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मर्दानगी, सेक्स, जेंडर, नारीवाद, यौनिकता, विकलांगता और मानसिक स्वास्थ्य ये सभी ऐसे शब्द हैं जिनका इस्तेमाल मौजूदा समय में तेज़ी से किया जाता है| कभी समर्थन में तो कभी विरोध में| कभी सरकारी योजनाओं में तो कभी वोट बैंक बनाने में| लेकिन जब बात इन शब्दों को मुद्दा समझकर जमीनी सरोकार से जोड़ने की होतो ये सभी सिर्फ शब्द नहीं रह जाते बल्कि अपने आपमें अलग लेकिन आपस में जुड़े ज़रूरी विषय बन जाते है, जिसके लिए ज़रूरी है इन मुद्दों पर मज़बूत समझ जो सिद्धांतों के साथ-साथ व्यवहार और अनुभव पर केंद्रित हो|

बीते दिनों (19 फरवरी से 24 फरवरी तक) दिल्ली की संस्था क्रिया की तरफ से ‘यौनिकता, जेंडर और अधिकार : एक अध्ययन’ नाम से प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया| इस प्रशिक्षण में देश के पच्चीस अलग-अलग राज्यों से आयी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया, जो अलग-अलग मुद्दे पर लगातार काम कर रही हैं और पितृसत्ता के वर्चस्व को खुलेतौर पर चुनौती दे रही हैं|

उल्लेखनीय है कि क्रिया एक नारीवादी मानव अधिकार संस्था है| यह एक अंतर्राष्ट्रीय महिला अधिकार संस्था है जो समुदाय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम करती है| मानव अधिकार आंदोलनों और समूह के कई भागीदारों के साथ मिलकर क्रिया महिलाओं और किशोरियों के अधिकार को आगे बढ़ाने और सभी लोगों के यौनिक और प्रजनन स्वतन्त्रता पर काम करती है| इसी तर्ज पर, क्रिया की तरफ से यौनिकता जैसे जटिल विषय पर कार्यकर्ताओं की समझ बढ़ाने के लिए इस प्रशिक्षण का आयोजन किया गया| इस प्रशिक्षण के दौरान लेख अध्ययन, फिल्म-प्रदर्शन, ग्रुप एक्टिविटी और चर्चा-परिचर्चा के माध्यम से यौनिकता से जुड़े कई ज़रूरी कहे-अनकहे पहलुओं को उजागर किया गया|

‘यौनिकता, जेंडर और अधिकार’ पर एक प्रभावी क्रिया | Feminism In Indiaसेक्स की बात

प्रशिक्षण के दौरान चयनिका शाह (क्वीयर नारीवादी एक्टिविस्ट) और प्रमदा मेनन (क्रिया की सहसंस्थापिका व क्वीयर नारीवादी एक्टिविस्ट) ने राष्ट्र और समाज के सन्दर्भ में ‘सेक्स या संभोग’ की मौजूदा संकीर्ण परिभाषा और लगातार इससे पनपती समस्याओं के बारे में जानकारी दी| प्रशिक्षण के दौरान चयनिका ने कहा कि समाज में सेक्स के सन्दर्भ में भावनाओं और तत्वों (आदर्शवादी सिद्धांतों) पर तो बात होती है लेकिन यौन संबंध कैसे बनाना है? इस पहलू पर आमतौर पर बात नहीं की जाती है, जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर समाज में बाइनरी सिस्टम लागू करने में मदद करती है|

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इस प्रशिक्षण में हमारे जीवन से  लेकर समाज के ढ़ेरों अनछुए-अनदेखें पहलुओं पर एक मज़बूत समझ बनाने का काम किया गया|

सेक्सवर्क की सच्चाई और मर्दानगी

सांगली (महाराष्ट्र) से वैम्प संस्था की तरफ से आयी किरण (जो कि एक सेक्सवर्कर होने के साथ-साथ सेक्सवर्करों के अधिकारों के लिए सक्रियता से काम करने वाली कार्यकर्ता भी हैं) ने सेक्सवर्क से जुड़े ऐसे अनछुए पहलुओं को साझा किया जो कभी तथाकथित सभ्य समाज में उजागर नहीं किये जाते हैं| उन्होंने सेक्सवर्करों के साथ होने वाले भेदभाव और दमनकारी व्यवहार को साझा करने के साथ ही सालों संगठित होकर लगातार इनके खिलाफ अपने संघर्ष की गाथा भी साझा की| ताज्जुब की बात ये है कि किरण की लड़ाई सत्ता का तख्ता पलट करने जैसी जटिल प्रक्रिया की बजाय स्वास्थ्य, शिक्षा या यों कहें कि इंसान बनकर जीने के लिए ज़रूरी सेवाओं के लिए है|

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वहीं दूसरी तरफ ध्रुबो ज्योति (दिल्ली स्थित पत्रकार) और मानक मटियानी (नारीवादी क्वीयर एक्टिविस्ट) ने समाज में ‘मर्दानगी’ की परिभाषा, इनके मानक और महत्व को बेहद तार्किक ढ़ंग से साझा किया| ध्रुबो ने जहाँ अपने अनुभव के आधार पर मर्दानगी के साथ जाति, शिक्षा, वर्ग, सोच और व्यवहार के गहरे ताल्लुक को सामने रखा| वहीं मानक ने अलग-अलग वीडियो और एड के माध्यम से मर्दानगी के मानकों पर केंद्रित परिभाषा पर चर्चा की|

