नारीवाद मेरा फेमिनिस्ट जॉय: रूढ़ियों से टकराकर खुद को पाने तक का सफर 

मेरा फेमिनिस्ट जॉय: रूढ़ियों से टकराकर खुद को पाने तक का सफर 

रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ते हुए मैं अपने परिवार की वो पहली लड़की हूं, जो अपनी मन पसंद और उच्च शिक्षा प्राप्त करने अपने घर और राज्य से बाहर जा पाई। आज मुझे जितनी खुशी अपने मनचाहा कोर्स चुनने की नहीं होती, उतनी ये सोच के होती है कि मैंने अपने लिए स्टैंड लिया और पितृसत्ता को चुनौती देते हुए मैने अपनी ये लड़ाई जीती। 

मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले, बलिया के ग्रामीण क्षेत्र से आती हूं, जहां आज भी बाल विवाह जैसी प्रथाएं हैं। आज भी लड़कियों को मुश्किल से बस प्राथमिक शिक्षा ही दी जाती है, उनको ये बताया जाता है कि वो चाहे कितना भी पढ़ लिख ले, रसोई घर से उनका रिश्ता हमेशा ही रहेगा। इतने रूढ़िवादी समाज से आने के बावजूद मैंने अपने हक की लड़ाई लड़ी। इसके साथ ही पुरानी सभी रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ते हुए, अपने परिवार की मैं वो पहली लड़की हूं, जो अपनी मन पसंद और उच्च शिक्षा प्राप्त करने अपने घर और राज्य से बाहर जा पाई। आज मुझे अपने मनपसंद कोर्स चुनने की खुशी से भी ज़्यादा इस बात की खुशी है कि मैंने अपने लिए आवाज़ उठाई, पितृसत्ता को चुनौती दी और अपनी यह लड़ाई जीती। 

मैंने ना कहना सीखा, खुद से प्यार करना सिखा और अपने आस -पास की लड़कियों के लिए एक उदाहरण बनी। शुरू में ये सब नामुमकिन सा लगा पर मुझे खुद के लिए वैसी जिंदगी नहीं चाहिए थी, जैसा बाकी सब लड़कियों को मिलता आ रहा है। आज मैं अपने इस फैसले से बहुत खुश हूं, कि अपने आस पास के लोगो की विचारधारा में परिवर्तन लाने में मेरा भी कुछ योगदान रहा। अब जब गाँव जाती हूं, तो अपने गांव के दोस्तों को बताती हूं कि अपने लिए स्टैंड लेना कितना ज़रूरी है। मुझे बहुत खुशी होती है, जब वो अपनी परेशानियां मुझे बताती हैं और मैं  उनको समझाती हूं।

रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ते हुए, अपने परिवार की मैं वो पहली लड़की हूं, जो अपनी मन पसंद और उच्च शिक्षा प्राप्त करने अपने घर और राज्य से बाहर जा पाई। आज मुझे अपने मनपसंद कोर्स चुनने की खुशी से भी ज़्यादा इस बात की खुशी है कि मैंने अपने लिए आवाज़ उठाई, पितृसत्ता को चुनौती दी और अपनी यह लड़ाई जीती। 

महिलाओं के साथ से बदली मेरी दुनिया

हालांकि इतना आसान नहीं होता, बरसों से चली आ रही रूढ़वादी मानसिकता को बदलना। मेरे लिए तो और भी ज्यादा कठिन था, क्योंकि मैं ज्वाइंट फैमिली से हूं। मेरे घर में कोई भी निर्णय लेने से पहले, घर के सारे पुरुषों से अनुमति लेनी पड़ती है। आज भी परिवार के कुछ लोग मेरे इस फैसले से नाराज़ हैं और मुझसे बात नहीं करते लेकिन मैं फिर भी खुश हूं। हम शुरू से सुनते आ रहे हैं कि एक महिला ही दूसरी महिला की दुश्मन होती है। मैं इस वाक्य में बदलाव करना चाहूंगी, क्योंकि एक महिला दूसरी महिला की दुश्मन नहीं, बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त होती है, जो उसकी भावनाओं को बहुत अच्छे से समझती है। 

जहां घर के सभी लोग; खासतौर पर पुरुष मेरे फैसले के खिलाफ थे, वहीं घर की महिलाएं जैसे माँ, बड़ी माँ, चाची और मेरी बहनों ने मुझे समझा। मेरा साथ दिया और मेरी लड़ाई में मेरे साथ खड़ी रहीं। मुझे मानसिक रूप से भी ठीक रहने में मदद की। उन्होंने आज तक अपने लिए स्टैंड नहीं लिया और घर के पुरुषों के खिलाफ कभी नहीं गई , वो मेरे लिए सबसे लड़ीं। जिंदगी के उतार – चढ़ाव में हमेशा महिलाएं ही मेरे साथ खड़ी रही हैं, चाहे वो मां हो, दोस्त हो या मेरी शिक्षिका हो। सबको लगता है कि फेमिनिस्ट जॉय किसी बड़े आंदोलन या समाज में दिखने वाले उथल-पुथल से ही आता होगा। पर सच बताऊं तो ऐसा बिल्कुल नहीं है, फेमिनिस्ट जॉय तो हमारे रोजमर्रा के छोटे फैसलों और उनसे होने वाले बदलावों से आता है, जो हम बस अपने लिए करते हैं।

मैं एक ज्वाइंट फैमिली से संबंध रखती हूं, मेरे घर में कोई भी निर्णय लेने से पहले, घर के सारे पुरुषों से अनुमति लेनी पड़ती है। आज भी परिवार के कुछ लोग मेरे इस फैसले से नाराज़ हैं और अभी भी वो मुझसे बात नहीं करते हैं, लेकिन फिर भी मैं  खुश हूं।

