मेघा झा

ऑल इंडिया दलित महिला आंदोलन मंच (AIDMAM) की नेशनल मॉनिटरिंग कोऑर्डिनेटर और दलित महिला कार्यकर्ता सुमन देवठिया ने दलित फेमिनिज्म से जुड़े मुद्दों पर मेघा झा से बातचीत की। उसके कुछ अंश नीचे प्रस्तुत है –

मेघा : AIDMAM के #DALITWOMENFIGHT आंदोलन के बारे में कुछ बताएँ। इस आंदोलन के पीछे के मुख्य उद्देश्य क्या थे और आज के समय में आंदोलन किस दिशा में बढ़ रहा है?

सुमन : दलित महिलाओं का एक गैर-राजनीतिक संगठन है जो आल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच के नाम के बैनर तले दलित महिलाओं के नेतृत्व मे दलित महिलाओं व समाज के उत्थान के लिए अधिकार, संरक्षण, न्याय, क्षमतावर्धन व विकास का कार्य कर रहा है| इस आंदोलन के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि वंचित समुदाय की महिलाओं का नेतृत्व उभारना और उनके विकास व अधिकार के लिए काम करते हुये समाज मे जाति, पितृसत्ता व लिंग भेद की गैर-बराबरी के खिलाफ लड़ना व पीड़ित लोगों को न्याय व राहत दिलाना| इस आंदोलन से पहले भारत में दलित व वंचित समुदाय की महिलाओं का नेतृत्व नगण्य के बराबर था और जो समस्या व अत्याचार इन दलित-वंचित समुदाय के साथ होता रहा है उसमें भी इन समुदायों की महिलाओ को अन्याय व अत्याचार करने के लिए निशाना बनाया जाता है, इसलिए एक दलित महिलाओं के एक स्वतंत्र आंदोलन की जरूरत महसूस हुई और इन समुदायो की बहनों व महिलाओं के नेतृत्व को उभारा जिससे आज राज्यो मे दलित युवाओ व महिलाओं का नेतृत्व उभर कर आया है और आज यह नेतृत्व भारत में अपने स्वतंत्र नेतृत्व के साथ अन्याय के खिलाफ लड़ते हुये जमीनी स्तर की महिलाओ को जोडते हुये जमीनी स्तर से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज व मुद्दों को उठा रहा है।

मेघा : ज़मीनी स्तर की कार्यकर्ता होने के नाते आपने संसाधनों, खासकर प्राकृतिक संसाधनों के जातिवादी ढंग से हो रहे निजीकरण के बारे में चर्चा की है। पर जब हम बड़े शहरों की बात करें जहाँ कहने को तो जातिवाद अपने गूढ़ रूप में नहीं है, यह भेदभाव बाहर जनसामान्य के बीच होने के साथ साथ कर घर की चारहदीवारी में होता है। ऐसी परिस्थियों में जातिवाद के मुद्दों को एड्रेस करना और भी जटिल हो जाता है। इस पर आपके क्या विचार है?

सुमन : जमीनी स्तर पर अगर प्राकृतिक संसाधनों तक दलितो व वंचित समुदाय और उसमें भी महिलाओं की पहुंच की बात करें तो आज भी सभी प्राकृतिक संसाधनों पर उच्च जाति के लोगों का वर्चस्व है| अगर वह इन प्राकृतिक संसाधनों तक अपनी पहुंच बनाना भी चाहते हैं तो उनके साथ जातिगत भेदभाव, छुआछुत व अत्याचारों का कार बनाया जाता है| समाज में जाति व्यवस्था दिल-दिमाग में बैठी है जो ग्रामीण क्षेत्रों सहित शहरो मे भी भेदभाव व छुआछूत किया जाता है|आज भी शहरो मे अगर कोई मकान किराया पर लेना चाहे तो उसे पहले जाति पूछी जाती है, इतना ही नहीं आज भी सरकारी दफ़्तरो मे भी जातिगत भेदभाव व छुआछूत मौजूद है, उच्च जाति आज भी इस जातिवाद के शिकार हो रहे हैं।

समाज में जाति व्यवस्था दिल और दिमाग मे बैठी है जो ग्रामीण क्षेत्रों सहित शहरों में भी भेदभाव व छुआछूत किया जाता है|

