भारतीय समाज में लैंगिक भेदभाव से जुड़े पूर्वाग्रह कई दशकों से चलते आ रहे हैं। यह लैंगिक रूढ़िवादिता अक्सर लैंगिक भेदभावपूर्ण विचारों और व्यवहारों को जन्म देती है, जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं और हाशिए पर रहे समुदायों पर पड़ता है। समाज में लैंगिक भेदभाव कई रूपों में मौजूद है। इनमें से एक है, होस्टाइल सेक्सिज्म (शत्रुतापूर्ण लिंगभेद) जो महिलाओं के प्रति नफरत, अविश्वास और नकारात्मक रूढ़ियों पर आधारित होता है। यह केवल व्यक्तिगत सोच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, और व्यक्तिगत व्यवहार में भी गहराई से शामिल होता है। महिलाओं को अक्सर शत्रुतापूर्ण और परोपकारी लैंगिक भेदभाव के दोहरे नजरिए से देखा जाता है। हालांकि पुरुषों और महिलाओं दोनों में ही महिलाओं के प्रति विरोधाभासी लैंगिक भेदभावपूर्ण धारणाएं होना आम बात है। लैंगिक भेदभाव से जुड़ी सभी अभिव्यक्तियां हानिकारक लैंगिक रूढ़ियों से प्रेरित होती हैं जो असमानता को बढ़ावा देती हैं। ये महिलाओं के प्रति नकारात्मक पूर्वाग्रहों और भेदभावपूर्ण दृष्टिकोणों को सुदृढ़ करती हैं, उनकी उपलब्धियों को कमतर आंकती हैं और जीवन के सभी क्षेत्रों में अवसरों तक उनकी पहुंच को सीमित करती हैं।
होस्टाइल सेक्सिज्म की परिभाषा और ‘मैनस्प्लेनिंग’
डेवलप डाइवर्स में छपे एक लेख के मुताबिक, शत्रुतापूर्ण लिंगभेद से तात्पर्य लैंगिक भेदभाव के उस रूप से है जिसमें पारंपरिक जेंडर आधारित भूमिकाओं के अनुरूप न होने वाले व्यक्तियों के प्रति नकारात्मक और शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया जाता है। इसका एक उदाहरण वे महिलाएं हैं जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग जैसे परंपरागत रूप से पुरुष प्रधान क्षेत्रों में प्रवेश करती हैं। इस संदर्भ में, यह तब शुरू होता है जब महिलाएं पितृसत्तात्मक मानदंडों से हटकर काम करती हैं, जिससे हिंसा के कई रूप सामने आ सकते हैं। इसके साथ ही लैंगिक भेदभाव के कारण खुले तौर पर शत्रुता, यौन हिंसा, और तिरस्कार जैसी घटनाएं हो सकती हैं। इसके अलावा, मौखिक दुर्व्यवहार और अपमानजनक टिप्पणियां भी हो सकती हैं। मूल रूप से, शत्रुतापूर्ण लिंगभेद पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं और रूढ़ियों को बनाए रखता है । इसे लिंगभेद की एक सामान्य अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो पूर्वाग्रह, स्त्री द्वेष और लिंग पहचान के आधार पर व्यक्तियों के अवमूल्यन में गहराई से निहित है।
होस्टाइल सेक्सिज्म (शत्रुतापूर्ण लिंगभेद) जो महिलाओं के प्रति नफरत, अविश्वास और नकारात्मक रूढ़ियों पर आधारित होता है। यह केवल व्यक्तिगत सोच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, और व्यक्तिगत व्यवहार में भी गहराई से शामिल होता है।
यह जेंडर आधारित भेदभाव सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है। यह उन लोगों के खिलाफ भी होता है जो समाज में पुरुषों के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं, जैसे कि ट्रांस और क्वीयर समुदाय के लोग भी इसमें शामिल हैं। शत्रुतापूर्ण लिंगभेद ऐसे कई नकारात्मक और महिला -विरोधी विचारों के रूप में सामने आता है, जैसे यह मानना कि महिलाएं अक्षम होती हैं। वह बहुत ज्यादा भावुक होती हैं और पुरुषों जितनी सक्षम नहीं होतीं। इसी सोच के तहत यह भी कहा जाता है कि महिलाएं यौन हिंसा के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। इसके अलावा, महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने पेशेवर या व्यक्तिगत सपनों से पहले मां और देखभालकर्ता की भूमिका को प्राथमिकता दें। ‘मैनस्प्लेनिंग’ जैसी प्रथाएं भी इसी का हिस्सा हैं, जहां पुरुष महिलाओं की जानकारी या अनुभव को नजरअंदाज करते हुए उन्हें नीचा दिखाकर समझाने की कोशिश करते हैं।
बेनेवॉलेंट और होस्टाइल सेक्सिज्म
