संस्कृतिख़ास बात ख़ास बात : प्रसिद्ध हिंदी लेखिका ममता कालिया के साथ

ख़ास बात : प्रसिद्ध हिंदी लेखिका ममता कालिया के साथ

ममता कालिया मौजूदा समय में एक प्रमुख भारतीय लेखिका हैं। प्रस्तुत है आपके सामने ममता कालिया के साथ आर. अनुराधा की ख़ास बात का अंश :

आर. अनुराधा

ममता कालिया मौजूदा समय में एक प्रमुख भारतीय लेखिका हैं।वे कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, कविता और पत्रकारिता अर्थात साहित्य की लगभग सभी विधाओं में हस्तक्षेप रखती हैं। हिन्दी कहानी के परिदृश्य पर उनकी उपस्थिति सातवें दशक से निरन्तर बनी हुई है। लगभग आधी सदी के काल खण्ड में उन्होंने 200 से अधिक कहानियों की रचना की है। प्रस्तुत है आपके सामने ममता कालिया के साथ आर. अनुराधा की ख़ास बात का अंश :

अनुराधा : आजकल क्या लिखना-पढ़ना चल रहा है?

ममता : मैं दो उपन्यास साथ-साथ लिख रही हूं। यह शुरू से ही मेरी आदत रही है, एक साथ दो किताबों पर काम करने की। दरअसल जब कॉलेज में रहती थी तो वहां पर एक पर काम चलता रहता था। फिर उसे घर उठा कर नहीं लाया जा सकता था। सो, घर पर क्या करूं- तो एक और कहानी-उपन्यास घर पर लिखा करती थी। (हँसकर)- आज-कल भी वही कर रही हूं। हिंदी में मेरा एक उपन्यास है ‘दौड़’, जिसका अंग्रेजी में ट्रांसक्रिएशन (ट्रांसलेशन नहीं) कर रही हूं, ‘द बिग बाज़ार’ के नाम से। साथ में एक और उपन्यास लिख रही हूं, जिसे फिलहाल ‘संस्कृति’ नाम दिया है।

अनुराधा : ‘संस्कृति’ के बारे में कुछ बताइए।

ममता : साहित्य और संस्कृति की आजकल ठेकेदारी हो गई है। किस लेखक को चढ़ाएं, किसे उतारें, किसे पुरस्कार दे-न दें, सब, कुछ लोग मिलकर तय कर लेते हैं। एक तरह का प्रायोजनवाद चल रहा है। साहित्य, संस्कृति और कला की दुनिया में भी बाजार ने जोर से दस्तक दी है। यह गंभीर बात है जिस पर हिंदी में ज्यादा सोचा नहीं गया है। पत्रकारों ने भले ही नोटिस किया हो लेकिन साहित्यकार ने इस पर गंभीरता से नहीं लिखा है कि कोई मठाधीश रूठ न जाए क्योंकि सभी की नजर किसी पुरस्कार, नियुक्ति, संस्तुति पर लगी रहती है। यही सब इस उपन्यास का मूल विषय है।

अनुराधा : हाल में जो कुछ पढ़ा हो!

ममता : ज्ञान प्रकाश विवेक का ‘आखेट’ पढ़ा। यह बहुत ही अच्छा लगा। इसके अलावा एक और किताब जिसके बारे में मैं कहते नहीं थकती- 1995 में आई बराक ओबामा की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द ड्रीम्स फ्रॉम माई फादर’। ओबामा को नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई तो बहुत खुशी हुई। यह पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे किसी गांधीवादी का लेखन है।

मैं विषय-सीमा नहीं मानती कि महिलाएं कुछ खास विषयों पर ही लिख सकती हैं।

अनुराधा : नोबेल पुरस्कारों की बात निकली है तो- भारत में रबींद्रनाथ ठाकुर के बाद साहित्य के क्षेत्र में कोई नोबेल नहीं आया। क्या हमारा साहित्य उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया या हम उसे वहां तक नहीं पहुंचा पाते?

ममता : हिंदी का लेखक बेचारा निहत्था, भोला-भाला होता है। उसे पता ही नहीं कि नोबेल के लिए पुस्तक कैसे भेजें। प्रकाशक को यह करना चाहिए, पर अपने लेखक के उत्थान में उसकी कोई रुचि नहीं है। किसी तरह 500 प्रतियां बिक जाएं बस। हिंदी की पुस्तक को विश्व परिदृष्य पर रखने के लिए प्रकाशकों ने कभी वैसी मेहनत की, जैसी लैटिन अमरीकी देशों के प्रकाशकों ने की? उन्होंने अपने यहां के साहित्य का पूरे संसार में वितरण करवाया। लेकिन हमारे यहां हिंदी में प्रकाशक यह जिम्मेदारी नहीं लेता।

अनुराधा : तो फिर लेखक खुद क्यों नहीं इसके लिए प्रयास करते, जैसा कि आपने कहा कि वे पुरस्कार आदि पाने के लिए करते हैं?

