भारतीय हिंदी सिनेमा में जहां आज फीमेल-सेंट्रिक फिल्मों की चर्चा एक नए ट्रेंड की तरह की जाती है। वहीं भारतीय इतिहास में जब मुख्यधारा की फिल्मों में महिलाओं किरदारों को अक्सर आदर्श महिला, बेटी, पत्नी, बहू या फिर माँ के रूप में दिखाया जाता था, तब साल 1970 और 1980 के दशक के सामानांतर सिनेमा ने इन रुढ़िवादी छवियों को तोड़ने का काम किया। उस दौर की अर्थ, मिर्च मसाला, रिहाई और मंडी जैसी फिल्मों ने पितृसत्ता, घरेलू हिंसा, यौन हिंसा, यौनिकता और महिलाओं की आज़ादी से जुड़े मुद्दों को बहुत ही संवेदनशील तरीके से दिखाया। इन फिल्मों की खास बात यह थी कि उन्होंने महिलाओं को केवल सर्वाइवर या कमजोर महिला के रूप में नहीं दिखाया, बल्कि हिंसा के खिलाफ अवाज़ उठाने वाली महिला के किरदार में भी दिखाया।
इन फिल्मों में महिलाएं अकेले नहीं, बल्कि सामूहिक तौर पर भी अन्याय के खिलाफ खड़ी होती दिखाई देती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि समानांतर सिनेमा ने महिलाओं के अनुभवों को और भी वास्तविक तरीके से प्रस्तुत किया। इसका प्रभाव केवल कुछ फिल्मों तक सीमित नहीं था। इस आंदोलन ने भारतीय सिनेमा में एक अलग नजरिया विकसित किया, जिसमें समाज के हाशिए पर मौजूद लोगों की कहानियों को भी महत्व मिला। उन फिल्मों ने यह स्पष्ट किया कि महिलाओं के अनुभव केवल निजी नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं से गहराई से जुड़े होते हैं। यही कारण है कि समानांतर सिनेमा को भारतीय सिनेमा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक शुरुआत के रूप में देखा जाता है।
भारतीय हिंदी सिनेमा में जहां आज फीमेल-सेंट्रिक फिल्मों की चर्चा एक नए ट्रेंड की तरह की जाती है। वहीं भारतीय इतिहास में जब मुख्यधारा की फिल्मों में महिलाओं किरदारों को अक्सर आदर्श महिला, बेटी, पत्नी, बहू या फिर माँ के रूप में दिखाया जाता था, तब साल 1970 और 1980 के दशक के सामानांतर सिनेमा ने इन रुढ़िवादी छवियों को तोड़ने का काम किया।
साल 1970 से 1980 के दशक में समानांतर सिनेमा का उदय
साहित्य कुंज में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक, साल 1970 और 1980 के दशक में हिंदी सिनेमा में समानांतर सिनेमा उभरकर सामने आया और उसने अपनी अलग पहचान बनाई। इस आंदोलन ने व्यावसायिक मनोरंजन से अलग सामाजिक यथार्थ, वर्ग, जाति, लैंगिक असमानता और ग्रामीण जीवन जैसे मुद्दों को केंद्र में लाने में अपनी अहम भूमिका निभाई। हालांकि समानांतर सिनेमा को सशक्त बनाने में कई निर्देशकों की भूमिका रही, जिसमें निर्देशक श्याम बेनेगल ने फिल्म अंकुर के निर्देशन से सिनेमा जगत में कदम रखा। ख़ास बात ये थी कि इस फिल्म को न केवल समीक्षकों की सराहना मिली, बल्कि यह व्यावसायिक रूप से भी सफल रही और इसे समानांतर सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है।
इसके बाद उन्होंने निशांत, भूमिका, जुनून और मंडी जैसी कई फिल्मों का निर्देशन किया, जिन्होंने समानांतर सिनेमा की परंपरा को और मजबूत बनाया और दर्शकों को इसकी ओर आकर्षित किया। इस दौर के समानांतर सिनेमा ने नए और युवा कलाकारों की एक पूरी नई पीढ़ी को फिल्मों में स्थापित होने का अवसर दिया। इनमें शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल आदि महिला कलाकार काफी सुर्ख़ियों में रहीं। इस आंदोलन में फिल्मकारों ने कहानी कहने के नए तरीके अपनाए और ऐसे विषय चुने जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर नज़रअंदाज़ करता था। इसी कारण महिलाओं के जीवन और संघर्षों को भी ज्यादा असलियत और गहराई से दिखाने की जगह मिली।
साल 1970 और 1980 के दशक में हिंदी सिनेमा में समानांतर सिनेमा उभरकर सामने आया और उसने अपनी अलग पहचान बनाई। इस आंदोलन ने व्यावसायिक मनोरंजन से अलग सामाजिक यथार्थ, वर्ग, जाति, लैंगिक असमानता और ग्रामीण जीवन जैसे मुद्दों को केंद्र में लाने में अपनी अहम भूमिका निभाई।
त्यागमयी पत्नी की छवि से आगे महिलाओं की एजेंसी और इच्छा
