जम्मू के बाहरी इलाके में बसा चिनौर गाँव पहली नजर में शांत और सुंदर लगता है। दूर-दूर तक फैले पहाड़, कच्चे रास्ते, छोटे-छोटे घर और खुला आकाश। लेकिन, इस सुकून भरे दृश्य के पीछे कई अनकही कहानियां छिपी हैं; संघर्ष की, उम्मीद की और उन महिलाओं की जो हर दिन चुनौतियों का सामना करते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ा रही हैं। यह कहानी है देश के बकरवाल महिलाओं की, जो अभी भी समाज के हाशिए पर हैं। बकरवाल समुदाय प्रकृति से जुड़े घुमंतू पशुपालक समुदायों में से एक है। बकरवाल लोगों का जीवन और संस्कृति उनके पारंपरिक काम ‘मौसमी प्रवास’ पर आधारित है।
इसका मतलब है कि वे अपने पशुओं, खासकर भेड़ और बकरियों को लेकर मौसम के हिसाब से एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। गर्मियों में वे ऊंचे पहाड़ी इलाकों में जाते हैं, जहां हरी घास मिलती है, और सर्दियों में मैदानों में लौट आते हैं। बकरवाल महिलाओं पर जनजातीय पहचान, सख्त पितृसत्तात्मक सामाजिक मान्यताएं और रोजमर्रा के काम उनकी क्षमताओं पर सवाल उठाते हैं। यही कारण है कि उनका जीवन अक्सर संघर्ष और चुनौतियों से भरा रहता है।
चिनौर में रहने वाली बकरवाल महिलाएं आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं। कठोर पितृसत्तात्मक समाज, कम उम्र में विवाह, कम लिंगानुपात और संपत्ति के अधिकारों से वंचित रहना उनकी जिंदगी कठिन बना देता है।
चिनौर में रहने वाली बकरवाल महिलाएं आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं। कठोर पितृसत्तात्मक समाज, कम उम्र में विवाह, कम लिंगानुपात और संपत्ति के अधिकारों से वंचित रहना उनकी जिंदगी कठिन बना देता है। घुमंतू जीवनशैली के कारण वे राज्य की सुरक्षा, न्याय और सुधारात्मक प्रयासों से दूर रहती हैं। नतीजतन, उनका जीवन मेहनत, गरीबी और सामाजिक उपेक्षा से भरा होता है। हमारी मुलाकात आबिदा अल्ताफ से हुई, जो बारहवीं पास कर चुकी है और डॉक्टर बनने का सपना देखती है।
सीमित संसाधन और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद वह पढ़ाई जारी रख रही है और कहती हैं, “अगर पढ़ाई पूरी कर पाई तो मैं अपने समुदाय की लड़कियों के लिए उदाहरण बनना चाहती हूं।” बकरवाल समुदाय में शिक्षा केवल अधिकार नहीं, बल्कि जीवन बदलने का रास्ता बन जाती है। साल 2001 में जम्मू-कश्मीर की साक्षरता 55.52 फीसद थी, गुज्जरों की 31.65 फीसद और बकरवालों की केवल 22.51 फीसद। यह अधूरी साक्षरता अधूरे सपनों और खोई हुई संभावनाओं की कहानी बताती है। आबिदा की कहानी दर्शाती है कि बदलाव की शुरुआत अक्सर एक छोटे से सपने से होती है।
सीमित संसाधन और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद वह पढ़ाई जारी रख रही है और कहती हैं, “अगर पढ़ाई पूरी कर पाई तो मैं अपने समुदाय की लड़कियों के लिए उदाहरण बनना चाहती हूं।”
चिनौर की महिलाओं की अनकही परेशानियां और संघर्ष
जम्मू के चिनौर गाँव में कई महिलाएँ हर दिन कठिन जीवन जी रही हैं। एक महिला के अधूरे घर और खराब छत से ही उनकी परेशानियाँ दिखती हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी आवास योजना का लाभ अब तक उन्हें नहीं मिला। महिला ने कहा, “सरकार मदद देती है, लेकिन हमारे हिस्से में कुछ नहीं आया। जब काम नहीं मिलता, बच्चों को भूखा सोना पड़ता है।” यह सिर्फ घर की कहानी नहीं, बल्कि उन परिवारों की भी है जिन्हें योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। स्वास्थ्य और पीरियड्स के दौरान स्वच्छता की कमी भी चिनौर की महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती है। एक स्थानीय महिला ने दुख भरे स्वर में बताया, “मेरी सास पीरियड्स के दौरान कपड़ा इस्तेमाल करती थी। जब तक बीमारी का कारण पता चला, तब तक पूरा शरीर खराब हो गया और अब वह हमारे बीच नहीं हैं।”
