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भारत जैसे विकासशील देश में आज भी महिलाओं की स्थिति कुछ खास बेहतर नहीं है| ये स्थिति कई बार इतनी बिगड़ जाती है कि हम संविधान के नियमों और कानून को ही गलत ठहराने लगते हैं। मैं एक भारतीय पुरुष हूँ और एक भारतीय पुरुष की मनोदशा से बहुत अच्छी तरह प्रभावित और परिपक्व हूँ। मैं देख सकता हूँ कि मौजूदा भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति किस तरह बुरी हो रही है। महिलाओं का भारत में जन्म लेना एक अभिशाप बनता जा रहा है। बचपन से ही लड़का और लड़की का भेदभाव हमारे समाज में साफतौर पर देखा जा सकता है। 

पूरी दुनिया में महिलाओं के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों के बारे में थॉमसन ​रॉयटर्स फाउंडेशन के वार्षिक सर्वेक्षण में भारत महिलाओं के साथ हिंसा में सबसे अव्वल रहा। भारत को सबसे पहला दर्जा दिया गया है| वैसे तो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग और भारत के अनेक विशेषज्ञों ने इस सर्वेक्षण के नतीजों को अतिशयोक्ति पूर्ण और पक्षपातपूर्ण करार देकर नकार दिया है, लेकिन हम इस सच्चाई से इनकार नहीं कर सकते कि महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा वास्तव में देश की एक बड़ी समस्या है, जिसे तत्काल हल किए जाने की जरूरत है।

भारत में साल 2015-16 में कराए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS 4) में इस बात का उल्लेख किया गया है कि भारत में 15-49 साल की 30 फीसद महिलाओं को 15 साल की उम्र से ही शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है। कुल मिलाकर NFHS 4 में कहा गया है कि उसी उम्र में 6 फीसद महिलाओं को उनके जीवनकाल में कम से कम एक बार यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011 से 2015 के बीच महिलाओं के विरुद्ध अपराध 41.7 फीसद से बढ़कर 53.9 फीसद तक पहुंच गए हैं। नवजात बच्चियों से लेकर 80 साल की वृद्ध महिला तक यौन हिंसा की शिकार हो रही हैं। इसके खिलाफ हमको एकजुट होना ही होगा वरना हमारे देश को और अधिक पिछड़ने से कोई नहीं रोक सकता।

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भारतीय घरेलू हिंसा हमारे देश की नींव को कमज़ोर कर रही है और साथ ही साथ संविधान के नियम व कानून का उल्लंघन कर रही है| इसके ज़िम्मेदार आज के पुरुष हैं और उनकी  पुरानी और घिसीपिटी विचारधारा जो इस समाज को झकझोर कर रख देती है। पुरुष का महिला को प्रताड़ित करना या उसको मानसिक और शारीरिक दुःख देना ही घरेलू हिंसा नहीं है। आज की महिला अपने जीवन में ना जाने कितनी ही हिंसा की शिकार हो रही है।

हिंसा को मुख्यतः मैंने अपने विचारों से चार प्रकार में बाँटा है,जो तरह से हैं-

शारीरिक हिंसा

किसी महिला को शारीरिक पीड़ा देना जैसे मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, लात-घूसा मारना, किसी वस्तु से मारना या किसी अन्य तरीके से महिला को शारीरिक पीड़ा देना शारीरिक हिंसा के अंतर्गत आता है।

यौनिक या लैंगिक हिंसा

महिला को अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना, बलात्कार करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना इसके अंतर्गत आता है।

मौखिक और भावनात्मक हिंसा

किसी महिला या लड़की को किसी भी वजह से उसे अपमानित करना, उसके चरित्र पर दोषारोपण लगाना, शादी मर्जी के खिलाफ करना, आत्महत्या की धमकी देना, मौखिक दुर्व्यवहार करना।

आर्थिक हिंसा

बच्चों की पढ़ाई, खाना, कपड़ा आदि के लिए धन न उपलब्ध कराना, रोजगार चलाने से रोकना, महिला द्वारा कमाए जा रहे धन का हिसाब उसकी मर्जी के खिलाफ लेना।