मुख्यधारा की फिल्मों में महिलाओं को अक्सर त्यागमयी पत्नी और आदर्श महिला और माँ की छवि में दिखाया जाता रहा है। लेकिन समानांतर सिनेमा ने इस रुढ़िवादी छवि को तोड़ा। इसका एक उदाहरण, इस दौर में साल 1982 में निर्देशक महेश भट्ट की फिल्म ‘अर्थ’ आई, जिसने रिश्तों और स्त्री-जीवन को एक नई दृष्टि से परदे पर रखा। यह फिल्म सिर्फ एक शादी या प्रेम की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें एक महिला के दर्द, अकेलेपन, संघर्ष और आत्मसम्मान को बेहद संवेदनशील तरीके से दिखाया गया है। फिल्म यह संदेश देती है कि जब एक महिला का पति उसके साथ नहीं रहता है, तो हो सकता है, वो भावनात्मक तौर पर आहत हो, टूट भी जाए लेकिन बिखरती नहीं। वह अपने भीतर की ताक़त को पहचानती है और नए रास्ते तलाशने का साहस जुटाती है। फिल्म का सबसे बड़ा संदेश यही है कि एक महिला को जीने के लिए किसी मर्द के सहारे की ज़रूरत नहीं। अगर वह ठान ले, तो अकेले भी अपनी पहचान बना सकती है और नई ज़िंदगी की शुरुआत कर सकती है।
इस तरह समानांतर सिनेमा की कई फिल्मों ने शादी संस्था के भीतर मौजूद असमानताओं को उजागर किया। इनमें एक उदाहरण फिल्म रिहाई का भी देखा जा सकता है। इसका निर्देशन फिल्म निर्माता अरुणा राजे ने किया, यह महिलाओं की पसंद, यौन इच्छा और सबसे महत्वपूर्ण, नारीवादी दृष्टिकोण को संबोधित करने वाली एक क्रांतिकारी फिल्म है। फिल्म की कहानी में, पुरुष रोज़गार के लिए शहरों में चले जाते हैं और महिलाएं खेतों में काम करने और परिवार की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए गाँव में रह जाती हैं। घर से दूर रहने के दौरान पुरुषों के लिए शादी के बाहर संबंध बनाना सामान्य माना जाता है। वे इसे अपनी स्वाभाविक ज़रूरत समझते हैं और मानते हैं कि उनकी मेहनत उन्हें ऐसा करने का अधिकार देती है।लेकिन यही नियम उनकी पत्नियों पर लागू नहीं होता। यह फिल्म महिलाओं के नज़रिए से शारीरिक इच्छा, शादी के बाहर संबंधों और समाज में मौजूद लैंगिक पाखंड को सामने लाती है।
साल 1982 में निर्देशक महेश भट्ट की फिल्म ‘अर्थ’ आई, जिसने रिश्तों और स्त्री-जीवन को एक नई दृष्टि से परदे पर रखा। यह फिल्म सिर्फ एक शादी या प्रेम की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें एक महिला के दर्द, अकेलेपन, संघर्ष और आत्मसम्मान को बेहद संवेदनशील तरीके से दिखाया गया है।
हिंसा, सत्ता और स्त्री प्रतिरोध की कहानियां
इन फिल्मों ने पितृसत्ता के हिंसक और दमनकारी रूप को भी सामने लाने में अहम भूमिका निभाई। इसका एक उदाहरण है, निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म निशांत, इस फिल्म की कहानी एक जमींदार परिवार के चार भाइयों के इर्द – गिर्द घूमती दिखाई देती है, जो कि महिलाओं को एक वस्तु की तरह समझते हैं, जिनके लिए किसी महिला के साथ बलात्कार करना आम बात है। एक दिन वह गाँव की एक महिला सुशीला का बलात्कार करते हैं। लेकिन मदद मांगने पर भी स्थानीय पुलिस अधिकारी से लेकर ज़िला कलेक्टर तक कोई उसकी और उसके परिवार की मदद नहीं करता है। फिल्म बताती है कि पितृसत्ता केवल एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे गांव का सामाजिक ढांचा है, जो हिंसा को सामान्य बना देता है।
इसी तरह उंबरठा साल 1982 में बनी एक भारतीय ड्रामा फिल्म है , जिसे डी.वी. राव ने प्रोड्यूस किया और जब्बार पटेलने निर्देशित और सह-प्रोड्यूस किया। यह एक महिला के अपने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर समाज में बदलाव लाने के सपने की कहानी है। फिल्म की नायिका सुधार गृह की सुपरिंटेंडेंट बनकर घर छोड़ देती है। वहां वह उन महिलाओं से मिलती है, जो पति के मार-पीट, बलात्कार और मानसिक हिंसा का सामना कर चुकी होती हैं। फिल्म इन महिला कैदियों की कहानियों के माध्यम से घरेलू हिंसा के हर एक पहलू को सामने लाती है।
इन फिल्मों ने पितृसत्ता के हिंसक और दमनकारी रूप को भी सामने लाने में अहम भूमिका निभाई। इसका एक उदाहरण है, निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म निशांत, इस फिल्म की कहानी एक जमींदार परिवार के चार भाइयों के इर्द – गिर्द घूमती दिखाई देती है, जो कि महिलाओं को एक वस्तु की तरह समझते हैं।