जागरूकता की कमी और संसाधनों की कमी इन समस्याओं को और बढ़ा देती है। कई महिलाएँ इस विषय पर खुलकर बात करना भी मुश्किल मानती हैं। यह दिखाता है कि ग्रामीण भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य और मासिक धर्म स्वच्छता अभी भी गंभीर मुद्दा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019–2021 के आंकड़े बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में 15–49 वर्ष की महिलाओं में एनीमिया की दर 65.9 फीसद है। बकरवाल महिलाओं के लिए स्थिति और भी गंभीर है। लगातार गरीबी, खाद्य असुरक्षा, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पशुपालन और अत्यधिक शारीरिक श्रम उनके स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर असर डालते हैं। आखिरकार, चिनौर की महिलाओं की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं है, बल्कि उनके अधूरे अधिकारों और अनसुनी पीड़ा की भी है, जिसे अब दुनिया के सामने लाने की जरूरत है।
मेरी सास पीरियड्स के दौरान कपड़ा इस्तेमाल करती थी। जब तक बीमारी का कारण पता चला, तब तक पूरा शरीर खराब हो गया और अब वह हमारे बीच नहीं हैं।
बकरवाल महिलाओं का गर्भावस्था में संघर्ष
गाँव में बातचीत में पता चला कि गर्भावस्था और प्रसव के दौरान सरकारी योजनाओं का लाभ बकरवाल महिलाओं तक नहीं पहुंच पाता। बच्चे के जन्म के बाद भी उन्हें कोई मदद नहीं मिलती। यह सवाल उठता है कि क्या योजनाओं की जानकारी और पहुंच सही लोगों तक पहुंच रही है। बकरवाल महिलाओं की हाशिए पर रहने की स्थिति मातृत्व और प्रजनन स्वास्थ्य में सबसे स्पष्ट होती है। साल में दो बार होने वाला उनका प्रवास 200 किलोमीटर से अधिक दूरी और 3,500 मीटर से ऊंचाई वाले खतरनाक पहाड़ी रास्तों से गुजरता है। गर्भवती महिलाओं को पैदल चलना या घोड़े पर सवारी करनी पड़ती है, साथ ही पशुधन संभालना और भारी सामान उठाना भी उनकी जिम्मेदारी होती है। समुदाय के मानवशास्त्रीय अध्ययनों में इसे ‘गर्भावस्था का हाशियाकरण’ कहा गया है। बकरवाल संस्कृति में गर्भावस्था को किसी विशेष देखभाल या आराम की जरूरत वाली चिकित्सा स्थिति के रूप में नहीं देखा जाता।
इसे उनके कठिन और निरंतर चलते रहने वाले जीवन का सामान्य हिस्सा माना जाता है। एक महिला बताती हैं, “मैं गर्भावस्था थी तब भी कई किलोमीटर से जाकर पानी लाना और लकड़ी इकट्ठा करना पड़ता था। कुछ महीने मुश्किल हुए, फिर आदत सी हो गई।” नतीजन महिलाओं का अक्सर गीले अस्थायी तंबुओं में या दूरदराज़ जंगलों के रास्तों पर ही प्रसव होता है। अधिकांश जन्म प्रशिक्षित बुजुर्ग महिलाओं या पारंपरिक दाइयों की मदद से होते हैं। आस-पास कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रशिक्षित नर्स या डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता। बकरवाल महिलाओं का यह अनुभव बताता है कि दूरदराज़ इलाकों में मातृत्व और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी कितनी गंभीर चुनौती बन चुकी है। उनका संघर्ष सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की सामाजिक और स्वास्थ्य असमानताओं को उजागर करता है।
साल में दो बार होने वाला उनका प्रवास 200 किलोमीटर से अधिक दूरी और 3,500 मीटर से ऊंचाई वाले खतरनाक पहाड़ी रास्तों से गुजरता है। गर्भवती महिलाओं को पैदल चलना या घोड़े पर सवारी करनी पड़ती है, साथ ही पशुधन संभालना और भारी सामान उठाना भी उनकी जिम्मेदारी होती है।
चिनौर की बकरवाल महिलाओं की अनकही कहानी
चिनौर की बकरवाल समुदाय की महिलाएं सीमित संसाधनों में अपना जीवन जी रही हैं। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर भी बहुत कम हैं। लेकिन इन सबके बावजूद उनमें हिम्मत और उम्मीद दिखाई देती है। वे हर दिन अपने परिवार के लिए मेहनत करती हैं, बच्चों के भविष्य के लिए सपने देखती हैं और कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती। बकरवाल महिलाएं ऊनी कंबल और नमदा जैसी पारंपरिक चीज़ें बनाने में विशेषज्ञ हैं। वे हाथ से सूत कातती हैं, प्राकृतिक रंगों से रंगाई करती हैं और जटिल कढ़ाई करती हैं। उनके डिज़ाइन में स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का चित्रण होता है, जो उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाता है और सर्दियों में गर्माहट भी प्रदान करता है। यहां की महिलाएं सिर्फ अपने घर की जिम्मेदारी नहीं संभालतीं, बल्कि अपने समुदाय की पहचान और अस्तित्व को भी आगे बढ़ा रही हैं। आबिदा जैसी लड़कियां शिक्षा के जरिए बदलाव की राह तलाश रही हैं, जबकि अन्य महिलाएं अपने संघर्ष से यह दिखा रही हैं कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, उम्मीद का दीपक बुझता नहीं।
