इंटरसेक्शनलमर्दानगी पूंजीवादी पितृसत्ता करती है पुरुष पर वार

पूंजीवादी पितृसत्ता करती है पुरुष पर वार

एक तरफ तो पूंजीवादी पितृसत्ता सामाजिक रूप से दबाव डालने की कोशिश में है और दूसरे की क्षमताओं के दमन की कोशिश में|

दया से मेरी मुलाक़ात देहरादून से उत्तरकाशी यात्रा के दौरान हुई| यात्रा में बातचीत के दौरान दया से उसके बारे में पूछने पर पता चला कि वह बारहवीं के बाद अपनी पढाई छोड़ काम की खोज में गुजरात चला गया| वहां जाने के बाद एक सेठ के यहाँ कुछ काम किया और आज उन्हीं सेठ के मेडिकल गोदाम को देखता है| इसी बीच उसने अपने और सेठ के बीच के रिश्तों के बारे में भी मुझे बताया कि उसका सेठ उसपर बहुत विश्वास करता है| उसने दया को बहुत बार आर्थिक रूप से मदद भी की है| यह कहानी सिर्फ दया की ही नहीं है बल्कि आज के समाज में ऐसी बहुत सी कहानियां आपको आसानी से मिल जायेंगी| ऐसी और कहानियों के बारे में ज्यादा जानने के लिए अपने आसपास भी बहुत से युवकों से मिला जो कहीं न कहीं कुछ काम कर रहे हैं|

यह एकदम सच है कि भारत में बहुत सी जगहों पर लड़कियां सिर्फ ख़ुद के जेंडर और अन्य सामाजिक बन्धनों के कारण अपने शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाती हैं| कुछ जगहों में तो प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें आगे पढ़ने की अनुमति ही नहीं दी जाती क्योंकि आगे की पढ़ाई के लिए उसे दूर के स्कूल जाना पड़ेगा| लेकिन मौजूदा भारत के कुछ राज्यों (विशेषकर उत्तराखंड) में ऐसा भी देखा जा सकता है कि वहाँ के समाज में लड़कियों को अपनी कॉलेज तक की पढाई जैसे-तैसे पूरी करवा दी जाती है| लेकिन लड़कों को बहुत कम वर्ष ही शिक्षा के लिए मिलते हैं| या तो वे पाँचवीं या फिर आठवीं और ज्यादा से ज्यादा बारहवीं पूरी कर जल्द से जल्द अपने लिए काम की तलाश में घर से दूर शहर चले जाते हैं| या फिर किसी ऐसे कोर्स में दाख़िला ले लेते हैं जिसमें जल्द से जल्द नौकरी मिल जाए| दया भी इसी कड़ी में एक नाम है| अमूमन अगर आप गौर फरमाएं तो आपके आसपास सड़क के किनारे फल लगाने वाला या रिक्शा चलाने वाला या फिर फैक्ट्री वगैरह में काम करने वाला आदमी अधिकतर मर्द ही मिलेगा| इतना ही नहीं आप अगर एक व्यस्क लड़के से भी पूछें कि वह पढ़ क्यों रहा है या फिर उसे आगे क्या करना है? तो अधिकतर का जवाब यही मिलेगा कि नौकरी करनी है| अगर सरकारी मिल जाए तो बहुत अच्छा है नहीं तो प्राइवेट कंपनी में ही सही|

यह पूरा खेल पूंजीवादी पितृसत्ता का अधिक नज़र आता है, जिसमें आर्थिक रूप से सम्बल या आत्मनिर्भर होने का दबाव पूरी तरह से मर्द पर डाल दिया गया है|

मेरे एक दोस्त के अनुभव के अनुसार कहूँ तो वह बारहवीं के बाद से ही अपने दोस्तों के साथ भारतीय सेना में जाने के लिए तैयारी शुरू कर चुका था| उसके गाँव से अधिकतर लड़के बारहवीं के बाद सेना में नौकरी की चाह से तैयारी करने लगते हैं| इसके पीछे देश सेवा भी एक बड़ा कारण हो सकता है क्योंकि यह उत्तराखंड के बहुत से गाँवों की पहचान रही है| लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ा कारण आर्थिक रूप से सम्बल या आत्मनिर्भर होने का दबाब भी है| क्योंकि‘सेना की नौकरी’पहाड़ी गाँवों में इसके लिए एक बहुत बड़ा अवसर है| यह सिर्फ सेना में नौकरी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के बहुत से व्यस्क लड़के नौकरी की तलाश में अन्य राज्यों यहाँ तक कि विदेश तक में नौकरी करने के लिए चले जाते हैं और वहां या तो होटल में या अन्य छोटे कामों से आजीविका कमाने लगते हैं| यह बात सिर्फ किसी छोटे राज्य के लिए ही सच है|  मैं यह भी नहीं मानता क्योंकि अगर आप हमारे समाज के किसी भी कोने से सम्बन्ध रखते हैं तो अच्छा करियर (आर्थिक रूप से) बनाने के लिए मर्दों पर दिए जाने वाले दबाव की वास्तविकता जानते ही होंगे|