ये तो बात हो गयी तरह-तरह की हिंसा की| अब सवाल उठता है कि इन्हें रोका कैसे जाए? तो इसके दो विकल्प है एक तो कानून के माध्यम से और एक अपने घर-समाज में बदलाव लाकर| चूँकि कानून का होना और इसका इस्तेमाल होना दो अलग बातें हैं| बेशक आज महिलाएं अपनी अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं, लेकिन कितनी महिलाएं अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर पा रही है ये अपने आपमें बड़ा सवाल है| चूँकि मैंने अपनी बात के शुरूआती हिस्से में महिला हिंसा में पुरुषों की भागीदारी की बात कही थी, जो सीधेतौर पर महिला पर बढ़ती हिंसा का प्रमुख कारण है| ऐसे में हम पुरुष अपने रोजमर्रा की ज़िन्दगी में किस तरह ऐसी हिंसाओं को रोकने के प्रयास कर सकते हैं, वो कुछ इस तरह से हैं –

पितृसत्ता का ‘मर्द’ नहीं ‘इंसान’ बनना होगा

चूँकि भारतीय पितृसत्तामक समाज में जिस तरह महिलाओं को मायने परिभाषित कर उन्हें गढ़ा जाता है, ठीक उसी तरह हम पुरुषों को गढ़ा जाता है| इसके तहत हमें बताया जाता है कि – मर्द औरत से ज्यादा ताकतवर होते है, मर्द रोते नहीं है, मर्द घर का काम नहीं करते, मर्द मजबूत और गुस्सैल होते है, वगैरह-वगैरह| हमें इसी परिभाषा को बदलने की सख्त ज़रूरत है| अपने परिवार में, समाज में और अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में| हमें अब पितृसत्ता का मर्द नहीं इंसान बनने की ज़रूरत है, जो किसी और इंसान को बिना किसी लैंगिक भेदभाव के इंसान समझे|

अपडेटेड लैंगिक भेदभाव को सख्ती से कहें ‘ना’

भारतीय समाज में ये अक्सर देखा गया है कि बचपन से ही अभिभावक बेटा और बेटी में भेदभाव करने लगते हैं| पर मौजूदा समय में हम इसबात से इनकार कर देते है| गौर करने की ज़रूरत है कि अब ये भेदभाव समय के साथ अपडेट हो चुका है| हम जब लड़का-लड़की के लिए जब खेल-खिलौने, कपड़े, टीवी सीरियल और करियर को अपनाने लगते है तो यही से पितृसत्ता के अनुसार हम अपने बच्चों को गढ़ना शुरू कर देते है| चूँकि बच्चों की परवरिश में हम पुरुषों की भी पूरी भागीदारी होती है, ऐसे में ज़रूरी है कि हम अपनी इस भागीदारी को पूरी संजीदगी के साथ निभाएं|  

पुरुषों के साथ हो कार्यशालाएं

बीते कई सालों से लगातार हम महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी सुरक्षा के नामपर ढ़ेरों प्रयास कर रहे हैं| पर वहीं दूसरी तरफ पुरुषों को इस सबसे एकदम अलग रखा है| मौजूदा समय में कुछ प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन अभी वे काफी नहीं है| हमें समझने की ज़रूरत है कि जिसतरह पितृसत्ता महिलाओं को प्रभावित करती है, ठीक उसी तरह ये पुरुषों को प्रभावित करती है| इसलिए समाज में स्थायी और सकारात्मक बदलाव लाने के लिए ज़रूरी है कि महिला और पुरुष दोनों के साथ काम किया जाए| सरल शब्दों में कहूँ तो पुरुषों की जवाबदेही तय करना बेहद ज़रूरी है|

और पढ़ें : ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ वाला पुरुषों के लिए पितृसत्ता का जहर


तस्वीर साभार : nytimes

2 COMMENTS

  1. This article really showcase of our society .people must b aware with the fact and impact of patriarchal society.this is really essential to know the effect on women and the measure which must b taken to uproot this social evil.we all speak about the equality and freedom but we need to work in right direction so that marganaliged section of society get benefitted .

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