समाजकैंपस साफ-सुथरे शैक्षिक संस्थानों के पीछे हाशिये के लोगों का संघर्ष और चुनौतियां

साफ-सुथरे शैक्षिक संस्थानों के पीछे हाशिये के लोगों का संघर्ष और चुनौतियां

सफाई कर्मचारी किसी भी संस्थान की बुनियादी व्यवस्था को बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। वे सुबह से ही काम शुरू कर देते हैं, ताकि परिसर छात्रों और शिक्षकों के आने से पहले स्वच्छ और व्यवस्थित हो। भारत में सफाई का काम हमेशा से ही सामाजिक रूप से हाशिये के समुदायों से जुड़ा रहा है।

चमकते हुए कैंपस के पीछे कुछ ऐसे लोग मेहनत करते हैं, जिनके काम को अक्सर कोई नहीं देखता। हम आमतौर पर किसी शैक्षणिक संस्थान को सिर्फ ज्ञान और विकास का केंद्र मानते हैं। जब भी हम अंदर जाते हैं, तो हमारी पहली नज़र हमेशा साफ-सुथरे कैंपस, वहां की हरियाली और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ती है। ऐसा माहौल छात्रों और अन्य लोगों के लिए अच्छा अनुभव बनाता है और बाहर से आने वालों को भी आकर्षित करता है। लेकिन इसके पीछे काम करने वाले स्टाफ की अपनी एक अलग दुनिया होती है, जिसके बारे में कम ही बातें होती हैं। कैंपस की सफाई करने वाले सफाई कर्मचारी, कैंपस की सुंदरता बढ़ाने वाले माली, क्लासरूम और ऑफिस को साफ-सुथरा रखने वाले हाउसकीपिंग स्टाफ, और सुरक्षा व्यवस्था संभालने वाले सुरक्षा गार्ड जैसे लोग प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

वे जिम्मेदारी के साथ अपनी ड्यूटी करते हैं ताकि बाकी लोग बिना किसी चिंता के यहां आ-जा सकें। इनका काम अक्सर पर्दे के पीछे होता है, बिना किसी शोर-शराबे के। उनकी मेहनत और परेशानियां आमतौर पर लोगों की नज़रों से छिपी रहती हैं। लोग उनसे बात नहीं करते, उनकी समस्याओं को नहीं सुनते और समझने की कोशिश भी कम करते हैं। सुरक्षा व्यवस्था की बात करें तो, गार्ड्स पर दिन-रात कैंपस की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है। रात के समय, जब पूरा कैंपस सो रहा होता है, गार्ड्स चौकसी करते रहते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि सब सुरक्षित रहे।

मेरी ड्यूटी रात भर रहती है। नींद आती है, लेकिन ड्यूटी पहले है। हॉस्टल के बच्चों की जिम्मेदारी है, इसलिए पूरे कैंपस पर नजर रखनी ही पड़ती है।

बुनियादी व्यवस्था को बनाए रखने में भूमिका  

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के 50 वर्षीय गार्ड रमेश शाह बताते हैं, “मेरी ड्यूटी रात भर रहती है। नींद आती है, लेकिन ड्यूटी पहले है। हॉस्टल के बच्चों की जिम्मेदारी है, इसलिए पूरे कैंपस पर नजर रखनी ही पड़ती है।” उनकी यह बात साफ कर देती है कि यह काम सिर्फ वर्दी पहन लेने का नहीं है, बल्कि इसमें पूरा ध्यान और जिम्मेदारी चाहिए। अब सफाई कर्मचारियों की तरफ ध्यान दें, तो पाएंगे कि सुबह की पहली किरण के साथ ही वे अपने काम में जुट जाते हैं, ताकि जब विद्यार्थी और शिक्षक पहुंचें, तो उन्हें कैंपस साफ-सुथरा मिले। सफाई कर्मचारी किसी भी संस्थान की बुनियादी व्यवस्था को बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। वे सुबह से ही काम शुरू कर देते हैं, ताकि परिसर छात्रों और शिक्षकों के आने से पहले स्वच्छ और व्यवस्थित हो। भारत में सफाई का काम हमेशा से ही सामाजिक रूप से हाशिये के समुदायों से जुड़ा रहा है।

भोपाल के जागरण लेक यूनिवर्सिटी, में काम कर रही 38 वर्षीय सफाई कर्मचारी रीता गोंड बताती हैं, “हम सुबह आकर पूरा कैंपस साफ करते हैं। कई बार लोग हमारे सामने ही कचरा फेंक देते हैं। काम के घंटे लंबे होते हैं और वेतन कम होता है, जिससे गुज़ारा करना मुश्किल हो जाता है।” ये परेशानियां केवल एक या दो जगह की बात नहीं हैं। हर संस्थान में ऐसा देखने को मिल ही जाता है, चाहे वह शैक्षणिक संस्थान हो या कोई अन्य। भोपाल के सागर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स, आईआईएस कॉलेज, मिलेनियम कॉलेज जैसे सभी प्रतिष्ठित जगह के  हालात लगभग एक जैसे ही हैं। भोपाल के आईआईएस कॉलेज में रहने वाली 40 वर्षीय राखी मीना, जो वहां वर्किंग स्टाफ के रूप में काम कर रही हैं कहती हैं, “हम दिन भर सफाई करते हैं, लेकिन हमें कभी कद्र नहीं मिलती। अगर काम में थोड़ी कमी हो जाए तो बहुत डांटा जाता है।”

