पदमावत फिल्म के विरोधी बलात्कार पर चुप क्यों रहते हैं?

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पदमावत फिल्म के विरोधी बलात्कार पर चुप क्यों रहते हैं?
पदमावत फिल्म के विरोधी बलात्कार पर चुप क्यों रहते हैं?

फ़िल्म पदमावत को लेकर चल रहा विवाद रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। देश के बहुत से हिस्सों में फ़िल्म को रिलीज ही नहीं होने दिया जा रहा है। इस विवादित फ़िल्म के खिलाफ बहुत से शहरों में रोष-प्रदर्शन किया जा रहा है। इस माहौल को देखते हुए बहुत से सिनेमाघरों के मालिकों ने फ़िल्म लगाने से ही मना कर दिया। अगर हरियाणा की बात करें तो गुरुग्राम में प्रदर्शनकारियों ने स्कूल बस पर हमला बोल दिया जिसके अंदर मासूम स्कूली बच्चे और टीचर थे।

हरियाणा के कई शहरों में इस फ़िल्म का इतना विरोध हुआ कि उन शहरों में फ़िल्म को ही बैन कर दिया गया। फ़िल्म के विरोध के लिए हरियाणा राज्य में भी दूसरे राज्यों की तरह हिंसा का रास्ता अपनाया गया। एक फ़िल्म से मेरे हरियाणावासियों का खून इतना खौल रहा है कि वो किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो गए है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी बात या व्यवहार से किसी समुदाय या व्यक्ति की भावनाएं आहत हो सकती है। लेकिन अब सवाल ये है कि क्या विरोध  करने के लिए हिंसा ही रास्ता है? क्यों हम अहिंसात्मक तरीके से अपना विरोध जाहिर नहीं कर सकते? हर बात पर सड़कों पर उतरकर तोड़फोड़ और आग लगा देना ही क्यों जरूरी है ?

सिर्फ इतिहास के लिए सड़कों पर उतरकर बच्चों से भरी बस को तोड़फोड़ का शिकार बनाना आखिर किस तरह की मर्दानगी, इतिहासभक्ति या देशभक्ति को दिखाता है?

गौरतलब है कि हाल ही में हरियाणा के अलग-अलग जिलों में गैंगरेप और उसके बाद क्रूरतम हत्या के एक के बाद एक मामले सामने आ रहे हैं| इन सभी घटनाओं में ज्यादातर केस ऐसे हैं जिनमें 18 साल से कम बच्चियों को वहशी मर्दों की हवस का शिकार होना पड़ा। गैंगरेप के बाद हत्या करना, फिर उनकी लाश के साथ रेप करना और फिर उनके प्राइवेट पार्ट में किसी चीज़ को डाल देना| दरिंदगी की ये सारी हरकतें अब मानो आम सी बात हो गई है । लेकिन पता नहीं क्यों ऐसी घटनाओं पर लोगों की भावनाएं आहत नहीं होती है।

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कुछ मुठ्ठी भर लोगों और संस्थाओ को छोड़कर किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया। आश्चर्यजनक बात यह है कि इतने अमानवीय घटनाओं के चक्रव्यूह से हरियाणावासियों और देशवासियों की भावनाओं को आंच तक नहीं आई। सिर्फ इतिहास के लिए सड़कों पर उतरकर बच्चों से भरी बस को तोड़फोड़ का शिकार बनाना आखिर किस तरह की मर्दानगी, इतिहासभक्ति या देशभक्ति को दिखाता है?  फ़िल्मी दुनिया से इतर असल जीवन में जो हो रहा है उसके लिए क्यों किसी की भावनाओं पर असर नहीं पड़ता है? ऐसे बहुत से सवाल है जो मुझे बार-बार सोचने पर मजबूर करते है कि हम किस समाज और कैसी संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ युवा बिना सोचे-समझे हिंसा पर उतारू हो रहे हैं।

हमारा युवा वर्ग सही मुद्दों से भटकर बेतुकी बातों के लिए हिंसा का रास्ता इख्तियार कर रहा है।

एक तरफ से विश्वस्तर पर सतत विकास के लक्ष्यों में लैंगिक समानता पर जोर दिया जा रहा हैं| वहीं दूसरी तरफ, तीन साल की बच्चियों के साथ गैंगरेप जैसे  अपराध रोजमर्रा की बात हो गई है। उससे भी शर्म की बात यह है कि इन अमानवीय घटनाओं पर किसी के पास रोष प्रदर्शन करने का भी समय नही है । ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि लोगो को लगता है कि यह घटना उनसे जुड़ी हुई नहीं है। लेकिन सामज में जिसतरह रेप कल्चर की आग लगी है, उसमें अपना-अपना घर बचाना बहुत मुश्किल है। फिल्मों का विरोध करने वाले रेप कल्चर पर क्यों चुप्पी साधे हुए है? आज लोक गीतों और फिल्मों में यौनिक हिंसा को मनोरंजन के जरूरी तत्व के तौर पर परोसा जाता है। फिल्मों और गानों में महिलाओं को एक वस्तु की तरह पेश किया जाता है। फिर भी ऐसे गानों का विरोध करने के लिए कोई सड़कों पर नहीं उतरता, बल्कि  इसके विपरीत हम उनका लुफ्त उठाते है।

पदमावत फिल्म पर युवा-वर्ग का विरोध और लगातार बढ़ती बलात्कार की घटनाओं पर इनकी चुप्पी इस बात को दिखाती है कि युवा सही मुद्दों से भटकर बेतुकी बातों के लिए हिंसा का रास्ता इख्तियार कर रहे है।  हिंसात्मक अपराध तो जैसे युवाओं के लिए खेल-मजाक की बात हो गई है, लेकिन हमें समझना होगा कि आखिर इस तरह के प्रदर्शन और अपने मुद्दों पर चुप्पी साधकर हम किसका नुक्सान कर रहे हैं? वास्तविकता ये है कि अगर हमारे देश का युवा वर्ग सही मुद्दों के लिए चुप्पी तोड़कर अपनी आवाज़ उठाए तो हम रेप कल्चर जैसी तमाम समस्याओं को न केवल रोक सकते हैं बल्कि जड़ से खत्म कर सकते हैं।

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