मेघा : आज के समय में जब दलित सशक्तिकरण के नाम पर जुमलेबाज़ी और टोकेनिज़्म किया जा रहा है, दलित महिला स्वाभिमान यात्रा जिसमे अनेक राज्यों की दलित महिला कार्यकर्ताओ के साथ शामिल हुई उसका महत्व बताये। साथ ही यात्रा के अनुभवों को भी साझा करे।

सुमन : समाज में बहुत तरह की गैर बराबरी, भेदभाव व छुआछूत देखने को मिलता है और जिनके साथ भेदभाव, छुआछूत, गैर बराबरी व असमानता होती है उनका ना ही समाज मे मजबूत नेतृत्व देखने को मिलता है और ना ही राजनीति में देखने को मिलता है| इसलिए समाज के साथ-साथ सरकार की भूमिका भी प्रभावी नहीं रही है और सरकार द्वारा इनके लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाए भी सही तरीके से लागू नहीं होने की वजह से इनको इन योजनाओं का पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता, ये देखते हुये AIDMAM ने दलित महिला स्वाभिमान यात्रा के रूप मे गाँव-गाँव जाकर दलित व वंचित समुदाय के मुद्दों को उठाकर उनको न्याय दिलाने हेतु जिला स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक आवाज को उठाया जाता है व साथ ही समाज मे कानून व कल्याणकारी योजनाओं के बारे मे जागरूकता लाने का काम भी करता है जो सामूहिक रूप से आवाज उठाने में राज्यों में न्याय दिलाने मे यह दलित महिला स्वाभिमान यात्रा कारगर साबित रही है व इस यात्रा के माध्यम से काफ़ी दलित महिलाओं खासकर युवाओ का नेतृत्व उभरकर आया है| यह यात्रा सभी राज्यों में दलित महिलाओं के नेतृत्व मे ही किया गया है और इस यात्रा के दौरान इस पूर्ण नेतृत्व को भी पितृसत्ता व जातिगत मानसिकता का शिकार बनाया है और दलित महिलाओं का नेतृत्व दबाने के लिए उनको व्यक्तिगत रूप से चरित्र के नामपर भी अपमानित किया गया है।

ख़ास बात : दलित महिला कार्यकर्ता सुमन देवठिया से।

मेघा : साल 2019 के बजट में SC- ST बजट में काफी खामिया है। हालांकि सरकार के तरफ ये ये बयान आया है कि उन्होंने पिछले बार हुए आवंटन को बढ़ाया है पर NCDHR इत्यादि प्रमुख दलित संस्थाओ से ये आवाज़ उठी है की मूलभूत परेशानी ये है कि चाहे राशि हो, वो ज़रूरतमंदो तक नहीं पहुंच पाती। इसका खासा असर दिखने को मिलता है महिलाओ पर जिन्हे सबसे गरीब श्रेणियों में से एक माना जाता है। आप इस मुद्दे पर अपनी राय दे और अनुभव साझा करे।

सुमन : कहने को तो राज्य व केन्द्र सरकार ने SC-ST के विकास हेतु विशेष घटक योजना के तहत नाम के लिए पैसा रखा जाता है लेकिन सही मायने में यह बजट आज भी दलित और आदिवासी समुदाय के लिए पूर्ण नहीं खर्च नहीं किया जाता है| अगर इस बजट में भी अगर महिलाओं की बात करें तो पूर्ण बजट को जैसे जेन्डर बजट बनाने का जुमला किया जाता है वैसे ही इस बजट को भी जेन्डर बजट कहना मुश्किल है और उसका लाभ दलित महिलाओं को मिलना और मुश्किल है, आज भी देश मे बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जो शिक्षा क्षेत्र मे छात्रवृति भी समय पर नहीं दी जाती है और ना ही महिलाओ के स्वस्थ पर पैसा खर्च किया जाता, यन्हा तक की या तो पैसा लेप्स हो जाता है या इस बजट के पैसे को अन्य मदो मे खर्च कर दिया जाता है।

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मेघा : आपने एक दलित महिला कार्यकर्ता के रूप में काफी कठिनाइयाँ झेली है। अपनी कोई ऐसी ही लड़ाई हमसे साझा करें, जिसने आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया हो।

