समाजख़बर कर्नाटक का एंटी-ऑनर किलिंग बिल: शादी की स्वतंत्रता की ओर बड़ा कदम

कर्नाटक का एंटी-ऑनर किलिंग बिल: शादी की स्वतंत्रता की ओर बड़ा कदम

कर्नाटक का एंटी-ऑनर किलिंग विधेयक केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह विधेयक युवाओं के अपने जीवनसाथी चुनने के अधिकार को मान्यता देता है और उन पितृसत्तात्मक व जातिगत ढांचों को चुनौती देता है, जो लंबे समय से व्यक्तिगत आजादी पर नियंत्रण रखते आए हैं।

भारतीय समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का निजी निर्णय नहीं होता, बल्कि परिवार, जाति और समुदाय की कथित ‘इज़्ज़त’ से जुड़ा हुआ एक सामूहिक मामला माना जाता रहा है। इसी सोच के कारण आज भी कई युवा अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने के अधिकार से वंचित हैं। कई बार उन्हें हिंसा, बहिष्कार और यहां तक कि ‘ऑनर किलिंग’ जैसी अमानवीय घटनाओं का भी सामना करना पड़ता है। अक्सर ऑनर किलिंग में परिवार के ‘सम्मान को बचाने’ के लिए महिला सदस्य की हत्या कर दी जाती है, जो अपने जीवनसाथी या प्रेम संबंध चुनना चाहती है।

जब कोई महिला अपनी मर्ज़ी से अपना साथी चुनती है, प्रेम करती है तो, इस समाज का सम्मान कम होने लगता है। पुरुष प्रधान समाज को यह लगने लगता है कि आखिर एक महिला इतनी सशक्त कैसे होने लगी, कैसे उसने रूढ़िवादी नियमों को तोड़ दिया। ऐसे में कर्नाटक सरकार के एंटी-ऑनर किलिंग बिल लाने की पहल एक महत्वपूर्ण सामाजिक और कानूनी हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह कदम न केवल शादी करने की आजादी को मान्यता देता है, बल्कि हमारे समाज में उन गहरे जड़ जमाए हुए पितृसत्तात्मक और जातिगत ढांचों को चुनौती भी देता है, जो व्यक्तिगत अधिकारों पर सामुदायिक नियंत्रण को प्राथमिकता देते रहे हैं।

ऑनर किलिंग यानी परिवार का तथाकथित सम्मान बचाने के लिए घर के ही किसी एक सदस्य की हत्या करना। यह सदस्य जिसकी हत्या होती है, ज्यादातर मामलों में अक्सर एक महिला ही होती है। वह महिला, जो बालिग होने पर अपना जीवन-साथी चुनने का अधिकार रखती है।

क्या है इस बिल की खासियत?

इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख के मुताबिक, 21 दिसंबर 2025 को कर्नाटक के धारवाड़ जिले में सात महीने की गर्भवती एक 19 वर्षीय लड़की को उसके पिता और अन्य रिश्तेदारों ने, उनकी इच्छा के विरुद्ध एक दलित लड़के से शादी करने के कारण पीट-पीटकर हत्या कर दी।ऐसी घटनाएं राज्य में पहले भी होती रही हैं, जहां अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों पर परिवार हिंसा का सहारा लेते हैं। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने तथाकथित ‘सम्मान हत्याओं’ पर रोक लगाने के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक विधेयक पेश किया,विवाह में स्वतंत्रता और सम्मान और परंपरा के नाम पर अपराधों की रोकथाम एवं निषेध विधेयक 2026 (एवा नम्मावा विधेयक), जो ऐसे अपराधों को सख्ती से नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि कुछ मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल (एमएलसी) ने कानून को लेकर चिंता जताईं। लेकिन विधानसभा में भाजपा विधायकों के इस विधेयक का विरोध करने के बावजूद, परिषद ने सर्वसम्मति से इसे पारित कर दिया। 

