भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में कानून से जुड़े क्षेत्र में लंबे समय तक पुरुषों का वर्चस्व रहा है। इसने न केवल इस पेशे की संरचना को प्रभावित किया, बल्कि यह भी तय किया कि किसे अवसर मिलेंगे, किसकी आवाज़ को सुना जाएगा और नेतृत्व के पदों तक कौन पहुंचेगा। हमारे समाज की रूढ़िवादी मानसिकता के कारण महिलाओं के लिए नेतृत्व और निर्णय लेने का अधिकार सीमित रहा है। ऐसे माहौल में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ तो रही है। लेकिन उनके लिए इस क्षेत्र में अपनी जगह बना पाना आज भी उतना आसान नहीं है, जितना पुरुषों के लिए रहा है।
कई बार उनकी क्षमताओं को उनके जेंडर के आधार पर आंका जाता है। महिला वकीलों को अक्सर खुद को साबित करने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। चाहे वह अदालत में अपनी बात रखने का सवाल हो या क्लाइंट का भरोसा जीतने का।इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के किए गए एक नए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण ने भारत के विधि पेशे या कानून से जुड़े क्षेत्र में गहरी जड़ें जमा चुकी लैंगिक असमानताओं को उजागर किया है।हालांकि, सर्वेक्षण इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि इन कमियों के बावजूद, यह पेशा महिलाओं के लिए अत्यधिक आकर्षक बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के किए गए एक नए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण ने भारत के विधि पेशे या कानून से जुड़े क्षेत्र में गहरी जड़ें जमा चुकी लैंगिक असमानताओं को उजागर किया है।हालांकि, सर्वेक्षण इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि इन कमियों के बावजूद, यह पेशा महिलाओं के लिए अत्यधिक आकर्षक बना हुआ है।
लैंगिक असमानता और संघर्ष
लैंगिक पूर्वाग्रह किसी एक जगह तक सीमित नहीं है, बल्कि अदालतों, चैंबरों, पुलिस स्टेशनों, रजिस्ट्री कार्यालयों और विधि कार्यालयों सहित कई पेशेवर परिवेशों में व्यापक रूप से मौजूद है। इंडिया टुडे में छपी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के 2,604 महिला वकीलों पर आधारित राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 81.3 फीसदी महिलाओं का मानना है कि उनका पेशेवर सफ़र पुरुष साथियों के मुकाबले ज़्यादा मुश्किल भरा रहा है, जबकि 41.1 फीसदी महिला पेशेवरों ने इसे बहुत ज़्यादा मुश्किल बताया है। हालांकि 63.7 फीसदी महिलाओं को किसी-न-किसी मोड़ पर यह पेशा हतोत्साहित या निराश करने वाला लगा। लाइव लॉ में छपी एससीबीए रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1923 के विधि व्यवसायी (महिला) अधिनियम के बाद से महिलाओं को औपचारिक रूप से बार या वकालत के क्षेत्र में प्रवेश दिया गया, लेकिन लैंगिक भेदभाव, अपर्याप्त मार्गदर्शन, प्रारंभिक करियर में वित्तीय असुरक्षा, खराब बुनियादी ढांचा और घरेलू जिम्मेदारियों का असमान वितरण उनके करियर को प्रभावित करता रहता है।
