भारतीय इतिहास में विमानन जैसे पेशेवर क्षेत्र में लंबे समय तक पुरुषों का ही नियंत्रण रहा है। वहीं हमारे समाज की पितृसत्तात्मक रुढ़िवादी धारणाओं के कारण महिलाओं के लिए, घर की चारदीवारी से बाहर निकलना और इस पेशेवर दुनिया में अपनी पहचान बना पाना आसान नहीं था। लेकिन भारतीय इतिहास में कुछ महिलाएं ऐसी भी रही हैं, जिन्होंने न केवल इन रूढ़िवादी नियमों को तोड़ा बल्कि इस क्षेत्र में अपनी पहचान भी बनाई। उन्हीं में से एक थीं उषा सुंदरम, जिन्होंने स्वतंत्र भारत की पहली महिला पायलट बनकर इतिहास रच दिया। उनका पायलट बनना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध भी था।
उन्होंने अपने साहस, दृढ़ निश्चय और कड़ी मेहनत के दम पर यह साबित किया कि महिलाओं की क्षमताओं को रूढ़िवादी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उनका ये सफर केवल आसमान की ऊंचाइयों तक सीमित नहीं था। उन्होंने एक ऐसे दौर में उड़ान भरी, जब हर कदम पर उन्हें खुद को साबित करना पड़ता था, चाहे वह प्रशिक्षण हो, अवसरों की कमी हो या समाज की रूढ़िवादी मानसिकता। इसके बावजूद वह कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षणों का भी हिस्सा बनीं, जैसे देश की आजादी के बाद के शुरुआती सालों में राष्ट्रीय नेताओं के साथ उड़ान भरना और विभाजन के समय राहत कार्यों में योगदान देना। उनका जीवन इस बात का भी प्रमाण है कि एक व्यक्ति अपने पेशे से आगे बढ़कर समाज के लिए कितना कुछ कर सकता है। वह उस हर एक महिला के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं, जो रूढ़िवादी नियमों को न मानते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहती हैं।
उषा सुंदरम ने स्वतंत्र भारत की पहली महिला पायलट बनकर इतिहास रच दिया। उनका पायलट बनना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध भी था।
शुरुआती जीवन और पायलट बनने तक का सफर
उषा सुंदरम का जन्म साल 1924 में उषा कृष्णमूर्ति के रूप में हुआ था। उनके पिता का नाम टी. एस कृष्णमूर्ति और माता का नाम कामाक्षी था। उनके परिवार में शिक्षा और सेवा भावना का अच्छा माहौल था, लेकिन उनके स्कूल या कॉलेज की औपचारिक डिग्री के बारे में कोई भी सार्वजनिक जानकारी नहीं है। क्योंकि उस दौर में कई लड़कियों की शिक्षा घरेलू स्तर पर या स्कूल तक ही सीमित रहती थी। हालांकि साल 1941 में उनकी शादी वी. सुंदरम से हो गई, जो कि एक वाणिज्यिक पायलट और मद्रास फ्लाइंग क्लब में विमानन प्रशिक्षक थे। साल 1946 में, यह दंपति बैंगलोर चले गए, जहां सुंदरम ने मैसूर रियासत के नागरिक उड्डयन निदेशक का पदभार संभाला और कुछ ही सालों में, जक्कूर में सरकारी फ्लाइंग ट्रेनिंग स्कूल के प्रिंसिपल भी बन गए।
उषा की उड़ान यात्रा अनौपचारिक रूप से तब शुरू हुई, जब वे अपने पति के साथ उड़ानों में शामिल होने लगीं। भारत और सीलोन (अब श्रीलंका) के बीच एयरमेल डिलीवरी के दौरान वे अक्सर को-पायलट की सीट पर बैठती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने उड़ान के प्रति अपने जुनून को पहचाना और इसे औपचारिक रूप से अपनाने के लिए पायलट प्रशिक्षण लेने का निर्णय किया।उषा ने इस संस्थान में पहली छात्रा के रूप में प्रवेश लिया और 1 मई 1949 को इसकी पहली स्नातक बनीं। यहीं से उन्होंने पायलट लाइसेंस प्राप्त किया और देश की आजादी के बाद पायलट लाइसेंस हासिल करने वाली पहली महिला भी बनीं।
उषा की उड़ान यात्रा अनौपचारिक रूप से तब शुरू हुई, जब वे अपने पति के साथ उड़ानों में शामिल होने लगीं। भारत और सीलोन (अब श्रीलंका) के बीच एयरमेल डिलीवरी के दौरान वे अक्सर को-पायलट की सीट पर बैठती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने उड़ान के प्रति अपने जुनून को पहचाना और इसे औपचारिक रूप से अपनाने के लिए पायलट प्रशिक्षण लेने का निर्णय किया।
साहस, सेवा और रिकॉर्ड बनाने तक का सफर
