संस्कृतिसिनेमा ‘एक्यूज्ड’: सत्ता, सेक्सुअलिटी और सोशल मीडिया ट्रायल पर एक जरूरी फिल्म

‘एक्यूज्ड’: सत्ता, सेक्सुअलिटी और सोशल मीडिया ट्रायल पर एक जरूरी फिल्म

'एक्यूज्ड' फिल्म क्वीयर रिश्तों की समस्याओं और उनके सामाजिक संघर्षों को किसी खास नजरिए से नहीं, बल्कि बहुत ही सामान्य और मानवीय संवेदना के साथ दिखाती है।

आज के समय में जब भारतीय सिनेमा लगातार सामाजिक मुद्दों को नए नजरिए से देखने की कोशिश कर रहा है, इसमें कुछ फिल्में ऐसी भी सामने आती हैं जो रुढ़िवादी समाज की बनी-बनाई धारणाओं को चुनौती देती हैं। निर्देशक अनुभूति कश्यप की निर्देशित और सीमा अग्रवाल और यश केसवानी की लिखित फिल्म एक्यूज्ड’ भी एक ऐसी ही फिल्म है, जो दर्शकों को असहज सवालों के बीच खड़ा करती है। यह फिल्म 27 फरवरी 2026 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई। फिल्म की शुरुआत में ही कुछ सेकंड के विजुअल्स के जरिए ‘एब्यूज’ से ‘एक्यूज्ड’ तक का बदलता शब्द और शीर्षक एक गहरी परत खोलता है, जो पूरी कहानी की बुनियाद बन जाता है। यह फिल्म साल 2018 में भारत तक पहुंचे मीटू आंदोलन की पृष्ठभूमि में सत्ता, शोषण और आरोपों के जटिल रिश्तों को नए नजरिए से प्रस्तुत करती है। 

अक्सर सिनेमा के पर्दे पर महिलाओं को केवल शोषित के तौर पर दिखाया जाता है। लेकिन एक्यूज्ड इस धारणा के विपरीत एक प्रभावशाली लेस्बियन महिला को आरोपी के कटघरे में खड़ा करती है। फिल्म आखिरी तक यह संदेश दे जाती है कि सत्ता का दुरुपयोग और शोषण कोई भी कर सकता है। मुख्य भूमिकाओं में कोंकणा सेन शर्मा और प्रतिभा रांटा ने न केवल अभिनय किया है, बल्कि किरदारों में जान फूंक दी है। यह फिल्म क्वीयर रिश्तों की समस्याओं और उनके सामाजिक संघर्षों को किसी खास नजरिए से नहीं, बल्कि बहुत ही सामान्य और मानवीय संवेदना के साथ दिखाती है।

डॉ. गीतिका लंदन की एक मशहूर और सफल क्वीयर गाइनेकोलॉजिस्ट हैं। उनकी पार्टनर मीरा भी पेशे से डॉक्टर हैं और दोनों लगभग दो सालों से एक -दूसरे के साथ शादीशुदा रिश्ते की तरह रह रहे होते हैं। गीतिका और मीरा की सहज केमिस्ट्री दर्शकों के मन में बैठे उन तमाम पूर्वाग्रहों को तोड़ देती है, जो क्वीयर जोड़ों को समाज से अलग समझते हैं।

क्वीयर पहचान और आरोपों का बोझ

फिल्म की शुरुआत अस्पताल के एक व्यस्त और भागदौड़ भरे कमरे से होती है। डॉ. गीतिका सेन के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देती है और वह कहीं जाने की जल्दी में होती हैं, लेकिन तभी एक इमरजेंसी सी-सेक्शन के कारण उन्हें रुकना पड़ता है। भारतीय मूल की डॉ. गीतिका लंदन की एक मशहूर और सफल क्वीयर गाइनेकोलॉजिस्ट हैं। उनकी पार्टनर मीरा भी पेशे से डॉक्टर हैं और दोनों लगभग दो सालों से एक -दूसरे के साथ शादीशुदा रिश्ते की तरह रह रहे होते हैं। गीतिका और मीरा की सहज केमिस्ट्री दर्शकों के मन में बैठे उन तमाम पूर्वाग्रहों को तोड़ देती है, जो क्वीयर जोड़ों को समाज से अलग समझते हैं। कहानी में असली मोड़ तब आता है, जब गीतिका पर एक मरीज यौन शोषण का आरोप लगाता है। आमतौर पर हम आरोपी को पुरुष और शोषित को महिला के रूप में देखने के आदी हैं, लेकिन एक्यूज्ड  इस  #मीटू नैरेटिव को उलट देती है। गीतिका पर यह आरोप तब लगता है, जब वह अस्पताल की डीन बनने के बेहद करीब होती हैं। शुरुआत में एक अज्ञात ईमेल से शुरू हुई शिकायतों की संख्या धीरे-धीरे 8 तक पहुंच जाती है। अस्पताल प्रबंधन उन पर जांच बैठा देता है और उन्हें छुट्टी पर भेज दिया जाता है।