रूढ़ियों से टकराने की हिम्मत

बरसों से पितृसत्ता हमारे सोचने-समझने के तरीके, और हमारे फैसलों को प्रभावित करती आई है। ऐसे में इतने लंबे समय से चली आ रही रूढ़िवादी विचारधारा के खिलाफ जाना, आवाज उठाना अपने आप में बड़ी हिम्मत का काम है और जब कोई महिला और लड़की ये कदम उठाती है और उसमें सफल होती है, तो जो अहसास और खुशी होती है, वही असली फेमिनिस्ट जॉय है। इसकी शुरुआत तो हमेशा छोटी होती है पर इसका असर दूर तक होता है। खुद को समझने, खुद के लिए खड़े होने और धीरे-धीरे आस-पास की चीजों को बदलने की ये प्रक्रिया से मिलने वाली जो खुशी है, वही है असली फेमिनिस्ट जॉय, ये चिंता किए बिना की लोग क्या कहेंगे। 

शुरुआत में मुझे डर रहता था कि अगर मैंने मना कर दिया तो क्या होगा? घरवालों के खिलाफ जाकर खुद की मर्जी का काम करूं तो क्या होगा, कभी कभी सोचती थी कि, शायद मैं गलत हूं। लेकिन अब मेरा मानना है कि अपने लिए स्टैंड लेना और गलत के खिलाफ आवाज उठाना गलत नहीं होता।आज भी महिलाएं और लड़कियां पुरूषों के निर्णय को मान लेती हैं। वो पुरुषों के खिलाफ नहीं जाना चाहती, जबकि पितृसत्ता को चुनौती देने के लिए सबसे पहला चरण है। रूढ़िवादी विचारों को मानने से इंकार करना। ये समझना कि मेरी चाहत, मेरी सीमाएं और मेरी फीलिंग्स भी मायने रखती हैं।शुरुआत में ना बोलना मुश्किल लगता है। डर, गिल्टी महसूस होता है। पर शुरुआत यहीं से होती है और इसी से हिम्मत आती है और यही हिम्मत, एक अलग ही किस्म की खुशी देती है, जो मैने बहुत अच्छे से महसूस की है।

शुरुआत में मुझे डर रहता था कि अगर मैंने मना कर दिया तो क्या होगा? घरवालों के खिलाफ जाकर खुद की मर्जी का काम करूं तो क्या होगा, कभी कभी सोचती थी कि, शायद मैं गलत हूं। लेकिन अब मेरा मानना है कि अपने लिए स्टैंड लेना और गलत के खिलाफ आवाज उठाना गलत नहीं होता।

खुद से प्यार से लेकर सिस्टरहुड तक का सफर

खुद को वैसे ही स्वीकारना भी एक बहुत बड़ा फेमिनिस्ट जॉय है। हर वक्त हमें बताया जाता है कि हमें कैसा दिखना चाहिए, कैसे पेश आना चाहिए, खासकर हम महिलाओं से परफेक्ट दिखने की उम्मीद सबसे ज्यादा की जाती है। इतनी मोटी क्यों है, इतनी पतली क्यों है, ये सारी बातें कहीं ना कहीं हमें मानसिक रूप से प्रभावित करती हैं। लेकिन जब हम समाज की परवाह किए बिना खुद को जैसे हैं,  वैसे ही पसंद करने लगते हैं, खुद को प्राथमिकता देते हैं, वो खुशी व्यक्त ही नहीं की जा सकती है।बिना डरे हंसना, अपने मन की बात खुलकर कहना, खुद के लिए थोड़ा वक्त निकालना, कहने को तो ये सब छोटी बातें हैं । लेकिन इससे मिलने वाली खुशी बड़ी लगने लगती है। जब हमें पता चलता है की पितृसत्ता की इस लड़ाई में हम अकेले नहीं हैं, बल्कि और भी बहुत सारी महिलाएं और लड़कियां अपने -अपने तरीके से यही जिंदगी जी रही हैं, जब हम अपने जैसी किसी और लड़की से मिलते हैं। 

अपने अनुभव शेयर करते हैं, एक-दूसरे की बात समझते हैं, तो सिस्टरहुड की भावना का निर्माण होता है। ये जुड़ाव  फेमिनिस्ट जॉय को और मजबूती देता है और दोगुना करता है। फिर, हमारी खुशियां अकेली नहीं रह जातीं बल्कि सामूहिक हो जाती हैं।फेमिनिस्ट जॉय एक लंबी यात्रा का नाम है। छोटे-छोटे कदमों से शुरू होकर, धीरे-धीरे बड़ा बदलाव लाने तक की यात्रा । ये खुशी बड़े आंदोलनों से ना मिलकर हमारी रोज़मर्रा की छोटी छोटी चीजों से और फैसलों से हमें मिलती है और ये समाज को नया चेहरा देने की ताकत रखती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है, खुद के अस्तित्व को स्वीकारना, खुद को प्राथमिकता देना, कई सालों से चले आ रहे  रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक विचारों को चुनौती देना, और खुद को स्वीकारना।आज जो मै जिंदगी जी रही हूं, अपनी पसंद की पढ़ाई कर रही हूं, ये शायद कभी मुमकिन नहीं हो पाता अगर मैं खुद को प्राथमिकता ना देती तो और फिर मुझे कभी फेमिनिस्ट जॉय का एहसाह भी नहीं होता।

Comments:

  1. ANIL says:

    Well said miss jyoti shukla

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