मनोरमा सिंह

राजनीति में महिलायें क्या पूर्वाग्रह, भेदभाव और कमतर समझे जाने को अभिशप्त हैं ? भारत के सन्दर्भ में इस सवाल का जवाब हाँ होगा। लेकिन सच ये है कि भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में ही नहीं बल्कि दुनियां के सभी देशों में चाहें वो विकसित देश हों, विकासशील या तीसरी दुनियां के महिलाओं के लिए राजनीति में आना, बने रहना एक सा चुनौतीपूर्ण है। यह अकारण नहीं था जब 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति पद की दौर में शामिल हिलेरी क्लिंटन जैसी सशक्त महिला को केवल एक स्त्री, एक जेंडर में समेट दिया गया। उनके खिलाफ चुनाव प्रचार अभियान पूरी तरह से उनके महिला होने पर केंद्रित था, उस दौरान अमेरिका ने हिलेरी के बहाने अमेरिकी राजनीति में ‘स्त्री द्वेष या मिसोजिनी’ का वो चेहरा देखा जो साठ साल पहले शुरू हुई लैंगिक बराबरी की लड़ाई के बावजूद अभी बहुत पीछे था। हिलेरी क्लिंटन इससे इतनी प्रभावित हुईं कि प्रचार अभियान में महिला अधिकारों के लिए लड़ने की अपनी लम्बी पृष्ठभूमि को उन्होंने खुद ही उपेक्षित कर दिया था, जिसे 2017 में एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया और कहा, ‘मिसोजिनी एक महामारी है, यह हमारे समाज की मानसिकता में पैदाईशी है।’

यहां तक कि फ़्रांस जैसे प्रगतिशील देश में बीते हफ्ते, शार्ली एब्दो जैसी चर्चित मैगजीन जिसने पैगम्बर मोहम्मद पर कार्टून छापने के कारण 2015 में इस्लामिक चरमपंथियों का हमला झेला था, जिसके विरोध में उस वक्त दुनियां के तमाम देश पत्रिका के साथ खड़े हुए थे, उसी शार्ली एब्दो ने महिला फुटबॉल पर व्यंग्य करते हुये ‘योनि में फुटबॉल ‘ का चित्र कवर पेज पर छापा है, इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण पैदाइशी पेट्रिआकल होने के अलावा और क्या हो सकता है ? दरअसल, जर्मनी की एंगेला मर्केल हों या पाकिस्तान की बेनज़ीर भुट्टो राजनीति में दोनों को ताने सुनने होते हैं-एक को शादी नहीं करने और मां नहीं बनने के कारण और दूसरी को प्रधानमंत्री रहते हुए मां बनने वाली पहली नेता होने के कारण। बहरहाल, हिलेरी क्लिंटन के इस इंटरव्यू के बाद ये जरूर हुआ कि राजनीति में महिलाओं के सन्दर्भ में मिसोजिनी या स्त्री द्वेष पूरी दुनियां में चर्चा और विमर्श के केंद्र में आया।

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हाल ही में ऑस्टेलिया में चुनाव संपन्न हुए और नई सरकार का गठन हुआ,हालांकि चुनाव जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे पर लड़ा गया लेकिन वहां राजनीति में हिस्सेदारी कर रही महिलाओं के लिए पिछले कुछ सालों में स्त्री द्वेष एक बड़ा मसला रहा है, जिनका सामना उन्हें लगातार संसद तक में करना पड़ा है। साल 2018 ऑस्ट्रेलिया की महिला राजनीतिज्ञों के लिए सबसे ज्यादा शर्मनाक रहा जब सार्वजनिक रूप से महिला राजनीतिज्ञों ने पब्लिक शेमिंग का सामना किया। ऑस्टेलियाई समाज ने पुरुष राजनीतिज्ञ को महिलाओं को हिप्पोक्रेट और मिसेन्ड्रिस्ट ( पुरुष द्वेष ) कहते सुना और महिला राजनीतिज्ञ ने स्लट शेमिंग का आरोप लगाया। लेकिन अच्छी बात ये रही कि इसके विरोध में इन्हीं महिला नेताओं का विरोध भी दलगत राजनीति से ऊपर जाकर दर्ज हुआ , एकमत से उन्होंने इस मानसिकता को ख़त्म किये जाने की आवाज बुलंद की, इसलिए ये जरूरी है कि इस बारे में अपने यहाँ भी बात की जाय।