बॉलीवुड शादीज़ में छपे एक लेख के मुताबिक, भारत के विभाजन ने हिंसा और बड़े पैमाने पर विस्थापन को जन्म दिया। इस अशांत और भयावह दौर में उषा ने अपने पति के साथ मिलकर कई राहत और बचाव अभियान चलाए।उन्होंने साहस के साथ हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों के बीच जाकर शरणार्थियों को सुरक्षित निकालने का काम किया। खराब और जोखिम भरे मौसम की परिस्थितियों के बावजूद वे लगातार इन मिशनों में उड़ान भरती रहीं। उनके इन प्रयासों ने कई लोगों को हिंसा से सुरक्षित निकलने का रास्ता दिया। इसके साथ ही उन्होंने आजाद भारत के कई प्रमुख नेताओं जैसे, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित कई वीवीआईपी यात्रियों को उड़ान दी। जब उनके पति ने तत्कालीन टाटा एयरलाइंस में प्रशासनिक कार्यभार संभाला, तो सुंदरम नेहरू की पायलट बनी रहीं। उनके उड़ाए गए कुछ विमानों में नागरिक दो इंजन वाला डीसी-3 डकोटा भी शामिल था। उनकी कुछ उल्लेखनीय उड़ानों में साल 1947 के विभाजन दंगों के दौरान तत्कालीन नवगठित पाकिस्तान से बचाव अभियान शामिल थे, जिनमें उन्होंने अपने पति के साथ उड़ान भरी थी।
उन्होंने भारत के तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल को मैसूर के महाराजा के डकोटा विमान में भी यात्रा कराई थी, जब पटेल रियासतों को भारत में एकीकृत करने के मिशन पर थे । इसके साथ ही साल 1950 में मद्रास सरकार ने उषा और उनके पति से इंग्लैंड से एक नया विमान, डी हैविलैंड डोव, खरीदने के लिए कहा। इस विमान को लेने के लिए यह दंपति जहाज़ से इंग्लैंड गया।1951 में वे दोनों मिलकर इस विमान को उड़ाकर भारत वापस लाए। उनकी यह उड़ान लंदन से बॉम्बे (अब मुंबई) तक थी, जो पेरिस, कराची और बगदाद होते हुए पूरी हुई। उन्होंने यह लंबी यात्रा केवल 27 घंटों में पूरी की, जिससे इंग्लैंड से भारत तक पिस्टन इंजन वाले विमान की उड़ान का एक नया विश्व रिकॉर्ड बना। यह रिकॉर्ड आज भी कायम है। साल 1952 में उषा सुंदरम ने अपने तीन बच्चों की देखभाल और पालन-पोषण के लिए जल्दी से सेवानिवृत्ति ले ली। वे पहले बेंगलुरु में रहीं और बाद में चेन्नई में बस गईं।
भारत के विभाजन ने हिंसा और बड़े पैमाने पर विस्थापन को जन्म दिया। इस अशांत और भयावह दौर में उषा ने अपने पति के साथ मिलकर कई राहत और बचाव अभियान चलाए।उन्होंने साहस के साथ हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों के बीच जाकर शरणार्थियों को सुरक्षित निकालने का काम किया। खराब और जोखिम भरे मौसम की परिस्थितियों के बावजूद वे लगातार इन मिशनों में उड़ान भरती रहीं।
ब्लू क्रॉस ऑफ इंडिया की स्थापना और विरासत
उषा की उड़ान के प्रति प्रेम और उपलब्धियां तो पहले से ही प्रसिद्ध थीं, लेकिन उन्हें जानवरों की देखभाल से भी गहरा लगाव था। साल 1959 में उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर ब्लू क्रॉस ऑफ इंडिया की सह-स्थापना की। इस संस्था की शुरुआत उन्होंने अपने ही घर से की, जो आगे चलकर पशु कल्याण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संगठन बन गई। इसको आधिकारिक रूप से 1964 में पंजीकृत किया गया और तब से यह एशिया के सबसे बड़े और सम्मानित पशु कल्याण संगठनों में से एक बन गया है। बचाव, पुनर्वास और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने कई जरूरतमंद जानवरों की मदद की ।
इस तरह वह सामाजिक कार्यों में अपना योगदान देती रहीं, 6 अप्रैल 2010 को चेन्नई में उनकी मृत्यु हो गई । भारतीय विमानन इतिहास और पशु कल्याण के क्षेत्र में एक अमिट छाप छोड़ी। भले ही आज वो जीवित नहीं हैं, लेकिन अपने योगदान के माध्यम से वो हमेशा याद की जाती रहेंगी। उषा सुंदरम का जीवन इस बात का प्रमाण है कि साहस और दृढ़ निश्चय से महिलाएं किसी भी रूढ़िवादी बाधा को तोड़ सकती हैं। उन्होंने न केवल भारतीय विमानन में अपनी पहचान बनाई, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में भी प्रेरणा दी। उनकी विरासत आज भी महिलाओं को अपने सपनों के लिए आगे बढ़ने का हौसला देती है।