और पढ़ें : पुरुषों के लिए भी खतरनाक है पितृसत्ता

इसकी तुलना में अगर औरतों की बात करूं तो उनके ऊपर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का दबाब नहीं रहता| क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में उन्हें इसके लिए कोई बाध्यता नहीं है| इसलिए आज कई जगह व्यस्क लड़कियों को उनकी शादी की उम्र होने तक बारहवीं या कॉलेज की पढ़ाई पूरी करवाई जाती है| यह बिल्कुल हो सकता है कि इसका उद्देश्य मात्र उनकी शादी की उम्र होने तक का इन्तजार करना ही हो| लेकिन इसी बहाने ही सही उन्हें अपनी पढाई पूरी करने का मौका मिल ही जाता है|मुझे अपने जीवन में ऐसे भी बहुत से उदाहरण देखने को मिलें हैं जहाँ शादी होने के बाद भी बिना किसी करियर के दबाव के औरत ने अपनी पढ़ाई पूरी की है|यह शैक्षणिक माहौल व्यक्ति को बहुत से अनुभव व जानकारियाँ देता है जो उसके जीवन के लिए उपयोगी होती हैं| साथ ही उसे जीवन के अलग-अलग परिप्रेक्ष्य देता है|

एक तरफ तो पूंजीवादी पितृसत्ता सामाजिक रूप से दबाव डालने की कोशिश में है और दूसरे की क्षमताओं के दमन की कोशिश में|

अब अगर मर्दों की उपरोक्त स्थिति पर विमर्श करें तो यह पूरा खेल पूंजीवादी पितृसत्ता का अधिक नज़र आता है, जिसमें आर्थिक रूप से सम्बल या आत्मनिर्भर होने का दबाव पूरी तरह से मर्द पर डाल दिया गया है| मतलब उसे जीवन में बाकी कुछ भी करना हो, लेकिन सबसे पहले जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होना है|क्योंकि उसके आर्थिक रूप से सम्बल बन जाने के बाद ही वह ख़ुद की पारिवारिक जिम्मेदरियाँ निभा पायेगा|औरत की कमाई को तो मात्र इस दृष्टी से देखा जाता है कि वो कमाएगी तो ठीक है पर घर चलाने के लिए तो मर्द को कमाना जरूरी है| कई जगह तो यह कहकर औरत से काम छुडवा भी दिया जाता है कि हमारे घर के मर्द अभी मरे नहीं है जो घर की बहु-बेटी बाहर नौकरी करने जाएगी| इस स्थिति में देखा जाए तो दोनों लिंगों का ही शोषण है| एक तरफ तो पूंजीवादी पितृसत्ता मर्द पर सामाजिक रूप से दबाव डालने की कोशिश में है और दूसरी ओर औरत की क्षमताओं के दमन की कोशिश में|

ऐसे में अगर कहा जाए कि यह पूंजीवादी पितृसत्ता केवल औरतों के लिए ही नुकसानदायक है तो यह बिल्कुल ही गलत होगा| क्योंकि पूंजीवादी पितृसत्ता में परिवार का आर्थिक दबाव जितना मर्द के लिए खतरनाक है उतना औरत के लिए नहीं| इसमें सबसे दुविधाजनक बात यह है कि यह सब कुछ सामाजिक दबाव के कारण और भी फल-फूल रहा है जैसे- सामाजिक दबाव के कारण आप कभी यह नहीं चाहेंगे कि एक मर्द होने के नाते आपकी सैलरी आपकी पत्नी से कम हो| या फिर आप घर के काम करें| जो कि अभी तक आपकी पत्नी करती आई है और आपकी पत्नी बाहर नौकरी|हाँ अगर आप इन जैसी बातों की परवाह नहीं करते हैं तो यह सम्भव है कि आप इस पूंजीवादी पितृसत्ता के चुंगुल से बच निकलें|

और पढ़ें : आज भी जिन्दा है परिवार में स्त्री-मुक्ति के सवाल


तस्वीर साभार : थॉट को 

About the author(s)

प्रवीण वर्तमान समय में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्यरत है| गणित से एमएससी करने के बाद अभी जेंडर स्टडीज की पढ़ाई कर रहे हैं| जेंडर व नारीवाद से जुड़े विषयों पर लेखन करने के साथ-साथ प्रवीण को घूमना भी पसंद है|

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content