पिछले साल द ऑस्ट्रेलियन ग्रीन पार्टी की सीनेटर सराह हैंसन यंग मिसोजिनी के खिलाफ सबसे बुलंद आवाज़ रहीं हालाँकि इसका सामना वो 2007 से ही कर रही थी जब वो 25 साल की उम्र में पहली बार सबसे युवा महिला सीनेटर के तौर पर चुनकर संसद में दाखिल हुई थीं। उन्हें लगातार उनकी ड्रेस, उनकी बॉडी और कथित सेक्स लाइफ को लेकर अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा था लेकिन अक्सर इन बातों को वो नज़रअंदाज कर आगे बढ़ रही थी। एक महत्वपूर्ण 2009 की है जब सीनेट प्रेजिडेंट ने सत्र के दौरान उनकी दो साल की बेटी को सीनेट के चैंबर से बाहर ले जाने के निर्देश दिए थे क्योंकि तब ऑस्ट्रेलियाई संसद में सीनेटरों को अपने छोटे बच्चों को चैंबर में लाने की अनुमति नहीं थी। इस घटना ने ऑस्ट्रेलिया में महिलाओं के करियर, वर्कप्लेस और इसके साथ बच्चों के समायोजन पर व्यापक बहस की शुरुआत की, हालांकि इस मसले पर पब्लिक ओपिनियन बँटा हुआ था, लेकिन सात साल बाद इस पर कानून बना और ऑस्ट्रेलियाई संसद के दोनों सदनों में महिलाओं को अपने छोटे बच्चों को अपने चैंबर में लाने की अनुमति मिली।

दुनियां के सभी देशों में चाहें वो विकसित देश हों, विकासशील या तीसरी दुनियां के महिलाओं के लिए राजनीति में आना, बने रहना एक सा चुनौतीपूर्ण है।

2016 में संसदीय सदन के चेंबर में महिला सांसदों को अपने बच्चों को स्तनपान कराने की अनुमति दी गई, ये सराह के साथ साथ तमाम महिलाओं की जीत थी। लेकिन पिछले साल का मामला कुछ और था जब एक महिला कॉमेडियन देर रात अपने घर लौट रही थीं तब किसी के द्वारा उनकी हत्या कर दी गयी थी, पूरे ऑस्टेलिया के लिए यह घटना शॉकिंग थी और सराह इसी सन्दर्भ में महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर सीनेट में बहस कर रही थीं और उन्होंने कहा महिलाओं को सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होगी अगर पुरुष महिलाओं का बलात्कार करना बंद कर दें। इसपर वरिष्ठ सीनेटर डेविड लेओन्हजेलम ने कई शर्मनाक टिप्पणी यह कहते हुए की कि उन्होंने सभी पुरुषों को बलात्कारी कहा है, उन्होंने टीवी, रेडियो पर सराह से सम्बंधित निजी और तल्ख़ टिप्पणियां की जिसके दायरे में सराह का तलाकशुदा माँ होना भी शामिल था। उनकी ग्यारह साल की बेटी से स्कूल में सवाल किये गए कि क्या उसकी मां के कई सारे ब्यॉय फ्रेंड हैं ? महत्वपूर्ण ये है की इस बार हेंसन यंग ने इन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया इसलिए लेओन्हजेलम से पहले माफ़ी मांगने को कहा, माफी मांगने से इनकार करने पर उनके इस्तीफ़े की मांग की। ये भी नहीं होने पर मानहानि का मुकदमा दायर किया। अगस्त 2018 को ग्रीन्स ने सीनेट में लेओन्हजेलम के खिलाफ हेंसन यंग पर टिप्पणी किये जाने के लिए में एक प्रस्ताव पारित किया,जो 30 -28 से पास हुआ बाद में अदालत में भी सराह के पक्ष में सबूत दिये गए। उनकी जीत को चुनाव में जनता की भी स्वीकृति मिली है 2019 के संघीय चुनाव में उन्होंने छह साल का सीनेट कार्यकाल जीता है।

ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में ये कहानी केवल सराह की नहीं रही है साल 2010 में जूलिया गिलार्ड ऑस्ट्रेलिया की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी और 2013 में जब उन्होंने देश के 27वें प्रधानमंत्री का पद छोड़ा तो उनकी टिप्पणी थी कि उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए तीखे लिंगभेद का सामना करना पड़ा था और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री के रूप में उनके साथ भी वही हुआ जो दुनिया की दूसरी महिला नेताओं के साथ होता है’। अगर उनके पूरे कार्यकाल की घटनाओं पर गौर करें तो समझ में आएगा कि उनकी इन टिप्पणियों का क्या अर्थ है और स्त्री द्वेष की जड़ें कितनी गहरी हैं, जहाँ एक विकसित, प्रगतिशील संपन्न देश की प्रधानमंत्री भी अगर महिला है तो कितनी वल्नरेबल हो जाती हैं। उनके लिए जानबूझकर बांझ और शासन करने के लिए अनफ़िट, मोटी, लाइंग काऊ , बिच , मेनोपॉजल मॉन्सटर जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए। अपने देश में हमने नेताओं को अपने साथ की महिला नेताओं के बाल,गाल,समझ, कपड़ों इन सब पर टिप्पणी करते सुना लेकिन साल 2013 में आस्‍ट्रेलिया में जो हुआ वो नीचता की हद कही जा सकती है, जब ऑस्‍ट्रेलिया के मुख्‍य विपक्षी दल के नेता माल ब्रो ने अपनी सभा में भोज का आयोजन किया जहाँ मेन्‍यू में व्यंजनों के नाम ऑस्‍ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड के प्राइवेट पार्ट के नाम पर रखे गए थे मसलन “जूलिया गिलार्ड स्‍मॉल ब्रेस्‍ट” और “जूलिया गिलार्ड ह्यूज थाइज ”। इस प्रकरण पर देश में काफी बहस हुई जूलिया गिलार्ड ने माल ब्रो की क्‍वींसलैंड सीट से उम्‍मीदवारी को खारिज करने की मांग की, बाद में माल ब्रो ने यह कहते हुए माफ़ी मांगी की कि उन्होंने खुद ये मेन्यू नहीं बनवाया था। इसी तरह 2011 में एबीसी टीवी ने ‘एट होम विद जूलिया’ नाम से एक कॉमेडी शो पेश किया जिसमें हास्य और व्यंग की सीमा से पार जाकर बतौर प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड का मजाक उड़ाया गया। शो में उनका किरदार निभाने वाली महिला को अपने दफ्तर में ही सेक्स करते हुए और अपने नग्न शरीर को ऑस्ट्रे लियाई झंडे से ढँककर अश्ली ल हरकतें करते हुए दिखाया गया। गौरतलब है कि जूलिया ने 2012 में स्पीकर पर लगे एक कर्मी के यौन शोषण के आरोप के मामले में अपनी सरकार द्वारा उनका बचाव किये जाने के आरोप के जवाब में संसद में एक तीखा भाषण दिया था जिसमें ‘मिसोजनी’ शब्द को नए सिरे से परिभाषित करने की हिदायत दी थी। जूलिया बैंक्स के अनुभव भी ऐसे ही रहे, उन्होंने भी भय-धमकियों, सांस्कृतिक और लैंगिक भेदभाव को महसूस करके ही राजनीति से दूर होना तय किया था और अपने ट्वीटर हैंडल पर लिखा कि उन्होंने ये डर अपनी पार्टी के भीतर और बाहर हर जगह अनुभव किया। जूलिया बैंक्स को इस बात पर अन्य कई महिला सेनेटरों का समर्थन मिला जिनमें सरकार में शामिल महिलाएं भी थीं और अन्य दलों की भी। उन्हें इन सब से इसलिए गुज़रना क्योंकि लिबरल पार्टी की सदस्य होते हुए उन्होंने अपनी पार्टी पर दक्षिणपंथियों की विचारधारा पर काम करने का आरोप लगाया और पार्टी छोड़कर स्वतंत्र उम्मीदवार बनना तय किया जिससे तात्कालिक मॉरिसन सरकार अल्पमत में आ रही थी, जूलिया बैंक्स फ़िलहाल निर्दलीय हैसियत से राजनीति में सक्रिय हैं।

