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माँ बनना महिला शरीर से जुड़ी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो महिला और पैदा होने वाले बच्चे के जीवन से जुड़ा अहम हिस्सा है| सच्चाई ये है कि माँ और बच्चे की ज़िन्दगी से जुड़े इस अहम हिस्से की पूरी तस्वीर निर्भर करती है गर्भावस्था से लेकर प्रसव तक महिला को मिलने वाली सुविधाओं पर| यों तो इस दौरान महिला को सामाजिक और मानसिक सुविधाओं की भी ज़रूरत है, लेकिन इस दौरान उसकी सबसे अहम ज़रूरत होती है – चिकित्सीय सेवाएं|

आइये आज हम इस लेख के माध्यम से बात करते है ‘सुरक्षित मातृत्व’ की| विश्व स्वास्थ्य संगठन के चलाए जा रहे ‘सुरक्षित मातृत्व’ कार्यक्रम को काफी साल हो चुके है| इस कार्यक्रम की शुरुआत साल 1987 में नैरोबी में हुई थी| ऐसे में, हाल ही के कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि मिस्र, मलेशिया, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे कुछ विकासशील देशों में साल 1987 से ही मातृ मृत्यु के मामलों में बहुत कमी आई है| इसमें अब कोई शक नहीं कि गर्भावस्था के दौरान पौष्टिक भोजन और एनीमिया, मधुमेह, एचआईवी, टीबी और मलेरिया जैसी पुरानी बीमारियों का प्रभावी इलाज, कुशल डॉक्टर की देखरेख में प्रसव और ज़रूरत पड़ने पर गर्भवती महिला की सही देखभाल उपलब्ध होने से महिलाओं और नवजात शिशुओं में अनावश्यक मृत्यु और रोग की संभावनाओं से बचा जा सकता है|

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ऐसे में सवाल यह है कि मातृ मृत्यु दर के मुद्दे पर यह सकारात्मक बदलाव इतनी धीमी गति से क्यों हो रहे हैं और ख़ासकर जिन देशों में कोई सुधार नहीं हुआ है या जहाँ स्थिति पहले से ख़राब हुई है, वहां आख़िर किन वजहों से ऐसा हो रहा है? अध्ययनों से इस संदर्भ में कई वजहें सामने आई है-

जैसे भारत में कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में किये गये एक अध्ययन से यह पता चला कि गर्भावस्था के दौरान प्रसूति से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रही महिलाएं डॉक्टर के पास जा रही थीं, फिर भी मातृ मृत्यु दर लगातार अधिक बनी हुई थी| इसके शुरूआती कारण थे – जानकारी का अभाव, इलाज ज़ारी न रखना, स्वास्थ्यकर्मियों को सुविधाओं की कमी और उत्तरदायित्व निर्धारित न किया जाना| साथ ही, इसकी और भी वजहें थी कि मातृ मृत्यु के कारणों की समीक्षा नहीं की जा रही थी, प्रसव से पहले की देखभाल और अस्पतालों में प्रसव कराये जाने को प्रसव के बाद भी देखभाल और आपातकालिक प्रसव देखभाल से नहीं जोड़ा जा रहा|

सेवाओं की उपलब्धता, उन तक पहुंच और उन सेवाओं में देखभाल की गुणवत्ता अब भी एक कठिन विषय बना हुआ है|

इसके लिए आमतौर पर निचले स्तर पर काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों या खुद गर्भवती महिलाओं को ही दोषी ठहराया जाता था जबकि न तो उन्हें अनौपचारिक रूप से सेवाएं दी जा रही थी और न अन्य लोगों की भूमिका पर और कोई ध्यान दिया जा रहा थे| न ही सेवाएं देने में आने वाली दिक्कतों और उनके प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं को हल करने के प्रयास किये जा रहे थे|

पैसों की व्यवस्था और जमीनी सरोकार से जुड़ाव

स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पैसे की व्यवस्था करना और उन योजनाओं को जमीनी सरोकार से जोड़ना आज एक जटिल विषय बन गया है और संसाधनहीन देशों की स्वास्थ्य सेवाओं को अपने को विशेषज्ञ बताने वाले उन लोगों ने खराब किया है जो इन सेवाओं को ‘अपने तरीके’ से चलाना चाहते हैं| सरल शब्दों में कहें तो ये सेवाएं सीधे तौर पर सीमित सत्ताधारियों की गिरफ्त में सिमट कर रह गयी है|

प्रसव के लिए कुशल प्रशिक्षण की कमी

राष्ट्रीय नीतियाँ आमतौर पर मातृ देखभाल के क्षेत्र में काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों और प्रसव सेवाएं देने वाले दूसरे कुशल कर्मचारियों को शिक्षा और चिकित्सीय प्रशिक्षण से संबंधित मुद्दों को शामिल करने में असफल रहती हैं|

मातृ मृत्यु दर के मुद्दे पर यह सकारात्मक बदलाव इतनी धीमी गति से क्यों हो रहे हैं और ख़ासकर जिन देशों में कोई सुधार नहीं हुआ है|

सेवाओं की गुणवत्ता पर बढ़ती चिंता

सेवाओं की उपलब्धता ,उन तक पहुंच और उन सेवाओं में देखभाल की गुणवत्ता अब भी एक कठिन विषय बना हुआ है| दशकों तक अनुसंधान करने के बाद प्रसव देखभाल सेवाओं में अपनाए जाने वाले व्यवहारों को विकसित किया गया है जो साक्ष्यों पर आधारित है| लेकिन अब भी इन व्यवहारों को लागू करने में कठिनाई आ रही है और पहले से अपनाई जा रही प्रक्रियाएं, जो साक्ष्यों पर आधारित नहीं है और नुकसानदायक भी हो सकती है, उनकी बढ़ोतरी एक चिंता का विषय है|

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स्वास्थ्य प्रणालियों की कमजोर कड़ियाँ

स्वास्थ्य प्रणालियों की कार्यशैली में कमी है जिससे कि मातृ स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल को गुणकारी बनाने के प्रयास प्रभावित होते हैं| हर कोने से स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत बनाने की ज़रूरत को पहचाना जा रहा है लेकिन इस काम को कैसे पूरा किया जाए इस बारे में लोगों के मन में बहुत कम योजनाएं है|

ऐसे में अगर हम इन प्रमुख पहलुओं पर काम करने और इनमें बुनियादी सुधार करने की कोशिश करें तो निश्चित तौर पर इन सुविधाओं में सुधार किये जा सकते हैं| पर शर्त होगी निष्पक्षता, पुख्ता योजना और उसके प्रभावी सरोकार की|  


यह लेख क्रिया संस्था की वार्षिक पत्रिका मातृ मृत्यु एवं रुग्णता (अंक 3, 2008) से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

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तस्वीर साभार : livemint

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