संस्कृतिसिनेमा मैरिटल रेप के कानून की कमी पर ज़रूरी सवाल खड़े करती वेब सीरीज़ चिरैया

मैरिटल रेप के कानून की कमी पर ज़रूरी सवाल खड़े करती वेब सीरीज़ चिरैया

वेब सीरीज की कहानी पूजा और अरुण के रिश्ते के जरिए समाज के उस मानसिकता को उजागर करती है जहां शादी को शारीरिक संबंधों की सहमति मान लिया जाता है। जहां स्त्री की ‘न’ का कोई वजूद ही नहीं होता। इसमें एक शादीशुदा स्त्री को पति की प्रॉपर्टी के तौर पर देखा जाता है, जिसे वह जब जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकता है।

हमारे समाज में शादी को एक ऐसे पवित्र बंधन की तरह माना जाता है, जहां स्त्री को प्रेम, सम्मान और सुरक्षा की गारंटी मिलती है। ऐसे में हॉटस्टार पर हालिया रिलीज वेब सीरीज “चिरैया” इसके पीछे छिपी कड़वी सच्चाई के सामने लाने का काम करती है। यह सीरीज उस ख़ामोश हिंसा की परतें खोलती है, जिसके वजूद तक से इनकार किया जाता है। यहां शादी कोई पवित्र बंधन नहीं बल्कि सत्ता, सहमति और सुरक्षा के बीच की कश्मकश का मैदान बन जाती है। भारतीय वेब स्पेस में जेंडर आधारित हिंसा पर अच्छी ख़ासी संख्या में कंटेंट मिल जाते हैं लेकिन मैरिटल रेप एक ऐसा विषय है जिसे अब भी या तो अनदेखा किया जाता है या फिर दबे छुपे तरीके से दिखाया जाता है। ऐसे में “चिरैया” सिर्फ़ एक क्रिएटिव प्रोजेक्ट नहीं बल्कि एक राजनीतिक दखल है, जो शादी नामक संस्था की इस असहज सच्चाई से रूबरू कराती है। 

सामान्य दिखती ज़िंदगी के भीतर छिपी असामान्य सच्चाई

चिरैया की कहानी एक पारंपरिक भारतीय परिवार की ‘आदर्श बहू’ कमलेश (दिव्या दत्ता) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसके लिए परिवार को जोड़कर रखना ज़िंदगी का सबसे बड़ा मकसद है। कमलेश को लगता है कि उसके ससुराल के सभी लोग बहुत अच्छे हैं जो कभी कुछ ग़लत कर ही नहीं सकते। ख़ासकर अरुण (सिद्धार्थ शॉ) जो उसका देवर है और उसे बचपन से ही अपने बच्चे की तरह पाला है। अरुण की शादी पूजा (प्रसन्ना बिष्ट) से होती है। पूजा पढ़ी-लिखी, जागरूक और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहने वाली लड़की है। पूजा की पढ़ाई-लिखाई और मॉडर्न होने की वजह से शुरुआत में कमलेश को इन्फीरियॉरिटी कॉम्पलेक्स होता है जिसे वह बाद में पूजा के सामने स्वीकार भी करती है। हालांकि पढ़ी-लिखी और जागरूक होने के बावजूद पूजा का काफ़ी समय तक आवाज़ न उठाना अखरता है, लेकिन उसके परिवार की रूढ़िवादी सोच को देखते हुए समझ आता है कि उसके पास ज़्यादा ऑप्शन भी नहीं थे।