करियर में आगे बढ़ने के मामले में, 53.9 फीसदी लोगों ने माना कि ऊंचे पदों तक पहुंचना पुरुषों के लिए ज्यादा आसान है। इसके अलावा, लगभग 64.5 फीसदी महिला वकीलों ने कभी कोई सरकारी पद नहीं संभाला और किसी भी महिला ने सुप्रीम कोर्ट स्तर पर अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल या एडिशनल सॉलिसिटर जनरल जैसे बड़े पदों पर काम नहीं किया। करीब 59.4 फीसदी महिला वकीलों का मानना है कि कानूनी पैनलों में महिलाओं के लिए न्यूनतम संख्या तय होनी चाहिए। वहीं 67.28 फीसदी लोगों ने कहा कि पैनल वकील या कानून अधिकारी के पदों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक अनिवार्य नीति बननी चाहिए। इसके अलावा, 55.5 फीसदी लोगों का कहना है कि सरकारी पैनल में नियुक्तियां पुरुषों के लिए ज्यादा आसान होती हैं।
इंडिया टुडे में छपी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के 2,604 महिला वकीलों पर आधारित राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 81.3 फीसदी महिलाओं का मानना है कि उनका पेशेवर सफ़र पुरुष साथियों के मुकाबले ज़्यादा मुश्किल भरा रहा है, जबकि 41.1 फीसदी महिला पेशेवरों ने इसे बहुत ज़्यादा मुश्किल बताया है।
संसाधनों की कमी, भेदभाव और बर्नआउट
सर्वे में शामिल लोगों में से 83.1 फीसदी महिलाएं अपने परिवार में वकील बनने वाले पहले व्यक्ति हैं, जिसका अर्थ है कि उनके पास विरासत में मिले पेशेवर नेटवर्क की कमी है। इससे उन्हें कानूनी क्षेत्र में स्थापित पृष्ठभूमि वाले अपने साथियों की तुलना में मार्गदर्शन, सिफारिशें और शुरुआती अवसर प्राप्त करना अधिक कठिन हो जाता है।आधे से ज़्यादा, यानी 56.9 फीसदी महिला वकीलों ने कहा कि जेंडर आधारित रूढ़ियों के कारण उनकी विशेषज्ञता ने किसी न किसी मोड़ पर उनके पेशेवर अवसरों को सीमित कर दिया। सुविधाओं और संसाधनों की बात करें तो केवल 19 फीसदी महिला वकीलों के दफ्तर अदालत के पास थे, जहां वे पैदल जा सकें। वहीं 12 फीसदी के पास अपना अलग दफ्तर ही नहीं था। दफ्तर न होने या दूर होने के पीछे कई कारण सामने आए, जैसे ज्यादा किराया, पैसे की कमी, करियर की शुरुआत होना, पारिवारिक जिम्मेदारियां और सुरक्षा की चिंता आदि बाधाओं के तौर पर बताई गई।
करीब 75 फीसदी महिला वकीलों के पास ऐसे कानूनी डेटाबेस नहीं थे, जिनके लिए पैसे देने पड़ते हैं। जबकि 77 फीसदी के पास क्लर्क या सहायक स्टाफ नहीं था, और 56 फीसदी के पास ठीक से इंटरनेट या जरूरी डिवाइस भी नहीं थे। गौरतलब है कि 21 फीसदी ने तो कहा कि उनके पास कोई भी पेशेवर संसाधन नहीं है। वहीं 34.4 फीसदी लोगों ने संस्थागत स्तर पर लैंगिक भेदभाव का अनुभव किया या उसे देखा। चुनौतियों और भलाई के संबंध में 60 फीसदी महिला वकीलों ने काम के सीमित अवसरों को एक बड़ी कठिनाई बताया। इसके साथ ही 42.8 फीसदी ने नेटवर्किंग से जुड़ी समस्याएं, जबकि 37.5 फीसदी ने कहा कि उनके काम और निजी जीवन के बीच संतुलन नहीं बन पाता। करीब 37.7 फीसदी ने कहा कि उन्हें सही मेंटॉरशिप नहीं मिल पाया।
रिपोर्ट में विधि पेशे से जुड़ी महिलाओं की कार्यस्थल सुरक्षा और कल्याण को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। लगभग 16.1 फीसदी ने यौन हिंसा का अनुभव करने की बात कही, जबकि 12.7 फीसदी ने अपने अनुभव साझा नहीं किए। चिंताजनक रूप से, हिंसा की शिकायत करने वाली 57 फीसदी महिलाओं ने बताया कि उन्हें इसके लिए विरोध का सामना करना पड़ा।
हिंसा, तनाव और पारिवारिक दबाव