सरकारी योजनाओं तक पहुंच और प्रशासनिक बाधाएं
घुमंतू जनजातियों के लिए दस्तावेज़ बेहद जरूरी हैं। विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय आर्थिक सहायता के लिए विमुक्त जनजाति प्रमाणपत्र लेना पड़ता है, जो कई लोगों के लिए चुनौती है क्योंकि वे बेघर, भूमिहीन या बिना दस्तावेज़ हैं। इसे आसान बनाने के लिए जम्मू-कश्मीर के जनजातीय विभाग ने घर-घर सर्वेक्षण और सामान्य सेवा केंद्र शुरू किए हैं, ताकि आधार, गोल्डन स्वास्थ्य कार्ड और निवास प्रमाण पत्र तुरंत मिल सकें। इसी तरह, ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ सरकारी योजनाओं का पूरा कवरेज और दस्तावेज़-विहीन बकरवालों को तंत्र से जोड़ने का प्रयास है। जनसंख्या के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अनुसूचित जनजाति की कुल संख्या 2011 में 10.454 करोड़ यानी 8.6 फीसद थी। जम्मू-कश्मीर में गुज्जर और बकरवाल समुदाय राज्य की 11.9 फीसद आबादी बनाते हैं। बकरवालों को पहली बार साल 2001 की जनगणना में अलग दर्ज किया गया था जिनकी संख्या 60,724 पाई गई। साल 2011 तक यह बढ़कर 1,13,198 हो गया, यानी 86.41 फीसद की वृद्धि, जो प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि, बेहतर जनगणना और अर्ध-स्थायी जीवनशैली का परिणाम है।
घुमंतू जनजातियों के लिए दस्तावेज़ बेहद जरूरी हैं। विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय आर्थिक सहायता के लिए विमुक्त जनजाति प्रमाणपत्र लेना पड़ता है, जो कई लोगों के लिए चुनौती है क्योंकि वे बेघर, भूमिहीन या बिना दस्तावेज़ हैं।
क्या महिलाओं की स्थिति बदलेगी?
चिनौर गाँव की महिलाओं की कहानी सिर्फ गरीबी या सुविधाओं की कमी की नहीं है, बल्कि उन आवाजों की कहानी है जो अब धीरे-धीरे सुनाई देने लगी हैं। बकरवाल समुदाय में गहरी असमानताओं के बावजूद एक नया सामाजिक परिवर्तन उभर रहा है। यहां शिक्षा अब केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि राजनीतिक सशक्तिकरण, सामाजिक प्रतिष्ठा और बदलाव का माध्यम बन रही है। इसी सोच ने कई घुमंतू परिवारों को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए स्थायी रूप से बसने के लिए प्रेरित किया है। इस बदलती मानसिकता के परिणामस्वरूप बकरवाल महिलाओं की नई पीढ़ी सामने आई है, जिन्होंने कठिन सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को पार करते हुए प्रशासन, चिकित्सा और शिक्षा के उच्च क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है। कई महिलाएं उच्च शिक्षा और यूपीएससी में सफलता हासिल कर पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती दे चुकी हैं और पूरे समुदाय के लिए प्रेरणा बन गई हैं। बकरवाल महिलाएं आज भी कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं-शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, सीमित रोजगार और सरकारी योजनाओं तक पहुंच की कठिनाई। लेकिन इनके बीच भी एक चीज़ उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है—उम्मीद।
आबिदा अल्ताफ जैसी युवा लड़कियां चिनौर की उम्मीद की मिसाल हैं। छोटे गाँव में रहकर भी वह बड़े सपने देखती हैं, पढ़ाई करना चाहती हैं और अपने समुदाय की लड़कियों के लिए नई राह बनाना चाहती हैं। उनकी कहानी बताती है कि बदलाव की शुरुआत अक्सर युवाओं की सोच से होती है। लेकिन, इन सपनों को सच करने के लिए समाज और व्यवस्था का साथ जरूरी है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। महिलाओं की भागीदारी किसी भी समाज के विकास की नींव होती है। चिनौर की महिलाएं ऐसे बदलाव की प्रतीक्षा कर रही हैं, जहां उनकी आवाज़ सुनी जाए, उनकी जरूरतें समझी जाएं और उन्हें सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य का वास्तविक अधिकार मिले। पहाड़ियों से उठती उनकी कहानियों में दर्द, संघर्ष और उम्मीद तीनों हैं, जो याद दिलाती हैं कि गाँवों में बदलाव की सबसे मजबूत शुरुआत महिलाओं से ही होती है।