जांच के दौरान गीतिका के जीवन की कई सच्चाईयां निकल कर सामने आती हैं जो शायद मीरा से भी छिपी थीं। गीतिका का स्वभाव हावी रहने वाला और सब कुछ अपने हिसाब से चलाने वाला है। वह सिर्फ अस्पताल में ही नहीं, बल्कि घर में भी अपने बनाए नियम अपने पार्टनर पर उनकी मर्जी के बिना लागू करती है। मीरा और गीतिका के बीच लगभग दस साल का अंतर है, और यही दूरी दोनों की सफलता में फर्क भी दिखाती है। वह अक्सर मीरा को अपनी कामयाबी के ताने देती है और उसे यह एहसास कराती है कि मीरा उतनी लायक और मेहनती नहीं है, जितनी वह रही है। गीतिका का हर चीज़ को परफेक्ट रखने का स्वभाव अस्पताल के जूनियर डॉक्टरों के लिए मुश्किल बन जाता है। जांच में सामने आता है कि उनके सख्त रवैए के कारण 50 से ज्यादा डॉक्टर इस्तीफा दे चुके थे। गीतिका एक बहुत ही प्राइवेट इंसान हैं, जो अपनी उलझनें अपनी पार्टनर मीरा से भी साझा नहीं करतीं। उसका यहीं रूखापन दोनों के बीच दूरियों की वजह बन जाता है।

मीरा और गीतिका के बीच लगभग दस साल का अंतर है, और यही दूरी दोनों की सफलता में फर्क भी दिखाती है। वह अक्सर मीरा को अपनी कामयाबी के ताने देती है और उसे यह एहसास कराती है कि मीरा उतनी लायक और मेहनती नहीं है, जितनी वह रही है।

मीरा, जो अब तक गीतिका की ढाल बनी हुई थी। धीरे-धीरे यह समझने लगती है कि वह एक ऐसे इंसान के साथ है जो उसे अपने काबिल नहीं समझती है। फिल्म के अंत तक गीतिका पर लगे इल्ज़ाम की सच्चाई सामने आती है, जो एकदम बेबुनियाद होते हैं। गीतिका की कामयाबी को देखते हुए डीन की कुर्सी हड़पने के चक्कर में एक डॉक्टर उसे बदनाम करने की साजिश रचता है। इन सबके बीच सिनेमा क्वीयर जोड़ो के संघर्षों को दर्शकों के बीच बिखेरता है। हालांकि भारत में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं मिली है। इसके चलते फिल्म भारतीय मूल की लंदन में रह रही सफल डॉक्टर गीतिका और मेरठ से आने वाली मीरा के क्वीयर पहचान को लेकर अंतरों को भी स्पष्ट करती है। जहां गीतिका के परिवार खुलेपन के साथ उस रिश्ते को सामान्य समझते हैं,  वहीं मीरा ने शादी के 2 साल होने के बाद भी अपनी पहचान घर वालों से छुपा कर रखी हुई थी।  

क्वीयर पहचान, पावर और रिश्तों की दरारें

पूरी कहानी में डॉ. गीतिका एक महत्वाकांक्षी, सख्त और अपने काम को लेकर बेहद गंभीर महिला के रूप में सामने आती हैं। उनके लिए करियर ही सबसे ज्यादा मायने रखता है। चाहे मीरा का बच्चा गोद लेने का फैसला हो या उसके भाई से मिलने की बात, गीतिका इन सब चीजों को ज्यादा अहमियत नहीं देतीं। उनकी दुनिया उनके काम और नाम तक ही सीमित रहती है। फिल्म सिर्फ उनके इस सख्त रवैए को नहीं दिखाती, बल्कि इसके पीछे की वजहों को भी समझने की कोशिश करती है। बेस्ट गाइनेकोलॉजिस्ट’ का यह मुकाम गीतिका को आसानी से नहीं मिला। उन्हें ऐसे समाज का सामना करना पड़ा, जहां उनकी समलैंगिक पहचान अक्सर उनके रास्ते में बाधा बनी। इसलिए उन्होंने खुद को दूसरों से कहीं ज्यादा काबिल साबित करने के लिए बहुत मेहनत की, ताकि यह दिखा सके कि एक समलैंगिक महिला भी अपने क्षेत्र में सबसे बेहतर हो सकती है। 

पूरी कहानी में डॉ. गीतिका एक महत्वाकांक्षी, सख्त और अपने काम को लेकर बेहद गंभीर महिला के रूप में सामने आती हैं। उनके लिए करियर ही सबसे ज्यादा मायने रखता है। चाहे मीरा का बच्चा गोद लेने का फैसला हो या उसके भाई से मिलने की बात, गीतिका इन सब चीजों को ज्यादा अहमियत नहीं देतीं।

