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बस्ती की तंग गलियों में मेरा बचपन बीता था। वहां सभी लोग एक ही जाति के थे और आर्थिक हालात भी एक जैसे थे। सभी का एक दूसरे के घर आना-जाना रहता था और सभी एक दूसरे की खुशी-गम में शामिल होते थे। शायद इसलिए सभी एक जैसे लगते थे और कभी हममे हीनता जैसी कोई भावना नहीं आती थी। जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया तो पहली बार मुझे अहसास हुआ कि मैं कुछ अलग हूँ, इसलिए कुछ बच्चे मेरे साथ खेलना नहीं चाहते थे और ना ही मेरे साथ खाना खाना चाहते थे।

मुझे आज भी याद है कि जब मैंने मेरे साथ पढ़ने वाले एक लड़के से पूछा कि ‘तुम मेरे साथ क्यों नही खेलना चाहते?’ तो उसने बोला कि मेरे मम्मी-पापा मना करते है। मैंने पूछा आपके मम्मी -पापा क्यों मना करते है तो वो जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए बोला क्योंकि तुम इस जाति से हो। पहली बार मुझे समझ आया कि कहीं ना कहीं मेरी जाति की वजह से कुछ लोग दूर भागते है। उनके चेहरे पर मेरी जाति को लेकर हीन भावना है जो साफ-साफ़ नजर आती थी। इसके बाद से मानो ऐसे अनुभव मेरी जिंदगी के अनुभव बनते गये| फिर भी मेरे मन में एक आशा रहती थी कि बड़ी कक्षा में ऐसे नहीं होगा क्योंकि बड़ी कक्षा में तो हम सभी समझदार हो जाएंगे।

टीचर्स को था अपने धर्म भ्रष्ट होने का डर

वो दिन भी आ गया जब मैं स्कूल की बड़ी क्लास में पढ़ने गया। लेकिन जल्द ही मेरी सारी गलतफहमी दूर होने लगी थी और जाति-व्यवस्था की खाई और गहरी दिखाई देने लगी थी। बस अबकी बार मेरे साथ पढ़ने वाले स्टूडेंट के साथ मेरे टीचर्स भी उन अनुभवों में जुड़ते चले गए। ऐसे अनोखे अनुभव ने मुझे फिर से सोचने के लिए मजबूर किया कि कैसे मेरे पढ़े-लिखे टीचर्स भी जातीय संकीर्णता के शिकार हो सकते है?

मेरे टीचर्स बहुत साफ-सुथरे तरीके से भेदभाव करते थे। मेरे टीचर्स कभी भी मेरे जैसे यानी मेरी जाति से सबन्ध रखने वाले किसी भी स्टूडेन्ट से खाने-पीने की चीजें नही मंगवाते थे, क्योंकि उनकी खाने-पीने की चीजों को छूने से उन्हें अपना धर्म भ्रष्ट होने का डर रहता था। वो सिर्फ हमको ऐसे काम बताते थे जो साफ-सफाई से जुड़े थे। इतना ही नहीं, वे हमें किसी भी धार्मिक किताब को भी हाथ लगाने की अनुमति नहीं देते थे। बड़ी कक्षा में जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल गालियों में सुनना बहुत आम हो गया था और अब मेरे कानों को इसकी आदत भी पड़ने लगी थी।

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मेरे टीचर्स बहुत साफ-सुथरे तरीके से भेदभाव करते थे।

यूनिवर्सिटी में मिला जाति के नामपर कड़वा अनुभव

स्कूल के अनुभवों को साथ लिए अब मैं यूनिवर्सिटी में आ गया था। अनुभवों के गुच्छों ने मुझे जातिय नफरतों से छिपना सिखा दिया था। अब मैं सिर्फ उन्हें ही अपना दोस्त बनाता था जो मेरे जैसे थे ताकि हीनता की भावना से बाहर आ सकूं। लेकिन बहुत-सी बातें हमारे हाथों में नहीं होती है। यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के दौरान मेरा एक दोस्त ऐसा बना जो मेरे जैसा नहीं था| वो तथाकथित ऊंची कहे जाने वाली जातियों से सम्बद्ध रखता था। बहुत बार ऐसा होता था कि उसके दोस्त मेरे सामने जाति सूचक गालियों का प्रयोग करते थे जो मुझे असहज कर जाते थे। लेकिन मैं चुप रहता था क्योंकि मैंने भी मान लिया था कि ऐसा तो होगा ही।