लैंगिक भेदभाव महिलाओं के प्रति दृष्टिकोणों का एक जटिल और विरोधाभासी समूह है, जिसमें परोपकारी और शत्रुतापूर्ण दोनों पहलू शामिल हैं। यह स्वीकार करता है कि लैंगिक भेदभाव हमेशा नकारात्मक नहीं होता, बल्कि इसमें ऐसे दृष्टिकोण भी शामिल हो सकते हैं जो देखने में सकारात्मक या अनुकूल प्रतीत होते हैं। लेकिन फिर भी लैंगिक असमानताओं को कायम रखते हैं। साइकोलॉजी टुडे में छपे लेख के मुताबिक, बीस से अधिक सालों के वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि परोपकारी लैंगिक भेदभाव (बेनेवॉलेंट सेक्सिज्म) और शत्रुतापूर्ण लैंगिक भेदभाव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लैंगिक भेदभाव की सोच रखने वाले पुरुष आमतौर पर केवल एक ही तरह का व्यवहार नहीं करते।
लैंगिक पूर्वाग्रह के कारण महिलाओं की योग्यता और क्षमताओं को अक्सर कम आंका जाता है। इसका असर यह होता है कि उन्हें प्रमोशन और नेतृत्व के मौके कम मिलते हैं, जिससे उनके करियर की प्रगति रुक जाती है, जो उन्हें नेटवर्किंग के अवसरों, मेंटरशिप कार्यक्रमों और महत्वपूर्ण परियोजनाओं से वंचित रखते हैं।
वे अपने आस-पास के लोगों के आधार पर अलग-अलग प्रकार के लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। हालांकि ये दोनों अवधारणाएं रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों को मजबूत करने में एक-दूसरे की पूरक हैं। जहां परोपकारी लिंगभेद महिलाओं को संरक्षण प्रदान करता है और पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं का पालन करने पर उनकी सराहना करता है। वहीं शत्रुतापूर्ण लिंगभेद इसके विपरीत करने पर महिलाओं को दंडित करता है।हालांकि लैंगिक भेदभाव के दोनों रूप असमानता को बढ़ाते हैं, फिर भी महिलाएं अक्सर इसके ‘सकारात्मक’ रूप को आसानी से स्वीकार कर लेती हैं। लेकिन सच यह है कि जैसे सकारात्मक रूढ़ियां समानता की राह में रुकावट बनती हैं, वैसे ही सकारात्मक दिखने वाला लैंगिक भेदभाव भी पारंपरिक भूमिकाओं को और मजबूत करता है।
होस्टाइल लैंगिक भेदभाव का प्रभाव
अब पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में सफल होने वाली महिलाओं की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लैंगिक भेदभाव की बाधा अचानक खत्म हो गई है।ऐतिहासिक रूप से, विज्ञान, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र में महिलाओं की कमी लैंगिक भेदभाव को साफ तौर पर दिखती है।कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी अभी भी संतोषजनक नहीं है। प्लॉस मेडिसिन में छपे एक लेख के मुताबिक, भारत में एसटीईएम स्नातकों में महिलाओं की संख्या 40 फीसदी से अधिक है, लेकिन एसटीईएम कार्यबल में केवल 20 से 30 फीसदी पेशेवर ही महिलाएं हैं। इसके साथ ही भारत में अनुसंधान संस्थानों और उच्च शिक्षा में वैज्ञानिकों और संकाय सदस्यों में महिलाओं की संख्या 20 से भी कम है। जबकि भारतीय महिलाएं एसटीईएम में उल्लेखनीय क्षमताएं प्रदर्शित करती हैं, कार्यस्थल के खतरों और बुनियादी ढांचे में कमियों सहित प्रणालीगत चुनौतियां अक्सर उनके पेशेवर अवसरों और करियर की प्रगति को सीमित करती हैं।
डेवलप डाइवर्स में छपे एक लेख के मुताबिक,लैंगिक पूर्वाग्रह के कारण महिलाओं की योग्यता और क्षमताओं को अक्सर कम आंका जाता है। इसका असर यह होता है कि उन्हें प्रमोशन और नेतृत्व के मौके कम मिलते हैं, जिससे उनके करियर की प्रगति रुक जाती है, जो उन्हें नेटवर्किंग के अवसरों, मेंटरशिप कार्यक्रमों और महत्वपूर्ण परियोजनाओं से वंचित रखते हैं।यहअक्सर ऐसा माहौल बना देता है, जहां महिलाओं को यौन हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इससे उनके भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर होता है और उनके काम करने की क्षमता और भागीदारी भी कम हो जाती है।लैंगिक भेदभाव के कारण महिलाओं को अक्सर समान काम के लिए पुरुषों से कम वेतन मिलता है। इससे उनकी आर्थिक सुरक्षा कमजोर होती है, वे अपने करियर में उतना निवेश नहीं कर पातीं और कार्यस्थल पर असमानता और बढ़ जाती है। इस तरह से कई लैंगिक भेदभाव मिलकर असमानता को बढ़ाते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम हर तरह के भेदभाव को समझें और उसे बदलने की कोशिश करें, तभी सही मायनों में समानता आ पाएगी और हर एक व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार आजादी से जीवन जी सकेगा।