गीतिका की जद्दोजहद इस बात के इर्द-गिर्द घूमती है कि वह इतनी कामयाब हो जाए कि उसकी क्वीयर पहचान पीछे छूट जाए और लोग उसे सिर्फ एक बेहतरीन डॉक्टर के रूप में देखें। लेकिन जैसे ही उस पर यौन शोषण का आरोप लगता है, यह भ्रम टूट जाता है, जब इतनी सफलता के बावजूद लोग बिना ठोस सबूत के भी उनकी सेक्सुअलिटी के आधार पर उसे दोषी मानने लगते हैं। फिल्म यहां एक और अहम मुद्दे की ओर इशारा करती है। सफल होने के बाद क्वीयर कपल्स के सामने यह सवाल खड़ा होता है कि वे अपनी निजी जिंदगी को कितना सार्वजनिक करें। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जो लोग खुद शोषित समुदाय से आते हैं, वे जब सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं, तो अनजाने में उसी पितृसत्तात्मक ढर्रे पर चलने लगते हैं, जिसके खिलाफ उन्होंने कभी लड़ाई लड़ी थी। यह फिल्म दिखाती है कि अगर सत्ता की चाह हद से ज्यादा बढ़ जाए, तो एक कामयाब क्वीयर महिला भी शोषणकारी बन सकती है। फिल्म के अंत में मीरा का अलग होने का फैसला, यह साबित करता है कि कामयाबी कभी भी सम्मान और समानता का विकल्प नहीं हो सकती।

सोशल मीडिया का अनैतिक रवैया

इस निजी और कानूनी खींचतान के बीच फिल्म आज के एक बेहद संवेदनशील मुद्दे को सामने लाती है, जैसे ही मामला सोशल मीडिया पर आता है, डिजिटल दुनिया के इन्फ्लुएंसर्स अपने-अपने फायदे के लिए इसे उछालने लगते हैं। इस हिस्से को फिल्म ने बहुत संवेदनशील तरीके से दिखाया है, जो काबिले-तारीफ है। फिल्म यह भी दिखाती है कि कैसे न्याय के नाम पर किसी की प्राइवेसी को तोड़-मरोड़कर व्यूज़ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जब क्रिएटर्स के गुमराह करने वाले और उकसाऊ वीडियो दर्शकों तक पहुंचते हैं, तो लोग बिना पूरी सच्चाई जाने ही गीतिका को दोषी मान लेते हैं। यह और भी चौंकाने वाला है कि कैसे एक इंसान की पूरी पहचान को ही उसके खिलाफ सबूत की तरह पेश कर दिया जाता है।

गीतिका की जद्दोजहद इस बात के इर्द-गिर्द घूमती है कि वह इतनी कामयाब हो जाए कि उसकी क्वीयर पहचान पीछे छूट जाए और लोग उसे सिर्फ एक बेहतरीन डॉक्टर के रूप में देखें। लेकिन जैसे ही उस पर यौन शोषण का आरोप लगता है, यह भ्रम टूट जाता है, जब इतनी सफलता के बावजूद लोग बिना ठोस सबूत के भी उसकी सेक्सुअलिटी के आधार पर उसे दोषी मानने लगते हैं।

गीतिका को फंसाने के लिए फर्जी शिकायतों और मैनिपुलेटेड फेक न्यूज का सहारा लिया जाता है। वह इस बात की तस्दीक करता है कि आज के दौर में किसी को बर्बाद करने के लिए कानूनी सजा की जरूरत नहीं है। बस उसकी सोशल इमेज खराब करना ही काफी है। लोग अनैतिक बेबुनियादी टिप्पणियां करते हैं। कभी वह गीतिका की कामयाबी को उसकी सेक्सुअलिटी से जोड़ते हैं, तो कभी उसे पहले ही दोषी मान लेते हैं। फिल्म का आखिरी हिस्से में जब गीतिका पूरी तरह अकेली पड़ जाती है, उसकी खामोशी में पछतावा और शक्ल पर गहराई साफ दिखाई देती है, जब वह अपनी बेगुनाही और अपनी गलतियों के बीच फंसी हुई दिखती है। वहीं मीरा के रूप में प्रतिभा रांटा ने एक ऐसी परिपक्वता दिखाई है जो यह साबित करती है कि प्यार में सब मानते जाना और खुद के सम्मान के लिए खड़े होना, दोनों अलग बातें हैं।

‘एक्यूज्ड’ केवल एक थ्रिलर फिल्म नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के उन जटिल सवालों को सामने लाती है, जिनके जवाब आसान नहीं हैं। यह फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में न्याय चाहते हैं या सिर्फ किसी को जल्दी से दोषी ठहराने की आदत के शिकार हो चुके हैं। क्वीयर पहचान, सत्ता और आरोपों के बीच उलझी यह कहानी इस बात की याद दिलाती है कि शोषण का कोई एक चेहरा नहीं होता और न ही हर आरोप झूठा या हर आरोपी दोषी होता है। ऐसे में ‘एक्यूज्ड’ फिल्म एक जरूरी हस्तक्षेप बनकर उभरती है, जो दर्शकों को असहज करती है, लेकिन साथ ही उन्हें अपने पूर्वाग्रहों से टकराने के लिए भी मजबूर करती है।

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