इतिहास मलिका पुखराज: एक मजबूत, अनोखी और सुरीली ग़ज़ल गायिका

मलिका पुखराज: एक मजबूत, अनोखी और सुरीली ग़ज़ल गायिका

'अभी तो मैं जवान हूं' के अलावा उनके कुछ और बेहतरीन गीतों में शायर देहलवी की 'ज़ाहिद न कह बुरी', इक़बाल की 'तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूं', और फ़ैज़ की 'तुम मेरे पास रहो'शामिल है।

मलिका पुखराज का नाम एक मशहूर गायिका के रूप में लिया जाता है। लेकिन अगर हम उनके जीवन को ध्यान से समझें, तो यह सिर्फ संगीत की कहानी नहीं है। मलिका पुखराज सिर्फ एक मशहूर गायिका नहीं थीं; उनका जीवन महिलाओं की हिम्मत, संघर्ष और नारीवाद के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। उन्होंने उस समय में अपनी पहचान बनाई, जब महिलाओं के लिए खुद के दम पर आगे बढ़ना आसान नहीं था। उनका जीवन न केवल संगीत की कहानी है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाता है कि अगर महिलाएं मौके पाएं और अपने हुनर पर भरोसा रखें, तो वे समाज में बदलाव ला सकती हैं।

मलिका पुखराज का जन्म साल 1912 में जम्मू-कश्मीर में हुआ था। बचपन से ही उन्हें गाने का बहुत शौक था। वे अक्सर गुनगुनाती रहती थीं। उस समय लड़कियों के लिए मंच पर आना आसान नहीं था, लेकिन अगर किसी में लगन हो, तो वह रास्ता ढूंढ ही लेता है। उन्होंने भी अपने इस शौक को नहीं छोड़ा और धीरे-धीरे आगे बढ़ती रहीं। 9 साल की उम्र में, उन्होंने जम्मू का दौरा किया और महाराजा हरि सिंह के राज्याभिषेक समारोह में एक गीत गाया। उनकी आवाज़ से महाराजा इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपने दरबार की गायिका नियुक्त कर दिया। यह उनके जीवन का एक बड़ा मौका था। इतनी छोटी उम्र में इस तरह सामने आना यह दिखाता है कि अगर मौका मिले, तो लड़कियां भी बहुत कुछ कर सकती हैं।

9 साल की उम्र में, उन्होंने जम्मू का दौरा किया और महाराजा हरि सिंह के राज्याभिषेक समारोह में एक गीत गाया। उनकी आवाज़ से महाराजा इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपने दरबार की गायिका नियुक्त कर दिया।

बंटवारा का समय और उनकी गायकी

अगर हम इसे नारीवाद से जोड़कर देखें, तो यह साफ समझ में आता है कि उन्होंने अपने हुनर के दम पर अपनी जगह बनाई। साल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तब उन्हें लाहौर जाना पड़ा। यह उनके लिए बहुत बड़ा बदलाव था। सब कुछ नया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने नए शहर में जाकर फिर से गाना शुरू किया। उन्होंने रेडियो के जरिए अपने गाने लोगों तक पहुंचाए। उनकी आवाज़ लोगों को बहुत पसंद आई। वे बहुत सरल तरीके से गाती थीं, और यही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी। उनके गानों में सच्चाई होती थी, जो सीधे दिल को छू जाती थी। वे दिखावे से दूर रहती थीं और अपने काम पर ध्यान देती थीं।

उनका गाना ‘अभी तो मैं जवान हूं’ बहुत मशहूर हुआ। आज भी लोग इस गाने को सुनते हैं। इस गाने से उन्हें एक अलग पहचान मिली। उनकी आवाज़ में जो भावनाएं थीं, वे सुनने वालों को अपने साथ जोड़ लेती थीं। यही वजह है कि लोग आज भी उन्हें याद करते हैं। 1940 के दशक में वह भारत की जानी-मानी पेशेवर गायिकाओं में से एक थीं, और साल 1947 में भारत के विभाजन के बाद, वह लाहौर, पाकिस्तान चली गईं; जहां उन्हें रेडियो पाकिस्तान, लाहौर पर संगीतकार काले खान के साथ अपने रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से और भी अधिक प्रसिद्धि मिली। उनकी आवाज़ पहाड़ी लोकगीतों के लिए बेहद उपयुक्त थी।