इसके अलावा समानांतर सिनेमा का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के सामूहिक प्रतिरोध को दिखाना था। इसका एक उदाहरण साल 1987 की फिल्म मिर्च मसाला एक सामाजिक-राजनीतिक ड्रामा फ़िल्म है, जिसका निर्देशन केतन मेहता ने किया था। इस फिल्म में गांव की महिलाएं मिलकर एक अत्याचारी अधिकारी का सामना करती हैं। इस तरह फिल्म मंडी में सेक्स वर्कर महिलाओं के जीवन और उनके सामूहिक संघर्ष को दिखाया गया है। ये फिल्में बताती हैं कि अकेली महिला नहीं, बल्कि सामूहिक शक्ति ही पितृसत्ता के रुढ़िवादी नियमों को तोड़ सकती है।
हाशिए की कहानियों को केंद्र में लाता समानांतर सिनेमा
समानांतर सिनेमा ने ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं की कहानियों को भी महत्व दिया। इसमें रुदाली एक हिंदी सामाजिक नाटक फ़िल्म है, जिसका निर्देशन कल्पना लाज्मी ने किया था। इस फिल्म में डिंपल कपाडियाने शनिचरी का किरदार निभाया है, जो एक अकेली और कठोर महिला है। जो जीवन भर दुर्भाग्य और परित्याग झेलने के बावजूद, वह रोकर अपने दुख को व्यक्त नहीं कर पाती और उसे पेशेवर शोक व्यक्त करने वाली यानी रुदाली के रूप में एक नया काम मिलता है । यह फिल्म वर्ग, जाति और भावनात्मक दमन और शोषण की जटिलताओं को सामने लाती है, कि किस तरह गरीवी, जेंडर और जाति किसी महिला को हाशिए पर धकेलते हैं। इसी तरह उंबरठा में भी एक मध्यमवर्गीय महिला की आज़ादी की लड़ाई दिखाई गई। ये फिल्में शहर-केंद्रित नहीं, बल्कि गांव की दलित और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं पर की जिंदगी और उनकी समस्याओं से रूबरू करवाती हैं।
रुदाली एक हिंदी सामाजिक नाटक फ़िल्म है, जिसका निर्देशन कल्पना लाज्मी ने किया था। इस फिल्म में डिंपल कपाडियाने शनिचरी का किरदार निभाया है, जो एक अकेली और कठोर महिला है। जो जीवन भर दुर्भाग्य और परित्याग झेलने के बावजूद, वह रोकर अपने दुख को व्यक्त नहीं कर पाती है।
इन फिल्मों में महिलाओं को वेचारी और सर्वाइवर नहीं बल्कि एक योद्धा की तरह दिखाया गया है। समानांतर सिनेमा ने भारत में फिल्म सोसाइटी आंदोलन ने वैकल्पिक सिनेमा की समझ को विकसित किया। साथ ही सरकार की ओर से भी इसे कुछ संस्थागत समर्थन मिला। हालांकि भारतीय राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) की स्थापना साल 1975 में हुई थी। एनएफडीसी ने भारतीय सिनेमा, खासकर साल 1970 और 1980 के दशक के समानांतर सिनेमा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनएफडीसी (और इसके पहले के फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन) ने अब तक 300 से अधिक फिल्मों को वित्तीय सहायता दी है या उनका निर्माण किया है। इस आर्थिक सहयोग ने फिल्मकारों को व्यावसायिक दबाव से कुछ हद तक मुक्त होकर सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने की आज़ादी दी।
आज हिंदी सिनेमा में भले ही कई फिल्मों को फीमेल-सेंट्रिक कहा जाता है, लेकिन अक्सर उनकी कहानी किसी पुरुष पात्र के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। ऐसे में अक्सर एक सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या फीमेल-सेंट्रिक का मतलब केवल महिलाओं की मौजूदगी है, या फिर उनकी वास्तविक एजेंसी और आज़ादी की कहानी भी? समानांतर सिनेमा ने भारतीय सिनेमा में महिलाओं को देखने का एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इन फिल्मों ने यह दिखाया कि महिलाओं की कहानियां केवल प्रेम, त्याग या परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सत्ता, हिंसा, श्रम, इच्छा और प्रतिरोध से भी जुड़ी हुई हैं। आज जब हिंदी सिनेमा में फीमेल-सेंट्रिक फिल्मों की बात की जाती है, तब यह याद रखना जरूरी है कि इसकी बुनियाद कई दशक पहले समानांतर सिनेमा ने ही रखी थी। इन फिल्मों ने न केवल पितृसत्ता को चुनौती दी, बल्कि महिलाओं की एजेंसी, सामूहिक संघर्ष और आत्मनिर्भरता को भी सिनेमा की भाषा में मजबूती से स्थापित किया।