इस विधेयक की कुछ खास विशेषताएं हैं जैसे कि इसमें शादी करने की आज़ादी का प्रावधान है, जिसे ‘एवा नम्मावा’ विधेयक के नाम से भी जाना जाता है। विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि एक बार दो वयस्क शादी करने का निर्णय ले लें, तो माता-पिता, परिवार, जाति और गोत्र की सहमति जरूरी नहीं है। यह विधेयक दंपत्ति के विरुद्ध की गई हिंसा, धमकी और शोषण को अपराध घोषित करता है और इसके लिए विभिन्न दंडों का प्रावधान करता है। साथ ही, यह विधेयक ऐसे दंपत्तियों को अपने संबंध को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी सहायता भी प्रदान करता है। इसके साथ ही भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के बावजूद, ऑनर किलिंग के दोषी पाए जाने वालों को कम से कम पांच साल की अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी। द न्यूज मिनट में छपे एक लेख के मुताबिक, इसमें आदेश दिया गया है कि पुलिस शिकायत मिलने के छह घंटे के भीतर धमकी का सामना कर रहे दंपतियों को सुरक्षा प्रदान करे और प्रत्येक जिले में राज्य के वित्त पोषित सुरक्षित आवासों का निर्माण अनिवार्य किया गया है, जहां वकीलों और गैर सरकारी संगठनों तक पहुंच हो।विधेयक की धाराओं के तहत दंपत्ति को धमकाने के मामले भी दर्ज किए जा सकेंगे। इस कानून के अंतर्गत आने वाले अपराध गैर-जमानती होंगे।

राज्य सरकार ने तथाकथित ‘सम्मान हत्याओं’ पर रोक लगाने के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक विधेयक पेश किया,विवाह में स्वतंत्रता और सम्मान और परंपरा के नाम पर अपराधों की रोकथाम एवं निषेध विधेयक, 2026 (एवा नम्मावा विधेयक), जो ऐसे अपराधों को सख्ती से नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है

जाति, नियंत्रण और ऑनर किलिंग की बढ़ती घटनाएं 

इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख के मुताबिक, पिछले पांच सालों में कर्नाटक में ऑनर किलिंग के लगभग 15 मामले दर्ज किए गए हैं। कर्नाटक के कई हिस्सों में जाति आज भी एक प्रमुख कारक बनी हुई है। कई गाँव, खासतौर पर राज्य के पिछड़े क्षेत्रों में जातिगत आधार पर विभाजित हैं। हालांकि अंतरधार्मिक जोड़ों के खिलाफ हिंसा की कई घटनाएं होती रहती हैं। इसका एक उदाहरण साल 2025 में कलाबुरगी के मेलाकुंडा गांव में एक लड़की के साथ ऑनर किलिंग की घटना देखी जा सकती है, जब एक 18 वर्षीय लड़की को उसके पिता और दो रिश्तेदारों ने उसके अंतरजातीय संबंध के कारण गला घोंटकर और जलाकर मार डाला था। यह कोई पहली घटना नहीं है, इस तरह की कई कई घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। इसका एक और उदाहरण साल 2025 का ही देखा जा सकता है, जब बिहार के दरभंगा मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल (डीएमसीएच) में बीएससी नर्सिंग सेकेंड सेमेस्टर के छात्र की हत्या कर दी गई। आरोपी कोई और नहीं था, बल्कि उसकी पत्नी का ही पिता था, जो बेटी के लव मैरिज (अंतरजातीय शादी) करने पर नाराज था। 

इससे ये साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि हमारा समाज किस हद तक महिला विरोधी और जातिवादी है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि हमारे समाज में अब भी गहरी जातिवादी सोच और महिलाओं की आज़ादी के प्रति नफरत मौजूद है। पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले समाज में अगर कोई महिला अपने फैसले पर डटी रहे, तो उसे ही दोषी मान लिया जाता है। जबकि डॉ भीमराव आंबेडकर और महात्मा गांधी अंतरजातीय शादियों के बहुत बड़े समर्थक थे, गांधी ने संकल्प लिया था कि वे केवल अंतर्जातीय विवाह में शामिल होंगे। आज समाज के कट्टरपंथी लोग नहीं देखते कि बड़े-बड़े नेता, उद्योगपति , सारे सत्ताधारी लोगों की बेटियों की शादी जब अन्य जाति या धर्म मे होता है। तब कोई कट्टरपंथी उनसे सवाल करने की हिम्मत नहीं करते। वहीं कमजोर वर्ग के लिए धर्म और जाति जैसे कई बंधन बहुत सख्त और मुश्किल हो जाते हैं, जो उन्हें अपनी आज़ादी से जीने नहीं देते।