सुमन : कोई भी दलित समुदाय की महिला हो तो उसको जातिगत भेदभाव व छुआछूत का किसी ना किसी रूप मे शोषण का शिकार बनाया जाता है और महिला होने के नाते पितृसत्तामक सोच का भी शिकार होना पड़ता है। खुद एक दलित महिला होने के नाते मुझे भी इस जातिवाद व पितृसत्तामक सोच की नकारात्मक पीड़ा व दर्द को सहना व झेलना पडा है, मैं लोकजुम्बिस में काम करती थी। वहाँ पर दलित अध्यापिकाओ के साथ भेदभाव व छुआछूत किया जाता था और इस घटना का मुझे विरोध किया तो उसके सकारात्मक परिणाम भी आये, तो उस समय मुझे लगा कि अगर किसी भी अन्याय के खिलाफ निडर व आत्मविश्वास के साथ आवाज उठायी जाये तो हमे कोई नहीं दबा सकता और उसी समय मैने तय किया कि मै ताउम्र मेरे समुदाय व महिलाओं के अधिकारो के लिए काम करुँगी ताकि कुछ हर तक इस जातिवाद, पितृसत्ता व गैरबराबरी के खिलाफ चल रहे आंदोलनो मे मेरा योगदान दे सकूँ और मैने जरूरत महसूस की कि अगर इन सभी व्यवस्थाओ के खिलाफ लडना और सही मार्ग पर चलना है तो डा बाबा साहब अम्बेडकर जी को पढ़ना होगा। मेरा सौभाग्य था कि मै NCDHR व AIDMAM के साथ जुड़ी और मेरा क्षमतावर्धन हुआ व सही राह मिली| आज मै राजस्थान मे दलित महिलाओं के मुद्दों को जमीनी स्तर से राज्य स्तर पर उठाकर पैरवी करती हु और समाज व महिलाओं मे उनके हक व अधिकारो की आवाज उठाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करती हूँ।

मेघा : आज देश के प्रमुख शिक्षा संस्थानों में, विश्वविद्यालयों में, जहाँ कला और समाज शास्त्र की उच्च शिक्षा दी जाती है और शोध इत्यादि का भी काम होता है , वहाँ दलित फेमिनिज्म या दलित नारीवाद एक सशक्त विषय के तौर पर उभर रहा है। एक कार्यकर्ता के तौर पे क्या आप इन छात्र-छात्राओं को, जो कि दलित और सवर्ण , सभी सामाजिक वर्गों से आते है , उन्हें क्या हिदायत देना चाहेंगी?

सुमन : यह दोनों ही विषय ऐसे है जो समाज मे जातिवाद, पितृसत्ता व गैरबराबरी की फैली जड़ों को तोड़ सकता है और समाज को एक सही व नयी राह पर ले जा सकता है। इसलिए मेरी तरफ़ से यही अपील है कि कृपया आप एक सुलझे हुये इंसान व युवा है और आपका मानवाधिकार के प्रति उपजी सोच का बीज आने वाली पीढी में पैदा कीजिये और समाज व शिक्षण संस्थानो मे जाति व पितृसत्ता रहित सोच को मजबूत करने मे अपनी अग्रणी भूमिका निभाये ताकि आप समाज मे एक स्तम्भ व उदाहरण बन सके।

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मेरी तरफ़ से यही अपील है कि कृपया आप एक सुलझे हुये इंसान व युवा है और आपका मानवाधिकार के प्रति उपजी सोच का बीज आने वाली पीढ़ी मे पैदा कीजिये |

मेघा : इन दिनों आपके कार्यभार में मुख्यतः कौन से मुद्दे है ?

सुमन : इन दिनों मेरे कार्यभार में एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप मे मुद्दे उभर कर आ रहे है जो आज जागरूकता व नेतृत्व की वजह से जमीनी स्तर के मुद्दों को उठाकर पैरवी की जाती है और जो कार्यकर्ताओ द्वारा उठाये जा रहे हैं उनको भी आज जान का खतरा बढ़ता ही जा रहा है| इसलिए हम दलित महिलाओं के नेतृत्व को ओर बढ़ाना, समाज में जागरूकता और फ़ैलाना, सरकार, आयोग व अन्य न्याय प्रणाली के साथ मिलकर मुद्दो पर पैरवी कर न्याय दिलाना ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी व मुद्दे है।


तस्वीर साभार : Srishti Kapil

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