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जहाँ तक राजनीति में लैंगिक बराबरी के मामले में ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की बात है तो मूल निवासियों को छोड़कर ऑस्ट्रेलियाई महिलाओं को वर्ष 1902 में संघीय चुनावों में भागीदारी करने का अधिकार हासिल हुआ लेकिन संसद में किसी महिला को पहुंचने में चार दशक का समय लग गया। इन बीच उनकी संख्या संसद में बढ़ने के बावजूद लैंगिक विविधता के मामले में ऑस्ट्रेलिया की विश्व रैंकिंग 1999 में 15वें स्थान पर थी वही 2018 में 50 वें स्थान पर। साथ ही यहांदोबारा चुनाव नहीं लड़ने वाली महिला राजनीतिज्ञ की भी संख्या काफी होती है, पिछले सालों में कई महिला सांसदों ने इसलिए राजनीति छोड़ दी क्योंकि बतौर सांसद पारिवारिक जीवन के साथ उनका सामंजस्य बना पाना मुश्किल है। और इसकी मुख्य वज़ह महिलाओं की भूमिका उनके कार्य और व्यवहार को लेकर पूर्वाग्रही सोच और दोहरे मानक हैं, मसलन पुरूषों पर लगे चारित्रिक विचलन के आरोपों को मर्दानगी समझा जाता है वहीं लेबर पार्टी की सांसद एम्मा हसर पर शोषण और यौन प्रताड़ना के आरोप लगते के साथ ही उनकी पार्टी ने उनसे इस्तीफा माँगा, सार्वजानिक निंदा और टिप्पणियों के कारण उन्होंने छुट्टी ले ली ,बाद में जाँच में शोषण और यौन प्रताड़ना के आरोप साबित नहीं हुए, उनकी पार्टी ने उन्हें दोबारा खड़ा किया लेकिन एम्मा ने जांच रिपोर्ट आने के दो दिन बाद उन्हें बदचलन कहे जाने जैसी टिप्पणियों की वजह से इस्तीफा दे दिया। इस कड़ी में केली ओ डेयर,एन सुदमेलिस, जेन प्रेंटिस, नताशा स्टॉट डिस्पोजा, जुली बिशप जैसी कई और राजनीतिज्ञों के नाम हैं जिन्होंने राजनीति से विदा लेने का कारण स्त्री को लेकर पूर्वाग्रही सोच और पेट्रियाकी को कहा। इसकी तस्दीक 2016 आईपीयू रिपोर्ट में देखी जा सकती है जिसमे पाया गया कि 60% से अधिक लोगो का महिलाओं के प्रति सेक्सिस्ट व्यवहार या हिंसा उन्हें राजनीति से बाहर निकालने के लिए था। 50/50 2030 फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया की राजनीति यूरोप की तुलना में बहुत अधिक सेक्सिस्ट है,ऑस्ट्रेलियाई राजनीति में जो महिलाएं हैं उनके प्रति वहां के पुरुषों का रवैया बहुत चिंताजनक बात है। इनके द्वारा 1980 और 1994 के बीच पैदा हुए युवकों के बीच किये गए सर्वे के निष्कर्ष भी बहुत हैरान करने वाले हैं, 62% से अधिक युवा पुरुष जो खुद औसत से अधिक समय गेमिंग में बिताते हैं,लिंग समानता पर पारंपरिक विचार रखते हैं और महिलाओं की ज्यादा उपयुक्त भूमिका घर में रहने और घर परिवार की देखभाल करना मानते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के सन्दर्भ में अच्छी बात ये है कि यहां की महिला राजनीतिज्ञ लैंगिक समानता, स्त्री द्वेष जैसे मसलों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर साथ संघर्ष कर रही हैं|