कहानी में मोड़ तब आता है जब शादी की पहली रात बीमार होने और बार-बार मना करने के बावजूद अरुण पूजा के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाता है। पूजा यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाती और अगली सुबह घर छोड़कर मायके चली जाती है। लेकिन उसे  शॉक तब लगता है जब उसकी मां इसे ‘नॉर्मल’ और ‘पति का हक़’ बोलकर उसे वापस अपने ससुराल जाने के लिए मजबूर करती है। पहली बार मैरिटल रेप की बात सुनकर कमलेश भी पूजा पर यक़ीन नहीं करती और थप्पड़ मार देती है। यहां कमलेश की पितृसत्तात्मक सोशल कंडीशनिंग दिखती है जो परिवार की ‘आदर्श छवि’ और अरुण को लेकर अपनी परवरिश पर सवाल उठाने से डरती है। हालांकि इसके बाद कमलेश सोचने पर मजबूर हो जाती है और पास के एनजीओ में जाकर मैरिटल रेप, सहमति वगैरह के बारे में जानने-समझने की कोशिश करती है। इस तरह से धीरे-धीरे उसकी सोशल कंडीशनिंग टूटती है और उसे महसूस होता है कि किस तरह वह अनजाने में वह ख़ुद भी ग़लत को बढ़ावा देती आ रही है। आख़िरकार वह पूरे जी जान से पूजा के साथ खड़ी हो जाती है और अंत तक उसका साथ देती है।

शादी पूजा को सुरक्षा नहीं देती बल्कि लगातार अपमान, तकलीफ़ और डर के साये में जीने को मजबूर कर देती है। जहां उसका अपने शरीर पर भी कोई हक़ नहीं होता।

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शादी, सहमति और प्रोग्रेसिव का भ्रम

वेब सीरीज की कहानी पूजा और अरुण के रिश्ते के जरिए समाज के उस मानसिकता को उजागर करती है जहां शादी को शारीरिक संबंधों की सहमति मान लिया जाता है। जहां स्त्री की ‘न’ का कोई वजूद ही नहीं होता। इसमें एक शादीशुदा स्त्री को पति की प्रॉपर्टी के तौर पर देखा जाता है, जिसे वह जब जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकता है। शादी पूजा को सुरक्षा नहीं देती बल्कि लगातार अपमान, तकलीफ़ और डर के साये में जीने को मजबूर कर देती है। जहां उसका अपने शरीर पर भी कोई हक़ नहीं होता। यहां वेब सीरीज उस मिथक को भी तोड़ने का काम करती है जो पढ़ाई-लिखाई या शहरी जीवन को प्रगतिशीलता और आधुनिकता से जोड़ता है। अरुण का किरदार किसी जाने पहचाने विलेन की तरह न होकर समाज में सभ्य और प्रोग्रेसिव दिखने वाले सामान्य पुरुष के तौर पर सामने आता है।

जो निजी ज़िंदगी में उसी पितृसत्तात्मक सोच से चलता है जो पत्नी को एक व्यक्ति की तरह नहीं बल्कि अपनी प्रॉपर्टी की तरह देखता है। इसी की एक बानगी तब दिखती है जब हनीमून के दौरान ख़ुद को बचाने के लिए पूजा पीरियड का बहाना बनाती है, तो वह सबूत दिखाने की बात करता है। पत्नी के प्रति अपनी जबरदस्ती को वह मर्दानगी और पति होने के अधिकार के रूप में देखता है। अरुण के व्यवहार का सबसे ख़तरनाक पहलू उस हिंसा का नॉर्मलाइजेशन है। यही वह जगह है जब चिरैया उस सोच को चुनौती देती है, जो शादी के नाम स्त्री की सत्ता छीन लेती है। इस सीरीज में कमलेश के पति विनय कुमार (फैसल राशिद) को कुछ हद तक प्रोग्रेसिव दिखाया गया है, लेकिन वह भी अपने पिता के ख़िलाफ़ जाकर स्टैंड नहीं ले पाता। 

कमलेश के किरदार के माध्यम से सीरीज में सोशल कंडीशनिंग और इंटरनलाइज्ड पितृसत्ता बखूबी दिखाई गई है, जिसमें महिलाओं को ही पितृसत्ता का वाहक बना दिया जाता है। कमलेश का अखबार पिछले पन्ने से पढ़ना और रसोई और परिवार को प्राथमिकता देना इसी का हिस्सा है।