उन्होंने रेडियो के जरिए अपने गाने लोगों तक पहुंचाए। उनकी आवाज़ लोगों को बहुत पसंद आई। वे बहुत सरल तरीके से गाती थीं, और यही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी। उनके गानों में सच्चाई होती थी, जो सीधे दिल को छू जाती थी। वे दिखावे से दूर रहती थीं और अपने काम पर ध्यान देती थीं।

गायकी की खूबियां और पुरस्कार

पुखराज की शोहरत की बुनियाद उनकी ठुमरी गायकी में है, जहां बोल इशारों भरे होते हैं और सुनने वालों को कई मतलब निकालने का मौका देते हैं। उन्होंने भारी-भरकम शायरी को एक तरफ रख दिया और हल्की-फुल्की रचनाओं पर ध्यान दिया, जैसे कि मुक्त छंद। ‘अभी तो मैं जवान हूं’ के अलावा उनके कुछ और बेहतरीन गीतों में शायर देहलवी की ‘ज़ाहिद न कह बुरी’, इक़बाल की ‘तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूं’, और फ़ैज़ की ‘तुम मेरे पास रहो’शामिल है। साल 1980 में, उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने ‘प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस’ पुरस्कार से सम्मानित किया। साल 1977 में, जब ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (जिसके लिए उन्होंने 1947 में विभाजन तक गायन किया था) अपनी स्वर्ण जयंती मना रहा था, तब उन्हें भारत आमंत्रित किया गया और ‘लेजेंड ऑफ़ वॉइस’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

‘अभी तो मैं जवान हूं’ के अलावा उनके कुछ और बेहतरीन गीतों में शायर देहलवी की ‘ज़ाहिद न कह बुरी’, इक़बाल की ‘तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूं’, और फ़ैज़ की ‘तुम मेरे पास रहो’शामिल है।

मलिका पुखराज ने अपने संस्मरणों को ‘सॉन्ग संग ट्रू’ नामक उपन्यास में भी लिपिबद्ध किया। मलिका पुखराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि अगर हम अपने काम को दिल से करें, तो हम जरूर सफल हो सकते हैं। उन्होंने अपने गाने को सिर्फ एक काम नहीं माना, बल्कि उसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। उन्होंने हर परिस्थिति में खुद को मजबूत रखा और आगे बढ़ती रहीं। उनकी निष्ठा बताता है कि एक महिला भी अपने कला के दम पर आगे बढ़ सकती है और लोगों के दिलों में अपनी जगह बना सकती है। यह किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ी सफलता होती है।

उनका निधन और उनकी विरासत

साल 2004 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी जिंदा है। उनके गाने आज भी सुने जाते हैं। यह दिखाता है कि सच्चा काम कभी खत्म नहीं होता और लोग उसे हमेशा याद रखते हैं। उन्होंने ऐसे समय में अपनी पहचान बनाई, जब महिलाओं के लिए अपने दम पर आगे बढ़ना आसान नहीं था। पहले के समय में महिलाओं की स्थिति आज जैसी नहीं थी। उन्हें घर तक ही सीमित रखा जाता था। पढ़ाई, काम और अपने फैसले लेने का हक बहुत कम होता था। कई बार उन्हें अपनी इच्छा के खिलाफ भी फैसले मानने पड़ते थे। अगर कोई लड़की कुछ अलग करना चाहती थी, तो उसे समाज की बातों का सामना करना पड़ता था। ऐसे समय में जो महिलाएं आगे बढ़ीं, उन्होंने नारीवाद की सोच को मजबूत किया। आखिर में हम  कह सकते हैं कि मलिका पुखराज सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने अपने समय में अपनी पहचान बनाई। उनकी कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमें समाज में महिलाओं को और ज्यादा अवसर देने चाहिए। अगर महिलाएं आगे बढ़ेंगी, तो समाज भी आगे बढ़ेगा। इस तरह मलिका पुखराज का जीवन आज भी हमारे लिए एक प्रेरणा बना हुआ है।

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