-नई समस्याएं पैदा कर रहा है। साल 2020 के दशक में एआई और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से ख़ासतौर पर महिला एक्टिविस्ट्स को साइबर हरासमेंट, ट्रोलिंग, डीपफेक, डॉक्सिंग का निशाना बनाया जा रहा है। ज़्यादातर देशों में इसके ख़िलाफ़ कोई मजबूत क़ानूनी ढांचा नहीं है। इसके साथ ही टेक इंडस्ट्री में महिलाओं और हाशिए पर मौजूद समुदायों की भागीदारी सीमित है जिसकी वजह से एआई और टेक्नोलॉजी के एल्गोरिथम में पूर्वाग्रह बना रहता है। दुनिया भर में मौजूद डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स की जवाबदेही पर भी कोई ख़ास गाइडलाइन मौजूद नहीं है साथ ही सरकारी सेंसरशिप भी साइबर फेमिनिज़्म को कमजोर करने का काम कर रहा है।

इन सब चुनौतियों के बावजूद सोशल मीडिया समेत तमाम दूसरे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर मौजूद साइबर फ़ेमिनिस्ट बराबरी पर आधारित समावेशी समाज बनाने की दिशा में ज़रूरी काम कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से दूर दराज के इलाकों के लोग भी अपनी बात देश और दुनिया तक पहुंचा रहे हैं। इन प्लेटफ़ॉर्म्स पर महिलाओं, क्वीयर, दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों की पहुंच और भागीदारी बढ़ रही है, जो कि बेहद ज़रूरी है। लेकिन, इसके साथ ही एआई और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वंचित समुदायों की भागीदारी बढ़ानी होगी जिससे उन्हें सिस्टम में रहकर अपने लिए नीतियां बनाने का मौका मिले। इसके अलावा डिजिटल स्पेस में महिलाओं और दूसरे समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी जिससे बिना डर के सभी अपनी बात रख सकें। इसके लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स को जवाबदेह बनाना ज़रूरी है। साथ ही महिलाओं को टेक्नोलॉजी से जोड़ने के लिए भी ख़ास तौर पर काम करना पड़ेगा क्योंकि भारत जैसे देश में अभी भी बहुत सारे ऐसे पिछड़े इलाके हैं जहां महिलाओं की पहुंच सीमित है। साइबर फेमिनिज़्म हमें बताता है कि इंटरनेट और टेक्नोलॉजी केवल टूल नहीं है बल्कि भागीदारी, बराबरी और सत्ता का माध्यम भी है। इसलिए डिजिटल स्पेस को सुरक्षित और समावेशी बनाना तकनीकी चुनौती नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक ज़िम्मेदारी की है।

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