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‘सड़कों के किनारे, मंदिरों के पास या फिर किसी भी सार्वजनिक जगह पर हम अक्सर ऐसे बच्चों को देखते है, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं होता और हम जब कभी भी चंद पैसे, कपड़े व समान देकर उनकी मदद करते हैं, तो अक्सर अपने मन में यह सोचते हैं कि काश! मेरे पास इतने पैसे और शक्ति हो कि भविष्य में मैं उनकी मदद कर सकूं। इसके बाद, हमारे भविष्य में पैसे और शक्ति दोनों का आगमन तो हो जाता है, पर दुर्भाग्यवश हमारी वह कामना उस बचपन का एक ऐसा सपना बन कर रह जाती है जो कभी पूरा नहीं होता है| पर यह ज़रूरी नहीं कि भूल जाना ही ऐसी हर कहानी का अंत हो। हमारे ही समाज में आज तक कई ऐसी शख्सियत हुई हैं और मौजूदा हैं भी, जिन्होंने बिना किसी साधन की उपलब्धता के वह काम कर दिखाया, जिसे हम पैसे और शक्ति के होने पर भी नहीं कर पाते क्योंकि उनके पास उस बचपन के लिए जो ‘इच्छाशक्ति और दृढ़निश्चय’ का गुण रहा है, वह हमारे पास नहीं था। ऐसी ही एक इच्छाशक्ति का नाम है ‘सिंधुताई सपकाल’|

आज के समय में हर इंसान सिर्फ अपने बारे में सोचता है| पर ऐसे दौर में भी सिंधुताई सपकाल जैसी शख्सियत भी हैं जो समाज में अपने अद्भुत योगदान से आम धारणा को उलट कर ‘खास’ होने की दास्तां लिख रही हैं।

नापसंद ‘चिंदी’ का बाल-विवाह

महाराष्ट्र के वर्धा जिले में ‘पिपरी मेघे’ गांव है, जहां सिंधुताई सपकाल का जन्म हुआ। उनके पिता जानवरों को चराने का काम करते थे। क्योंकि सिंधुताई बेटा नहीं, बेटी थी, इसलिए परिवारवाले उन्हें नापसंद करते और उन्हें ‘चिंदी’ (कपड़े का फटा टुकड़ा) कह कर बुलाते थे, लेकिन उनके पिता अपनी बेटी को जीवन में आगे बढ़ते देखना चाहते थे, इसलिए सिंधुताई की मां के खिलाफ जाकर वे उन्हें स्कूल पढ़ने भेजते थे।

मां का विरोध और घर की आर्थिक परिस्थितियों की वजह से सिंधुताई की शिक्षा में बाधाएं आती रहीं। दस साल की सिंधुताई जब चौथी कक्षा में पढ़ रही थीं, तब उनकी शादी तीस साल के श्रीहरि से हो गई। महज बीस साल की उम्र में वे तीन बच्चों की मां बन गई थीं।

मुखिया के कहने पर घर से निकाल दी गयी सिंधुताई

एक बार गांव के मुखिया ने लोगों को मजदूरी नहीं दी तो सिंधुताई ने उसकी शिकायत जिलाधिकारी से कर दी। अपने अपमान का बदला लेने के लिए मुखिया ने सिंधुताई के पति को आदेश दिया कि वह उन्हें घर से निकाल दे। उस समय सिंधुताई गर्भवती थीं। जिस दिन उन्हें घर से बाहर निकाला गया, उसी रात एक गौशाला में उन्होंने बेटी को जन्म दिया।

श्मशान में गुजारी रातें

इसके बाद, जब वे अपने मायके गर्इं, तो उनकी मां ने उन्हें सहारा देने से इनकार कर दिया। उस समय उनके पिता का देहांत हो चुका था। सिंधुताई अपनी बेटी के साथ रेलवे स्टेशन पर रहने लगीं। दिनभर वे वहां भीख मांगतीं और बेटी की सुरक्षा के लिए रात श्मशान में गुजारतीं। जीवन के संघर्ष के दौरान उन्होंने अनुभव किया कि देश में ऐसे कई बच्चे हैं जिन्हें मां के साये की ज़रूरत है। तब उन्होंने निर्णय किया कि वे अब इन अनाथ बच्चों की मां बनेंगी और उन्हें एक अच्छा भविष्य देंगीं।

बनी हजारों अनाथ का सहारा

सिंधुताई सपकाल: हजारों अनाथ का बनी सहारा

सिन्धुताई ने अपना पूरा जीवन अनाथ बच्चों के लिये समर्पित किया है| इसलिए उन्हें ‘माई’ (माँ) कहा जाता है| उन्होंने 1050 अनाथ बच्चों को गोद लिया है| उनके परिवार में आज 207 दामाद और 36 बहूएँ है| 1000 से भी ज्यादा पोते-पोतियाँ है| उनकी खुद की बेटी वकील है| उनके द्वारा गोद लिए बहुत सारे बच्चे आज डाक्टर, अभियंता, वकील है| और उनमें से कई आज अपना खुद का अनाथाश्रम चलाते हैं| सिन्धुताई को कुल 273 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जिनमें अहिल्याबाई होऴकर पुरस्कार भी शामिल है जो महाराष्ट्र राज्य द्वारा स्त्रियों और बच्चों के लिए काम करनेवाले समाजकर्ताओं के सम्मान में दिया जाता है| पुरस्कार से मिले इन सारे पैसों का उपयोग वे अनाथाश्रम के लिए करती है| उनके अनाथाश्रम पुणे, वर्धा, सासवड (महाराष्ट्र) में स्थित है| सिन्धुताई ने अपने पति को एक बेटे के रुप मे स्वीकार किया ये कहते हुए कि अब वो सिर्फ एक माँ है| आज वे बड़े गर्व के साथ बताती है कि वो (उनके पति) उनका सबसे बड़ा बेटा है|

साल 2010 में उनके जीवन पर आधारित मराठी चित्रपट बनाया गया- ‘मी सिंधुताई सपकाल’। इसे लंदन फिल्म महोत्सव के लिए भी चुना गया।

सिंधुताई इच्छाशक्ति और दृढ़निश्चय की एक ऐसी मिसाल हैं, जिन्होंने कथनी को करनी में बदल कर एक ऐसा इतिहास रचा, जो युगों तक कायम रहेगा। उन्होंने अपने जीवन में ऐसे उतार-चढ़ाव देखे जिनसे उबर कर अपने आपको कायम रखना नामुमकिन होता है, पर सिंधुताई ने न केवल इसे संभव कर दिखाया बल्कि अपने साथ-साथ हजारों बचपन को संवारा और उनके भविष्य को एक मुकम्मल तस्वीर दी।

जन्म के बाद परिवार ने सिंधुताई को इंसान से पहले ‘एक लड़की’ के रूप में देखा, जिसके भाग्य में दर-दर भटकना लिखा था। जिसके परिवार तक ने ‘उपेक्षा’ की, उसने वह कर दिखाया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। वक्त को कौन जानता है भला, कि जिस लड़की को अनचाही-अभागी मान कर ‘चिंदी’ बुलाया जाएगा, वह अपने संकल्प से एक दिन हजारों अनाथ बच्चों की ममतामयी आंचल बन जाएगी।

सन्दर्भ

  1. कंट्रोल Z, पृ 38, स्वाती सिंह, प्रथम संस्करण 2016
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