इसमें आदेश दिया गया है कि पुलिस शिकायत मिलने के छह घंटे के भीतर धमकी का सामना कर रहे दंपतियों को सुरक्षा प्रदान करे और प्रत्येक जिले में राज्य के वित्त पोषित सुरक्षित आवासों का निर्माण अनिवार्य किया गया है, जहां वकीलों और गैर सरकारी संगठनों तक पहुंच हो।

चुनौतियां और आगे की राह

ऑनर किलिंग के मामलों में अक्सर जाति, धर्म और पितृसत्तात्मक सोच महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समाज में हर तरह की असमानता औऱ भेदभाव हमेशा महिलाओं से ही जाकर जुड़ता है। जातिगत भेदभाव और नफरत ही ऑनर किलिंग में मुख्य भूमिका में होते है। फ्रंट लाइन में छपी साल 2021 की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में में 33 ऑनर किलिंग दर्ज की गईं, हालांकि कार्यकर्ता इसे हास्यास्पद रूप से कम आंकते हैं। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का अनुमान है कि पारिवारिक सम्मान के नाम पर वैश्विक स्तर पर हर साल लगभग 5,000 महिलाओं और लड़कियों की हत्या कर दी जाती है।

कुछ गैर-सरकारी संगठन यह आंकड़ा 20,000 से 50,000 तक बताते हैं। दलित मानवाधिकार रक्षक नेटवर्क के शोधकर्ताओं ने साल 2020 में किए गए एक अध्ययन में, सात भारतीय राज्यों के मामलों की जांच करते हुए पाया गया, कि अधिकांश सर्वाइवर अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्य थे,जिन्हें किसी उच्च जाति के व्यक्ति से प्रेम करने के अपराध में मार डाला गया था। इसलिए इस पर कुछ नीतियां और कानूनों का होना बहुत जरूरी है, इसके साथ ही पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही और तुरंत कार्यवाही करना बहुत जरूरी है।अक्सर देखा गया है कि ऑनर किलिंग जैसे मामलों में पुलिस प्रारंभिक स्तर पर शिकायत दर्ज करने में ही हिचकिचाती है या इसे पारिवारिक मामला कहकर इधर – उधर कर दिया जाता है। सर्वाइवर्स के लिए सुरक्षित जगह का प्रावधान करवाने की जरूरत है। इसमें सेफ हाउस, कानूनी सहायता जैसी व्यवस्थाएं शामिल होनी चाहिए। क्योंकि कई बार यह जोड़े अपने ही परिवार और समुदाय से खतरे में पड़ जाते हैं, ऐसे में राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि वह उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करे।

इसके साथ गाँव और समाज में अंतर्जातीय शादियों से जुड़े हुए जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है। ताकि लोग प्यार और इसके महत्व को समझ सकें। कर्नाटक का एंटी-ऑनर किलिंग विधेयक केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह विधेयक युवाओं के अपने जीवनसाथी चुनने के अधिकार को मान्यता देता है और उन पितृसत्तात्मक व जातिगत ढांचों को चुनौती देता है, जो लंबे समय से व्यक्तिगत आजादी पर नियंत्रण रखते आए हैं। जब तक हर व्यक्ति, खासतौर पर महिलाओं और कमजोर वर्गों को, बिना डर और दबाव के अपने जीवन के फैसले लेने की आज़ादी नहीं मिलेगी, तब तक समानता और न्याय का सपना अधूरा ही रहेगा।

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