एक बार मेरे दोस्त के साथ मेरा झगड़ा हो गया और झगड़ते हुऐ मेरे दोस्त ने मुझसे कहा ‘तेरी जात के लोग चप्पल उतार के हमारी गली से निकलते है|’ उसके इन शब्दों ने मुझे बहुत बुरी तरह से तोड़ दिया उस वक़्त मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा आत्मविश्वास ही खत्म हो गया हो। यूनिवर्सिटी के दौरान जब कोई मुझसे पूछता था कि क्या तुम जाति में विश्वास रखते हो तो मेरे पास उसका जवाब नहीं होता था। इसकी एक वजह यह भी थी कि अगर मैं ‘ना’ बोलता था तो ये सुनने को मिलता था अपनी जाति छुपाने के लिए ऐसा बोल रहा है। अगर मैंने ‘हाँ’ बोला तो सुनने को मिलता कि जात-पात में विश्वास करता है। दोंनो सूरतों में हार तो मेरी ही होती थी।

स्कूल से यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी से जॉब ऐसे कटु अनुभवों का सिलसिला यूँ ही चलता रहा। बस फर्क इतना था कि लोगों के जातीय घृणा के रूप बदलते चले गए। एक बार मेरी बॉस ने मुझसे तथाकथित ऊंची जाति का नाम लेकर पूछा कि क्या तुम उसे जाति से हो। मैंने मना करते हु अपनी जाति के बारे में बताया तो मेरी बॉस के चेहरे पर सन्नटा-सा छा गया। शायद उसको इतना सदमा लगा कि वो अपने चेहरे के भावों को भी नहीं छुपा पाई। उस दिन के बाद उसका व्यवहार ऐसे बदल गया जैसे मैं कोई जन्मजात अपराधी हूँ। आर्थिक हालात खराब होते हुए भी मुझे जॉब छोड़ने का फैसला लेना ही पड़ा।

किराये के लिए मकान की तलाश में किसी घर जाते तो उनका पहला वाक्य ये होता था पण्डित हो क्या या फिर कोई और उच्च जाति।

बहुत से ऐसे लोग भी मिले जो मुझसे कहते थे कि वो जातिय-भेदभाव के खिलाफ है लेकिन वही लोग मुझसे मेरा गौत्र पूछते थे। मैंने जातिय-भेदभाव के तरीके कुछ इस तरह से बदलते देखा कि कोई नहीं कह सकता कि कोई जातिय संकीर्णता से ग्रसित है। जब किराये के लिए मकान की तलाश में किसी घर जाते तो उनका पहला वाक्य ये होता था पण्डित हो क्या या फिर कोई और उच्च जाति। जैसे ही मेरी जाति से उसकी पहचान होती थी वो मकान देने से इन्कार कर देते थे।

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एक ऐसी जगह जहाँ कोई मेरी ‘जाति’ नहीं पूछता

मेरी जिंदगी एक दिन वो भी आया जब मेरे अनुभवों को थोड़ा विराम मिला। मुझे ब्रेकथ्रू नाम की एक मानव अधिकार संस्था में काम मिला। ये संस्था महिलाओं और लड़कियों के प्रति हो रही हिंसा के खिलाफ काम करती है। शुरू-शरू में मेरे मन यही ख्याल चलता रहता था कि जब ब्रेकथ्रू से कोई मेरी जाति के बारे में पूछेगा तो क्या होगा। जब भी मेरे साथ काम मेरे सहकर्मी बात करते थे तो लगता था कि अब जाति के बारे में पूछेंगे। दिन महीनों में बदले महीने सालों में बदल गए लेकिन जाति का सवाल ओर मेरे कटु अनुभव ब्रेकथ्रू में कभी अनुभव नहीं किये। मुझे मेरी जाति से नहीं मेरे काम से पहचान मिली। मुझे ब्रेकथ्रू में पांच साल से ज्यादा हो गए लेकिन किसी को मेरी जाति से कोई मतलब नहीं है।

अच्छे और बुरे लोग तो हर धर्म और जाति में होते है| फिर क्यों किसी एक जाति या धर्म के प्रति हम इतनी नफरत रखते है। और ये नफरत कब हिंसा में बदल जाती है पता ही नहीं चलता। आज भी जात-पात के नाम पर बहुत हिंसा हो रही है और इस हिंसा में लोगों की जान भी चली जाती है। आज भी मेरे मन में ऐसी दुनिया का सपना है जहां हर किसी को न्याय, सम्मान और समानता मिले। जातिवाद नफ़रतों को छोड़कर हम सम्मान की बात करें, जहां किसी की जाति उसकी परछाई ना हो और न जाति से किसी की पहचान हो।

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Roki is a feminist, trainer and blogger. His focus areas have been gender equality, masculinity, POSH Act and caste.

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