दूसरी ओर भारत की बात करें तो दुनिया में लोकसभा जैसे निचले सदन में महिला प्रतिनिधित्व देने के मामले में भारत का स्थान पाकिस्तान से भी पीछे है, जिनेवा स्थित इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक इस इंडेक्स पर भारत का स्थान 150वां है जबकि पाकिस्तान का 101वाँ। भारत की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2019 की लोकसभा में सबसे अधिक है तब भी यह केवल 14. 3 प्रतिशत हैं जो 2014 में 11.8 फीसदी था, जबकि दुनियां के 50 देशों की संसद में महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों के 30% से अधिक है। पिछले साल अक्टूबर तक के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ़ 9 प्रतिशत सदस्य देश ऐसे हैं जहां कोई महिला सरकार का नेतृत्व कर रही थीं साथ ही वैश्विक स्तर महिला सांसदों की राजनीति में कुल हिस्सेदारी केवल 24 प्रतिशत है।

जर्नल ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइज़ेशन में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि जिन सरकारों में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है वहाँ भ्रष्टाचार कम होता है। लेकिन सच ये है कि दुनिया भर में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की प्रक्रिया में गिरते दर से प्रगति हो रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष मारिया फ़र्नान्डा एस्पिनोसा ने न्यूयॉर्क में महिलाओं की स्थिति पर आयोग के 63वें सत्र के दौरान सत्ता में महिलाओं की भागीदारी विषय पर चर्चा करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि मौजूदा रूझान के जारी रहते दुनियां को लैंगिक बराबरी हासिल करने में 107 साल और लगेंगे। हालांकि ये पहली बार है जब संयुक्त राष्ट्र वरिष्ठ प्रबंधन समूहों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। साथ ही सदस्य देशों में टीमों का नेतृत्व करने वाले रेज़ीडेंट कोऑर्डिनेटर के पदों में भी लैंगिक बराबरी हासिल कर ली गई है अब सभी वरिष्ठ पदों पर 2021 तक लैंगिक बराबरी हासिल करने का लक्ष्य है, लेकिन बाक़ी जगहों पर ऐसा नहीं है जबकि टिकाऊ विकास, मानवाधिकार, शांति और शक्ति समीकरणों में संतुलन के लिए राजनीति में महिलाओं का होना जरूरी है। न्यूज़ीलैंड की 37 साल की प्रधानमंत्री जैसिंडा ऑर्डर्न इसे साबित भी कर रही हैं जब पूरी दुनियां ने राजनीति का उदार और मानवीय चेहरा देखा, प्रधानमंत्री होते हुए वह विवाह संस्था में शामिल हुए बगैर मां भी बनीं। बहरहाल, ऑस्ट्रेलिया के सन्दर्भ में अच्छी बात ये है कि यहां की महिला राजनीतिज्ञ लैंगिक समानता, स्त्री द्वेष जैसे मसलों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर साथ संघर्ष कर रही हैं इसलिए तमाम नकारात्मक आंकड़ों के बावजूद लगातार उनके रास्ते की बाधाएं कम करने की कोशिशें भी हो रही हैं, इसे ऑस्ट्रेलिया की पूर्व प्रधानमंत्री जूलिया गेलार्ड की इस बात से ख़त्म किया जा सकता है कि, ‘हमारे देश में लिंगभेद पर काम करने की ज़रूरत थी, ख़ुद मैंने इसपर काम किया लेकिन यह सब एक यात्रा का हिस्सा है, जिसमें भविष्य में राजनीति में महिलाओं के साथ ज़्यादा बराबरी का बर्ताव होगा, मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि अगली महिला प्रधानमंत्री और उससे अगली महिला प्रधानमंत्री के लिए इस पद की ज़िम्मेदारी संभालना आसान होगा”।


मनोरमा सिंह बेंगलुरू में पत्रकारिता करती हैं. संपर्क: manorma74@gmail.com| यह लेख इससे पहले स्त्रीकाल में प्रकाशित किया जा चुका है|

तस्वीर साभार : sport24

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