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हमारे समाज में औरत के दो घर माने गए हैं- पहला, पिता का जहाँ वह पैदा हुई है| दूसरा, पति का जहाँ वह ब्याह कर गयी है| इन दोनों घरों में उसकी तयशुदा भूमिका है जो उसको निभानी पड़ती है| परिवार में उस पर रोक-टोक तबसे लगने लगती है जब वह गद्दे पर पड़ी दो दिन की होती है| पितृसत्तात्मक समाज के महिला-समाजीकरण का यह ख़ास हिस्सा है जिसके तहत महिला को बंधे-बधाएं चौखट में कसा जाता है ताकि वह फ्रेम के बाहर अपने हाथ-पैर निकाल अपनी छवि से अलग न दिखने लगे| यहाँ इस बात का भी ख़ास ख्याल रखा जाता है कि समाज के गढ़े महिला-अस्तित्व की परिभाषा को नकारकर कहीं वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व को पहचानने और जीने न लगे|

उनकी जबान में ऐसा क्या है जिसके खुलते ही भूकंप की संभावना से पूरा घर लरजने लगता है|

रोने में अगर आवाज़ तेज़ निकलती है तो कई बड़ी-बूढी झुंझुलाकर कहती है कि आखिर किस समय मैंने इसका ह्ल्क साफ़ किया था? यह कटाक्ष जो मजाक में कहा गया था जल्द ही फटकार में बदल जाता है कि ‘जबान बहुत चलने लगी है|’ और जब ससुराल में उसे सुनने को मिलता है कि ‘जरा कम बोलो’ तो वह सोचने लगती है कि ऐसा क्या बोलूं जिसपर रोक न लगे; उपदेश और फटकार न मिले; बल्कि एक सहज संवाद की संभावना बने जिसमें वह अपने दिल और दिमाग का सही इस्तेमाल कर सके?

बचपन में हर बात पर रोका-टोकी एक विचित्र अहसास लड़कियों को देती है कि उनकी जबान में ऐसा क्या है जिसके खुलते ही भूकंप की संभावना से पूरा घर लरजने लगता है| मगर दूसरी तरफ क्लास में उन्हें फटकार पड़ती है कि सवाल का जवाब देना ज़रूरी है ताकि पूरी क्लास उसे सुन पाए| यह दोहरा मापदंड उसकी भूमिका को दो फांक कर देता है या फिर दोगला बना देता है कि वह जो पढ़-सीख रही है उसका प्रदर्शन क्लास में है| लेकिन उसे सीखकर उसका इस्तेमाल अगर घर पर किया गया तो वह घर का अनुशासन तोड़ना कहलायेगा|

‘ना’ न कह पाने जैसी आदत भी महिलाओं पर पड़ने के इसी दबाव का नतीजा है|

‘मैं जल्दी किसी को ‘ना’ नहीं कह पाती हूँ|’- नतीजा समाज के दबाव का

बचपन से लड़कियों के लिए समाज के ‘कम बोलो’ वाले दबाव के चलते अधिकतर लड़कियाँ अपने ऊपर विश्वास खो बैठती हैं और ध्यान से दूसरों को सुनकर अंदाज़ा लगाने लगती है कि बोलने वाला क्या सुनना चाहता है| इसी तर्ज पर वह न चाहते हुए भी अपने विचार और जज्बातों को सुनने वाले के अनुसार ढालकर उन्हें उनका मनचाहा जवाब देती है| आपने अक्सर महिलाओं को यह कहते हुए सुना होगा कि ‘मैं जल्दी किसी को ना नहीं कह पाती हूँ|’ ‘ना’ न कह पाने जैसी आदत भी महिलाओं पर पड़ने के इसी दबाव का नतीजा है|

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और पढ़ें – ‘स्वतंत्र औरत’ की पहचान: बस इतना-सा ख्वाब है!