रिपोर्ट में विधि पेशे से जुड़ी महिलाओं की कार्यस्थल सुरक्षा और कल्याण को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। लगभग 16.1 फीसदी ने यौन हिंसा का अनुभव करने की बात कही, जबकि 12.7 फीसदी ने अपने अनुभव साझा नहीं किए। चिंताजनक रूप से, हिंसा की शिकायत करने वाली 57 फीसदी महिलाओं ने बताया कि उन्हें इसके लिए विरोध का सामना करना पड़ा।काम के प्रति अत्यधिक तनाव भी एक प्रमुख समस्या के रूप में सामने आया, जिसमें 84 फीसदी लोगों ने कार्य-संबंधी तनाव का अनुभव किया और 26.1 फीसदी ने कहा कि वे इसे अक्सर महसूस करते हैं।शुरुआती दौर के वकीलों पर इसका विशेष प्रभाव दिखाई देता है, जिनमें से 94.4 फीसदी ने तनावग्रस्त होने की बात कही है। ये निष्कर्ष वकीलों के बीच नौकरी छोड़ने के महत्वपूर्ण जोखिम की ओर इशारा करते हैं, खासकर युवा महिला वकीलों के बीच। इसके साथ ही करीब 71.5 फीसदी महिला वकीलों ने कहा कि शादी और पारिवारिक जिम्मेदारियों का असर उनके काम पर पड़ता है, जिन महिलाओं ने बच्चों की देखभाल के लिए मदद मांगी, उनमें से 42.7 फीसदी को कोई मदद नहीं मिली। वहीं 55.2 फीसदी ने बताया कि बच्चे के जन्म के कारण उनके मामलों को आगे बढ़ाने में दिक्कत आई।
करीब 30.3 फीसदी ने कहा कि पारिवारिक ज़िम्मेदारियों की वजह से उनके पेशेवर मौके सीमित हो गए, जबकि सिर्फ़ 18.9 ने कहा कि बच्चों के होने से उनके करियर को फ़ायदा हुआ। गौरतलब है कि 72.1 फीसदी लोगों ने कहा कि करियर को लेकर दी जाने वाली सलाह बेटी और बेटे के लिए अलग-अलग नहीं होती है, जबकि 27.9 फीसदी लोगों का मानना था कि यह अलग होती है,जो लिंग के आधार पर होने वाले संभावित जोखिमों को दिखाता है। नेतृत्व और संस्थागत भागीदारी के मामले में 64.7 फीसदी लोगों का मानना था कि बार के नेतृत्व में महिलाओं को बराबरी के मौके नहीं मिलते। इसके पीछे बताई गई रुकावटों में महिलाओं के नेटवर्क की कमी, पैसे और समय की कमी, परिवार की उम्मीदें आदि शामिल थे।लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद, सर्वेक्षण में नेतृत्व की प्रबल महत्वाकांक्षा दिखाई देती है।
इससे यह संकेत मिलता है कि अगर बाधाओं को दूर किया जाए तो चार में से तीन महिला वकील संस्थागत नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। कानूनी पेशे में महिला वकीलों का यह अदृश्य संघर्ष केवल व्यक्तिगत स्तर की चुनौती नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक समस्या का परिणाम है, जो पितृसत्ता, संसाधनों की असमान पहुंच और संस्थागत भेदभाव में गहराई से जड़ें जमाए हुए है।आंकड़े यह साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि महिलाओं को इस पेशे में केवल प्रवेश ही नहीं, बल्कि टिके रहने और आगे बढ़ने के लिए भी कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ता है। अब ज़रूरत है कि नीतिगत स्तर पर ठोस कदम उठाए जाएं,जैसे कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाली नीतियां, सुरक्षित कार्यस्थल, मेंटॉरशिप के अवसर, और संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करना। जब तक ये बदलाव नहीं होंगे, तब तक न्याय देने वाला यह पेशा खुद अपने भीतर न्याय स्थापित नहीं कर पाएगा।