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पितृसत्तातमक समाज में संघर्ष और सिस्टरहुड 

कमलेश के किरदार के माध्यम से सीरीज में सोशल कंडीशनिंग और इंटरनलाइज्ड पितृसत्ता बखूबी दिखाई गई है, जिसमें महिलाओं को ही पितृसत्ता का वाहक बना दिया जाता है। कमलेश का अखबार पिछले पन्ने से पढ़ना और रसोई और परिवार को प्राथमिकता देना इसी का हिस्सा है। मैरिटल रेप के बारे में बताने पर पूजा की मां का ‘शादी में ऐसा होता है’, ‘घर बचाना ज़रूरी है’ कहकर वापस ससुराल भेज देना पितृसत्ता और सोशल कंडीशनिंग का प्रतीक है। यह वेब सीरीज पूजा, अरुण और कमलेश के ज़रिए लड़कों में पितृसत्ता की जड़ों की ओर भी इशारा करती है। लड़कों की परवरिश में प्राइमरी जेंडर के तौर पर बचपन से ही जो स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाता है, वही आगे चलकर उन्हें मेल एनटाइटलमेंट देता है।

सीरीज में परिवार के मुखिया सुकुमार भ्रमर (संजय मिश्रा) के रूप में प्रोग्रेसिव होने का ढोंग करने वाले मर्दों की सच्चाई को भी सामने रखा गया है, जो समाज में प्रोग्रेसिव बुद्धिजीवी के तौर पर जाने जाते हैं लेकिन जब बात अपनी सत्ता पर आती है तो वे उसे बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। लेकिन, चिरैया यही नहीं रुकती। कमलेश की सोशल कंडीशनिंग धीरे-धीरे ख़त्म होना और बदलना दिखाता है कि पितृसत्तात्मक समाज की साजिशों के बावजूद एक महिला दूसरी महिला की सबसे अच्छी दोस्त बन सकती है। कमलेश का पूरे परिवार के ख़िलाफ़ जाकर पूजा का साथ देना, धीरे-धीरे परिवार की दूसरी महिला सदस्यों अरुण की मां, दादी वगैरह का एकजुट होना सिस्टरहुड की बेहतरीन मिसाल है। हमेशा ख़ामोश रहने वाली दादी जब बोलती हैं तो पितृसत्ता की परतों को खोल कर रख देती हैं।

चिरैया वेब सीरीज जो विमर्श का सबसे बड़ा मुद्दा उठाती है वह है देश में मैरिटल रेप से जुड़े क़ानून की कमी। पूजा के साथ लगातार हो रहे इस अपराध के ख़िलाफ़ जब कमलेश लड़ाई लड़ने का फैसला करती है तब जाकर उसका इस सच्चाई से सामना होता है।

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जब वे कहती हैं कि किस तरह से परिवार और परंपरा के नाम पर महिलाओं को कंट्रोल में रखा जाता है तो यह सदियों से परंपरा के नाम पर महिलाओं के साथ हो रहे शोषण को उजागर करने का काम करता है। सीरीज के क्लाइमेक्स में जब कमलेश जब कहती है कि “केवल वहीं महिलाएं जाएं, जिन्हें कभी किसी ने उनकी मर्ज़ी के बगैर न छुआ हो” और वहां मौजूद सभी महिलाएं वहीं रुक जाती हैं। उस समय “चिरैया” दर्शकों के सामने समाज की उस कड़वी सच्चाई को सामने लाती है जो दिखाती है कि महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराध कोई अपवाद नहीं हैं बल्कि लगभग हर महिला को इससे होकर गुज़रना पड़ता है।