‘औरत को इतना चुप मत कराओ कि वो बोलना ही भूल जाए|’

औरत की ख़ामोशी पर, जो उसका बहुत बड़ा गुण माना जाता है, साहित्य तो रचा ही गया है कई फ़िल्में भी बनाई गई| कभी चुप्पी को तोड़ने के समर्थन में तो कभी ज्यादा बोलने की आलोचना करते हुए| यह सच है कि जज्बात के बयान में संतुलन ज़रूरी है| मौका-महल देखकर जबान खोलना एक बहुत बड़ा सलीका है| इसको सीखना और सिखाना ज़रूर चाहिए| मगर इस हद तक नहीं कि स्त्री का व्यक्तित्व ही कुंठित हो जाए| वह अपनी जबान का इस्तेमाल अपने जज्बात बयान करने में न कर पाए और लगातार शाब्दिक हिंसा शिकार होते हुए भी खामोश रहने में ही अपना बड़कपन समझने लगे|

आज का दौर लड़कियों को सिर्फ ससुराल जाने के लिए तैयार करने का नहीं रह गया है बल्कि संग्राम में बिना घायल हुए अपने अस्तित्व को जमाए रखने का है|

आधी आबादी की बटी हुई दुनिया

हिंदुस्तान एक विराट देश है जहाँ असंख्य धर्म, जाति, वर्ग, विचार अपना वजूद रखते हैं| उसकी आधी आबादी, जो महिलाओं से बनती है और भी कई वर्गों और आकार-प्रकार में बटी हुई है| कुछ स्त्रियाँ पूरी स्वतंत्रता को हासिल कर चुकी हैं| कुछ अधिकार को पाने की छटपटाहट में संघर्षरत हैं और एक बड़ी संख्या में औरतें आज भी भेंड़ों के बाड़े में ठुंसी-फंसी, सामूहिक रूप से शोषण का शिकार होकर, अपना दिशा-ज्ञान हासिल नहीं कर पाई हैं| अपनी पहचान खोकर वह भेंडचाल में अपनी सुरक्षा और शांति देखती हैं| क्योंकि उनको भ्रम है कि ‘हठ कर चलें हैं, राहे कारवां से हम’ में वह बेमौत मारी जाएंगी क्योंकि यह पितृसत्तात्मक समाज है जहाँ वह औरतें भी जो उम्र की शक्ति हासिल कर लेती हैं, रिश्तों के नामपर मर्दों की भाषा बोलने लगती हैं| क्योंकि सत्ताधारी वर्ग के भी अपने कायदे-कानून और दबाव होते हैं| एक सत्ताधारी दूसरे सत्ताधारी की तानाशाही का सम्मान नहीं करेगा तो अपना दबदबा कैसे बनाए रहेगा?

आज का दौर लड़कियों को सिर्फ ससुराल जाने के लिए तैयार करने का नहीं रह गया है बल्कि संग्राम में बिना घायल हुए अपने अस्तित्व को जमाए रखने का है, जिस रणक्षेत्र का विस्तार उनकी शिक्षा, कार्यस्थान, विवाहित जीवन, अकेले रहना, विधवा होने पर सब कुछ संभालना और अपने अंदर की दुनिया को सुंदर और खुशहाल बनाने तक फैला हुआ है| ऐसी स्थिति में बेजा सेंसर उनकी जबान और जज्बात पर लगाना ठीक नहीं है| बल्कि उनकी भाषा और संवेदना को अभिव्यक्त करने का अवसर देकर उसको सुंदर आकार देना और उनके व्यक्तित्व में आत्मविश्वास भरना है ताकि वह सही दिशा में, सही समय में, सही जगह पर अपने अहसास को जबान तक लाने में न झिझकें, न डरें, बल्कि उसको अपने मौलिक अधिकार को पाने के लिए इस्तेमाल करें और एक मानवीय हालात को जन्म दे सकें ताकि सदियों से चली आ रही इस रोक-टोक को जंजीर को तोड़ा जा सके जो गैर-ज़रूरी तरीके से औरत की जबान और जज्बात को बांधे हुए है|


संदर्भ – औरत के लिए औरत; नासिरा शर्मा

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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