पीरियड का चिट्ठा ‘कुछ आप बीती कुछ जग बीती’

1
1247
पीरियड का चिट्ठा 'कुछ आप बीती कुछ जग बीती'
पीरियड का चिट्ठा 'कुछ आप बीती कुछ जग बीती'

इना गोयल

मेरी किशोरावस्था के दिनों में माहवारी के दौरान, मेरी नानी ने कभी मुझे रसोईघर में नहीं जाने दिया। माहवारी के तीसरे दिन वह मेरे बाल बहुत ही धार्मिक रूप से धोया करती थीं। इसके बारे में उनका कहना था कि इससे सिर से लेकर पांव तक मेरे शरीर की सारी अपवित्रता धुल जाएगी। मैं बड़ी हुई। और अक्सर यह सोचा करती थी कि माहवारी के दौरान औरतों के साथ होने वाले इस भेदभाव में बदलाव के लिए मुझे कुछ करना चाहिए।

समय-समय पर माँ की सीख

आगे चलकर, जब मैं भारत में युवा लड़कियों को ‘यौन शिक्षा’ देने का काम कर रही थी, उस दौरान कार्यशाला में मौजूद बहुत सारी लड़कियां मुझे यह बताती थीं कि उनका विवाह बचपन में ही कर दिया गया है, अभी वह अपने ‘गौने’ का इंतज़ार कर रही हैं। गौना दरअसल उत्तर भारत की वह रस्म है जिसमें वर विवाह के बाद वधु को पहली बार उसके ससुराल ले जाता है, या कहें कि वधु अपने निर्धारित पति के घर जाती है। परिवार यह तय करता है कि लड़की शारीरिक रूप से तैयार हुई है या नहीं। इसके सामानांतर ही, अगर इस दौरान लड़की को माहवारी शुरू हो जाती थी तो यह मान लिया जाता है कि लड़की अब सम्भोग के लिए तैयार है। इस परम्परागत रस्म में केन्द्रिकृत पुनरुत्त्पादन और पुरुष श्रेष्ठता दो रेखांकित किये जाने लायक तथ्य हैं। यह रस्म अपने मौजूदा रुप में दरअसल लड़की के परिवार को वह समय भी देता है जिसमें वह लड़की ‘देते’ समय उसके दहेज़ के लिए पर्याप्त सामान इकठ्ठा कर लें। अपने समकालीन रूप में ‘गौना’ (बेटी का हस्तांतरण) अब कहीं-कहीं उत्तर-भारत में अधिकार आधारित दृष्टिकोण के साथ ही थोडा बहुत लड़की की इच्छा के लिए उन्हें कुछ हद तक पढ़ाई करने की छूट दे दी जाती है| कार्यशाला में बहुत सारी लड़कियों ने यह बताया कि उनकी माएं उन्हें समय-समय पर यह बात बताती रहतीं हैं कि वो ये बात किसी को न बताएं कि उनकी माहवारी शुरू हो गई है। लड़कियों को अक्सर उनकी माओं और बड़ी बहनों ने इस तथ्य को छुपाकर रखने के लिए कहा जाना दरअसल समाज में पितृसत्ता की वह ‘शैतानी नज़र’ से स्वयं को बचाना है जिसमें वह रह रहीं हैं।

कार्यशाला में जो लड़कियां आती थीं उनकी उम्र 12-18 साल के बीच हुआ करती थी, जो या तो अपने आस-पास के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई करती थीं या पढाई छोड़ चुकीं थीं। यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है कि एक लड़की के जीवन में मासिक धर्म की शुरुआत इसी उम्र में होती हो। जैसे हो सकता है कि जिस विषय की शिक्षा वह ले रही हैं, उस शिक्षण और प्रशिक्षण के लिए बहुत देर हो चुकी हो। अक्सर लड़कियां बातचीत में इस बात को स्वीकार करतीं हैं कि उनके मासिकधर्म के शुरुआत की सही और सामान्य उम्र 12-15 साल के बीच की है जो कि उनकी पाठ्य-पुस्तकों में लिखा भी हुआ है। फिर वह अपने कुछ उन दोस्तों के बारे में बताती हैं जिनके मासिकधर्म की शुरुआत चौथी कक्षा में ही हो गई थी, यह करीब नौ से ग्यारह साल के बीच रही होगी।

माएं उन्हें समय-समय पर यह बात बताती रहतीं हैं कि वो ये बात किसी को न बताएं कि उनकी माहवारी शुरू हो गई है।

और बात करने से कतराने लगी लड़कियां

एक समय हमारे पास इस तरह की कार्यशालाओं का कोई विकल्प मौजूद नहीं था, इसलिए शुरूआती दौर में ये कार्यशालाएं मंगोलपुरी में आयोजित की गईं। यह तब तक चला जब तक ट्रस्ट ने क्षेत्रीय गुरुद्वारा से संपर्क कर उसके परिसर में कार्यशाला के लिए एक बड़ा कमरा थोड़े किराये पर नहीं ले लिया। जो जगह हमें दी गई वह एक बड़े बरामदे का एक कोना था जहाँ सभी के आ सकने भर को पर्याप्त जगह थी। फिलहाल चीजें मेरे और लडकियों के लिए थोड़ी बेहतर हुईं और हम सामानांतर एक से अधिक कार्यशालाएं उस बरामदे में चलाने लगे। कभी-कभी यह कार्यशाला अर्ध-आयु की महिलाओं या उन लडकियों की माओं के साथ भी होती थी, जो कार्यशाला में हिस्सा ले रहीं होती थीं, जहाँ उन्हें सुरक्षित प्रसव का प्रशिक्षण ए एन एम के ज़रिए दिया जाता था। बाक़ी समयों में यह कार्यशाला उनकी उन समकालीन महिलाओं के साथ होती थी जो थियेटर कार्यशाला और पर्यावरण संरक्षण कार्यशाला का हिस्सा थीं।