सफाई कर्मचारी किसी भी संस्थान की बुनियादी व्यवस्था को बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। वे सुबह से ही काम शुरू कर देते हैं, ताकि परिसर छात्रों और शिक्षकों के आने से पहले स्वच्छ और व्यवस्थित हो। भारत में सफाई का काम हमेशा से ही सामाजिक रूप से हाशिये के समुदायों से जुड़ा रहा है।

सफाई के काम में सामाजिक सुरक्षा

भोपाल की मिलेनियम कॉलेज में रहने वाली 32 वर्षीय कविता यादव कहती हैं, “पूरे दिन ऑफिस के कमरे, कक्षाएं, दरवाज़े, खिड़कियां, बोर्ड सब साफ करती हूं। आने का समय फिक्स है, लेकिन घर जाने का समय निश्चित नहीं। घर पहुंचते-पहुंचते रात हो जाती है।” कैंपस में रंग-बिरंगे फूल, पेड़ों की छाया और तितलियों की हलचल अक्सर लोगों का ध्यान खींचती है। लेकिन इसके पीछे जो मेहनत छुपी है, उस पर शायद ही कोई ध्यान देता है। माली, सफाईकर्मी और बाकी कर्मचारी हर दिन, बिना थके, अपना काम करते हैं ताकि परिसर साफ-सुथरा और हरा-भरा बना रहे। इसलिए जरूरी है कि हम उनके काम का भी सम्मान करें। आखिर, असली सुंदरता इन्हीं की मेहनत से आती है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पौधों की देखभाल करने वाली 50 वर्षीय रीता मालवीय बताती हैं, “दोपहर में धूप निकल जाती है, इसलिए मैं सुबह जल्दी आ जाती हूं। गर्मियों में पौधों में पानी डालना बहुत जरूरी है। अगर फूल और पौधे सुख जाएं तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। इन पौधों को मैंने अपने ही हाथों से लगाया था। झाड़ियां भी काटती रहती हूं ताकि बच्चों को कोई कीड़ा ना काटे। बच्चे सुरक्षित रहें और विश्वविद्यालय भी सुंदर दिखे।”

दोहरी जिम्मेदारी निभाती महिलाएं

घर की जिम्मेदारी और रोज़गार का बोझ एक साथ संभालना आसान नहीं है। सफाई और हाउसकीपिंग में महिलाओं की बड़ी भागीदारी है। हर क्षेत्र और संस्थान में महिलाएं काम करती हैं। फर्क बस इतना है कि कुछ महिलाएं अपने पैशन के लिए काम करती हैं, जबकि कुछ अपनी आर्थिक स्थिति के कारण मजबूर हैं। वे घर के काम के साथ-साथ परिवार के लिए कमाती भी हैं। सुबह घर संभालना, खाना बनाना, बच्चों को स्कूल भेजना और फिर स्कूल या कॉलेज में काम करना, हर जगह महिलाएं अपनी भूमिका निभाती हैं। घंटों काम करने के बाद भी घर जाकर वही सिलसिला दोहराना पड़ता है। ये महिलाएं बिना शिकायत दोहरी जिम्मेदारी निभाती हैं, लेकिन इस वजह से उन पर मानसिक और शारीरिक दबाव भी बढ़ जाता है। डीडब्ल्यू में प्रकाशित रिपोर्ट भारत के ‘नैशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम’ (NAMASTE) के आंकड़ों के अनुसार, भारत के 38,000 सीवर और सेप्टिक कर्मचारियों में से कम से कम 77 फीसद दलित समुदाय से हैं।

दोपहर में धूप निकल जाती है, इसलिए मैं सुबह जल्दी आ जाती हूं। गर्मियों में पौधों में पानी डालना बहुत जरूरी है। अगर फूल और पौधे सुख जाएं तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। इन पौधों को मैंने अपने ही हाथों से लगाया था। झाड़ियां भी काटती रहती हूं ताकि बच्चों को कोई कीड़ा ना काटे। बच्चे सुरक्षित रहें और विश्वविद्यालय भी सुंदर दिखे।

यह सिर्फ रोजगार का मामला नहीं है। हमारे समाज में श्रम और जाति का गहरा रिश्ता है। सदियों से सफाई का काम दलित और अन्य हाशिये के समुदायों से जुड़ा रहा है। कई जगह उन्हें उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके काम से ही जाना जाता है। आज भी सफाई कर्मचारी की सामाजिक, आर्थिक या शैक्षिक स्थिति वही है, जिसे समाज ने लंबे समय तय किया हुआ है। ज़्यादातर कर्मचारियों की आमदनी बहुत सीमित होती है। कम तनख्वाह, अस्थायी घर, बच्चों की पढ़ाई की चिंता, इलाज की सुविधाओं की कमी, काम के लंबे घंटे, ये उन सबकी रोज़ की परेशानियां हैं।

शैक्षिक संस्थानों के चमकते कैंपस के पीछे इन कर्मचारियों की मेहनत छिपी होती है, जिन्हें अक्सर वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। जिस क्लासरूम में हम बैठते हैं और जिस परिसर में घूमते हैं, वह किसी की रोज़ की मेहनत का नतीजा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उन्हें उतनी ही इज्जत देते हैं? कचरा कम फैलाना, धन्यवाद कहना और विनम्र रहना छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन यही किसी का दिन बदल सकती हैं। सच यह है कि किसी भी संस्थान की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों या विद्यार्थियों से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी है जो रोज़ उसे संवारते हैं। इसलिए उनके योगदान और स्थिति को समझना जरूरी है, ताकि एक सम्मानजनक और समान वातावरण बनाया जा सके।

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