ममता : लेखक के पास साधन नहीं है, धन नहीं है और प्रकाशक पैसा खर्च नहीं करता। बुकर या नोबेल में किताब भेजने के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है। इसीलिए किसी दिन पूंजिपति उधार की पुस्तक ‘लिखकर’ नोबेल के लिए भेज देंगे। एक दिन सभी पूंजिपति लेखक बन जाएं तो आश्चर्य नहीं। प्रकाशकों को नोबेल तक पहुंचने के सारे रास्ते पता हैं, पर वे कुछ करते नहीं हैं। विचार फैलाने या भारतीय प्रतिभा के मूल्यांकन की दृष्टि से नहीं, सिर्फ मुनाफे की नजर से वे लेखक और रचना को देखते हैं।

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अनुराधा : विषयांतर करते हैं। आजकल महिलाएं जो कुछ लिख रही हैं…

ममता : मैं विषय-सीमा नहीं मानती कि महिलाएं कुछ खास विषयों पर ही लिख सकती हैं। लेकिन बाजार का दबाव है कि महिलाओं से खास तरह के लेखन/साहित्य की आशा की जाती है। वे भी घर से निकलती हैं, नौकरी करती हैं और हर तरह का काम करती हैं। बल्कि उसे स्थितियां अपने अनुकल बनाने के लिए दोहरी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन मेरा मानना है कि नैसर्गिक प्रतिभा के कारण स्त्री हमेशा बेहतर वर्कर होती है। महिलाओं ने अपनी चेतना से यह क्षमता विकसित की है कि हर काम को वे अपना पूरा समर्पण, निष्ठा देती हैं।

वास्तविक स्त्री को जेहन में लाएं तो पाएंगे कि उसके जीवन में भी कभी खुशी तो कभी दुख है।

अनुराधा : स्त्री-विमर्श की शुरुआत अब हिंदी लेखन में भी हो गई है। वह भी एक स्वीकार्य विषय हो गया है।

ममता : मुश्किल ये है कि जो बातें स्त्री विमर्श में शामिल हो रही हैं वे कहानियों-साहित्य में नहीं आ रही हैं। दोनों गीत अलग-अलग सुरों में चल रहे हैं।

अनुराधा : लेकिन कई दशक पहले लिखे स्त्री-विमर्शात्मक साहित्य को तक फिर पूरा महत्व दिया जा रहा है, वे रचनाएं धूल झाड़ कर फिर छापी जा रही हैं। जैसे – ‘सरला- एक विधवा की आत्मजीवनी’ ।

ममता : हां, बिल्कुल। सरला- एक विधवा की आत्मजीवनी या एक अज्ञात हिंदू महिला…। तारा बाई शिंदे, पंडिता रमा बाई आदि ने बीसवीं सदी के शुरू में जो विषय उठाए थे, आज का नारी विमर्श उससे भटक गया है। उन्होंने अपने समय की विसंगतियों को लिखा। पर आज के नारीवादी रचनाकार देह शोषण से आगे नहीं बढ़ते। दूसरे किस्म का शारीरिक और मानसिक शोषण, देह शोशण से कम भयावह नहीं। पर उसे तवज्जो नहीं दी जा रही है।

और पढ़ें : खास बात: “स्त्री का लिखना साहित्य के क्षेत्र में अपना स्पेस क्लेम करना है” – सुजाता

अनुराधा : आपकी रचनाओं में भी महिला-जीवन के कई पहलू सामने आते हैं।

ममता : मेरी रचनाओं में नारी विमर्श थेगली की तरह नहीं आता बल्कि कहानी के साथ चलता है। वास्तविक स्त्री को जेहन में लाएं तो पाएंगे कि उसके जीवन में भी कभी खुशी तो कभी दुख है। वह सहज ही जीवन में इन सब क्षणों से गुजर रही है। वह हमेशा एक ही मनोभाव लेकर नहीं रहती, न ही घर में हमेशा नारीमुक्ति का झंडा उठाए रहती है। मैं मानती हूं कि जागरूक स्त्री अपने पास-परिवेश को बदलती और संस्कारित भी करती है।


यह साक्षत्कार इससे पहले चोखेरबाली नामक ब्लॉग में प्रकाशित किया जा चुका है|

तस्वीर साभार : thewirehindi

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