और पढ़ें : पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

इसी बीच एक रोचक घटना यह घटी कि गुरुद्वारे के बाहर के बरामदे में ट्रस्ट ने किशोरों के लिए एक किशोरावस्था संबंधी कार्यशाला का आयोजन शुरू कर दिया। इस परिस्थिति से लड़कियां अपने शरीर के बारे में खुलकर बात करने से कतराने लगीं, उन्हें यह डर लगने लगा कि कहीं उनकी बात कोई बाहर सुन न लें। मेरी कार्यशाला की बहुत सारी लड़कियां अपने शरीर के बारे में खुलकर बात करने को लेकर असामान्य हो गईं ।

एक से दूसरे तक पहुंचती बात

लड़कियां स्वतंत्र रूप से बात करने में यहाँ तक डरतीं थीं कि कहीं उनकी माँ उनकी बातें सुन ना लें। सहेलियों और सहपाठियों का दबाव भी एक वजह थी जो उन्हें असहज कर देती थी। क्योंकि, उन्हें उनके स्कूल में उनके सहपाठियों का इस तरह की शिक्षा लेने पर उन्हें छेड़ा जाता था। लेकिन वहीँ दूसरी तरफ से यह फायदेमंद भी हुआ करता था क्योंकि जो सहपाठिन इस तरह की किसी कार्यशाला के बारे में जब सुनती थीं और उनके पास इस तरह की समस्याओं के लिए सूचना का कोई श्रोत नहीं होता था तो वह कार्यशाला जाने वाली लड़कियों से कार्यशाला में मिली जानकारियों को उन्हें भी बताने को कहतीं थी ।

लड़कियां बताती दकियानूसी बातें

ये लड़कियां उन रिवाजों के बारे में भी बतातीं थीं जो माहवारी के दौरान उनके घरों में मान्य होती थी। उसमें से कुछ को एक हफ्ते तक क्लास टेस्ट और होमवर्क के दबाव के बावजूद स्कूल नहीं जाने दिया जाता था। उन्हें अलग बर्तन में खाना दिया जाता था, उन बर्तनों को घर के अन्य बर्तनों के साथ नहीं मिलाया जाता था और उन्हें अलग से धुला जाता था। यहाँ तक कि उन्हें उनके अपने बिस्तर पर सोने भी नहीं दिया जाता था, उन्हें अलग चादर या चटाई सोने को दिया जाता था। कई बार उन्हें यह हिदायत दी जाती थी कि इस दौरान वह घर के किसी पुरुष सदस्य से आँखें न मिलाएं खासतौर पर पिता और भाई से, इस भय से कि वह कहीं गर्भवती न हो जाएँ।

लड़कियां अपने शरीर के बारे में खुलकर बात करने से कतराने लगीं, उन्हें यह डर लगने लगा कि कहीं उनकी बात कोई बाहर सुन न लें।

इस प्रकार लड़कियों के दिमाग में माहवारी के दौरान उनके शरीर के प्रति एक नकारात्मक छवि बनती जाती है। माहवारी का शरीर प्रदूषित और अपवित्र होता है यह बात एक तथ्य की तरह लड़कियों के दिमाग में बैठाकर उन्हें इसका आदी बना दिया गया है। उन्हें यह भी कहा जाता था कि माहवारी के दौरान मंदिर में प्रवेश और पूजा न करें। यह उन लड़कियों के लिए बहुत त्रासदपूर्ण था जो माहवारी के दौरान मंदिर के भीतर कार्यशाला में हिस्सा ले रहीं थीं ।

यहाँ तक कि इस दौरान उन्हें क्या खाना है और क्या नहीं खाना है इसे बहुत सख्ती से लागू किया जाता था। यहाँ एक बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि कुपोषण के कारण ही किशोर लड़कियों को होने वाला एनीमिया भारत में बहुत ज्यादा है । माहवारी में खून ज्यादा गिर जाने की वजह से पैदा हुई कमजोरी को दूर करने के लिए उन्हें उचित मात्रा में पोषक तत्वों की जरुरत होती है जो नहीं मिलने पर खराब स्वास्थ्य का कारण बनती है ।

मुझे इस बात पर बहुत ही आश्चर्य होता है कि क्यों महिलाओं के लिए आनंद का प्रश्न अनसुना कर दिया जाता है? कई सारी लड़कियां ऐसी होती हैं जिन्होंने कंडोम कभी देखा ही नहीं होता है और उन्हें इस बात का भरोसा ही नहीं होता है कि यह क्या कर सकता है। सम्भोग करने का मतलब होता है बच्चा पैदा करना। अभी भी मैं लड़कियों पर उत्पीड़न की इस विरासत को यादकर असंतुलित हो जाती हूँ। माहवारी के बारे में अपने ही लैंगिक समूह में बात करती हूँ जब मुझे माहवारी हो रही है इसे मैं चिल्लाकर कहती हूँ बिना किसी हिचकिचाहट और शर्म के। इसके लिए बिना किसी नकारात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हुए। मैं श्रावित हो रही हूँ और मुझे इसपर गर्व है ।


ये लेख इना गोयल ने लिखा है| इना यूनिवर्सिटी कालेज लंदन के जेंडर एंड सेक्सुअलिटी स्टडीज विभाग में पीएचडी कर रही हैं। इसके पहले उन्होंने जेएनयू (नई दिल्ली) से सोशल मेडिसीन एंड कम्युनिटी हेल्थ में एम फिल और दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ़ सोशल वर्क की पढ़ाई की है|

1 COMMENT

Leave a Reply