मैरिटल रेप पर क़ानून की कमी 

चिरैया वेब सीरीज जो विमर्श का सबसे बड़ा मुद्दा उठाती है वह है देश में मैरिटल रेप से जुड़े क़ानून की कमी। पूजा के साथ लगातार हो रहे इस अपराध के ख़िलाफ़ जब कमलेश लड़ाई लड़ने का फैसला करती है तब जाकर उसका इस सच्चाई से सामना होता है। कमलेश के नाना टीनू आनंद जब मैरिटल रेप पर क़ानून न होने की वजह से दहेज का केस करने का सुझाव देते हैं तो इसमें उनकी निराशा नज़र आती है। एक प्रोग्रेसिव शख़्स के रूप में अपनी छोटी सी लेकिन असरदार भूमिका में टीनू आनंद ने मैरिटल रेप पर क़ानून न होने की जटिलताओं को उजागर किया है। एक ऐसा अपराध जिसके लिए अब तक क़ानून ही नहीं है समाज की उसी दकियानूसी सोच को दिखाता है, जो पत्नी को पति की प्रॉपर्टी समझता है। यूएन वीमेन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अब तक सिर्फ 77 देशों में मैरिटल रेप को लेकर क़ानून मौजूद हैं। इससे पता चलता है कि भारत समेत दुनिया के ज़्यादातर देशों में अभी भी इसे अपराध नहीं माना जाता है। ऐसे में क़ानून की कमी और समाज की पितृसत्तात्मक सोच मिलकर ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जिसमें सर्वाइवर के लिए न्याय मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

लेखक दिव्य निधि शर्मा ने चिरैया में शादी के भीतर सहमति की अनदेखी सच्चाई को काफ़ी गहराई के साथ लिखा जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या शादी एक तरह का लाइसेंस है जो स्त्री को कमोडिटी में बदल देता है?

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क्या शादी यौन संबंध बनाने का लाइसेन्स है?

लेखक दिव्य निधि शर्मा ने चिरैया में शादी के भीतर सहमति की अनदेखी सच्चाई को काफ़ी गहराई के साथ लिखा जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या शादी एक तरह का लाइसेंस है जो स्त्री को कमोडिटी में बदल देता है? साथ ही डायरेक्टर शशांत शाह ने से जिस ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ इसे दिखाया किया है वह काबिलेतारीफ़ है। इसमें राज नारायण देव का बैकग्राउंड म्यूजिक भावनाओं को गहराई से उजागर करने और असर बढ़ाने का काम करता है। सभी कलाकारों ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। लेकिन फ़िल्म की धुरी कमलेश का किरदार निभाने वाली दिव्या दत्ता ने अपनी शानदार एक्टिंग से इसमें जान फूंक दी है। हालांकि वेब सीरीज का अंत बहुत संतोषजनक नहीं होता क्योंकि इसमें न्याय नहीं होता दिखता, न ही अपराधी को कोई सज़ा मिलती है, जोकि एक तरह से हक़ीक़त ही है। क़ानून की कमी और समाज की रूढ़िवादी सोच ऐसे मामलों में न्याय नहीं दिला पाते।

इसमें दिखाया गया है कि महिलाओं के एकजुट होने के बावजूद कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलता क्योंकि पुरुषों की सोच पर कोई असर नहीं पड़ा। इससे यह भी पता चलता है कि व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए महिलाओं को ही नहीं बल्कि पुरुषों को भी सामने आना होगा। इन सबके बावजूद यह मैरिटल रेप पर विमर्श के लिए एक मुद्दा देती है। यह फिल्म देश में मौजूद न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है। इसके अलावा यह समाज को अपने गिरेबान में झांकने को भी मजबूर करती है। चिरैया का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि दर्शकों को सोचने पर मजबूर करना है। यह पितृसत्ता को केवल पुरुषों की समस्या नहीं मानती बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में दिखाती है। इस मायने में चिरैया सिर्फ़ एक वेब सीरीज नहीं बल्कि बातचीत की शुरुआत है जो समाज में बदलाव लाने के लिए ज़रूरी है।

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