प्रशिक्षण के दौरान अपने विचार साझा करतीं प्रतिभागी

जाति के साथ यौनिकता और जेंडर का गहरा संबंध

निरंतर संस्था की दीप्ता भोग ने बताया कि इंसान का अस्तित्व सिर्फ पितृसत्ता या सत्ता से ही नहीं बल्कि जाति, वर्ग, सोच और व्यवहार से भी है| प्रशिक्षण के दौरान दीप्ता ने संसाधन की लूट से पनपी जाति-व्यवस्था को समझाते हुए बताया कि पानी और जमीन की तरह ही औरत को भी संसाधन समझा जाता रहा है, जिसपर समाज का विकास (निरंतरता) टिका होता है| इस आधार पर ये कहना कहीं से भी गलत नहीं है कि औरत का शरीर जाति-व्यवस्था का रास्ता है और पितृसत्ता के बिना जाति-व्यवस्था असंभव है|

विकलांगता पर परिचर्चा करतीं दीपिका श्रीवास्तव

विकलांगता और मानसिक स्वास्थ्य का यौनिकता से क्या ताल्लुक है?

यौन संबंध, अपनी पसंद और यौन सुख की बात हमेशा समाज में सामान्य इंसान (सामाजिक ढांचें में फिट) के संदर्भ में की जाती है| लेकिन हम कभी इस बारे में नहीं सोचते कि विकलांग इंसान की भी अपनी यौनिकता होती है, जिसे हम हमेशा नकार देते है| तारशी संस्था की दीपिका श्रीवास्तव विकलांगता की परिभाषा के सन्दर्भ में कहती हैं कि विकलांगता कई तरह की और कई अवस्था में हो सकती है|

प्रशिक्षण में सेक्स, यौनिकता, जेंडर और जाति जैसे मुद्दों पर परिचर्चा की गयी, जिसपर आमतौर पर हम अपने सामान्य बात तो क्या विचार तक नहीं करते|

प्रशिक्षण के दौरान रत्नाबोली रे

इसका ताल्लुक अक्षमता से है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह की हो सकती हैं| वहीं मानसिक स्वास्थ्य के बारे में समझाते हुए अंजली संस्था की रत्नाबोली रे कहती हैं कि आमतौर पर मानसिक स्वास्थ्य को हम बिमारी के तौर पर निर्धारित और परिभाषित करते हैं, जिसका हवाला देकर अक्सर लोगों की यौनिकता को बेदी पर चढ़ा दिया जाता है| साथ ही रत्नाबोली ने विकलांग आंदोलन के बारे में बताते हुए कहा कि मानसिक तौर पर बिमारी झेल रहे लोगों को समाज में दोहरी मार झेलनी पड़ती है, क्योंकि उन्हें समाज में स्वीकृति नहीं मिलती| वहीं दूसरी तरफ विकलांगता आंदोलन में इन्हें हमेशा निचले खांचे या यों कहें कि हाशिए में रखा जाता है|

कार्यक्रम की ज़रूरी बात

इस प्रशिक्षण में हमारे जीवन से लेकर समाज के ढ़ेरों अनछुए-अनदेखें पहलुओं पर एक मज़बूत समझ बनाने का काम किया गया, जो कि मौजूदा समय में किसी भी सकारात्मक बदलाव के आगाज़ के लिए बेहद ज़रूरी है| एक प्रतिभागी के तौर पर अपने अनुभव के आधार पर कहूँ तो इस पूरे प्रशिक्षण में कई बातें मुझे पसंद आयी जिसमें सबसे ख़ास ये है कि छह दिन के इस पूरे अध्ययन की रुपरेखा कायर्शाला की बजाय स्टूडेंट लाइफ की क्लास की तरह तैयार की गयी थी और उसी तर्ज पर ज़रूरी मुद्दों पर मज़बूत समझ की नींव रखने में ये प्रशिक्षण काफी हद तक सफल रहा|

प्रशिक्षण की एक और बात जो मुझे बेहद पसंद आयी वो ये रही कि इस प्रशिक्षण में सेक्स, यौनिकता, जेंडर और जाति जैसे मुद्दों पर परिचर्चा की गयी, जिसपर आमतौर पर हम अपने सामान्य बात तो क्या विचार तक नहीं करते| ऐसे में इस प्रशिक्षण में इन मुद्दों पर प्रतिभागियों की समझ बढ़ाने के लिए सभी रिसोर्स पर्सन ने अपने विचार साझा किये न कि किसी विशेष विचार या विचारधारा को थोपने का प्रयास किया, जो किसी भी मुद्दे पर मज़बूत और तार्किक समझ बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है|

इसके साथ ही, प्रशिक्षण की संचालिका (वर्षा सरकार), मुख्य शिक्षिका (प्रमदा मेनन और शालिनी सिंह) और अन्य रिसोर्स पर्सन (चयनिका शाह, रत्नाबोली रे, ध्रुबो ज्योति व अन्य सभी) का मित्रवत सहज व्यवहार और सरोकार से जुड़ा व्यवहारिक विचार इस पूरे प्रशिक्षण का अहम या यों कहें कि मज़बूत रीढ़ था| मेरा मानना है कि ऐसे प्रशिक्षण का सिलसिला यूँ ही लगातार चलते रहना चाहिए क्योंकि ये न केवल ज़रूरी मुद्दों पर मज़बूत समझ बनाने का काम करते हैं बल्कि भविष्य में होने वाले सकारात्मक सामाजिक बदलाव के लिए एक मज़बूत नींव का निर्माण भी करते हैं|

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तस्वीरें सौजन्य से: क्रिया

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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