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“सफर”- एक ऐसा शब्द है जिसे मैं अपने जीवन के सबसे सुन्दर वक़्त से जोड़ती हूँ। यह खुशनुमा अनुभव मेरे लिए गर्मियों की छुट्टियों से भरी यादें बनकर आता है। बचपन से लेकर कुछ साल पहले तक हर साल मई-जून के महीनों में मैं अपनी नानी के घर जाती थी। हां! काफी कुछ बदल गया है, लेकिन भावनाएं ज्यों की त्यों है। अपनों के साथ बिताया हुआ समय, भाई-बहनों के साथ मिलकर की गई मस्ती और सब के साथ लड़ाई हुई गप्पें; मैं शायद ही कभी भूल पाऊंगी।

खुरई, मध्य प्रदेश की छोटी-सी तहसील, जिसे यहां के लोग भी नहीं जानते। मुझे आज भी लोगों को बताना पड़ता है कि मेरा ननिहाल बीना और सागर के बीच में आता है। वैसे खुरई मेरा जन्म स्थल भी है। मैंने अपने साथ-साथ इसे भी बड़ा होते हुए देखा है। चूंकि खुरई की अधिकतम आबादी कृषि प्रधान है, लोगों को लगता है कि यहां घूमने-फिरने के लिए कुछ नहीं होगा। पर ऐसा नहीं है। यहां ‘डोहिला’ नाम का एक बहुत बड़ा, प्राचीन और खूबसूरत-सा किला है। इसमें आज भी वही पुराने सरकारी स्कूल चल रहे हैं जिसमें मेरी मां और उनके भाई-बहनों ने पढ़ाई की है। ना सिर्फ स्कूल बल्कि इस किले के अंदर दो विशाल मंदिर भी हैं, जिनकी बहुत मान्यता है। एक प्यारा सा ‘लाल मंदिर’ भी है जिसे जैन धर्म से जोड़ा जाता है। यहां के शरबती गेहूं और कल्टीवेटर उपकरण भी खासे मशहूर है। और हां एक बात और यहां के समोसे!!

शहरी जीवन एकाकी होता है, वहीं ग्रामीण जीवन में एक साथ रहने का मज़ा ही कुछ और है।

समय के साथ-साथ यादें फीकी पड़ जाती हैं लेकिन नाना-नानी की वो कहानियां मेरे मन में आज भी ताज़ा हैं। मुझे याद है कि बचपन में वहां बहुत लाइट जाया करती थी। और तब हम सब एक साथ हॉल में बैठ जाया करते थे। उसके बाद नानी की डरावनी कहानियों और नाना जी की पौराणिक कथाओं का सफर शुरू हो जाया करता था। सच कहूं तो मुझे आज भी डर लगता है। पर वो रातें बहुत मज़ेदार हुआ करती थी। मैंने यह महसूस किया है कि ऐसे वैकेशन में पारिवारिक जुड़ाव और भी मज़बूत हो जाता है।

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सालभर के इंतजार के बाद जब सभी भाई-बहन एक साथ इकट्ठा होकर खेला करते थे, तो सारी थकान एक सेकंड में मिट जाया करती थी। लू चलती गर्मी में बर्फ का गोला खाना, छज्जे पर बैठकर पतंग उड़ाना, पाँच-पाँच रुपये बचाकर कच्ची मैगी खाना, सच में बचपन बहुत ही सुहावना था। जब थक हार कर हम घर लौटा करते थे, तब नानी के हाथ का स्वादिष्ट खाना तैयार रहता था। हालांकि अब नज़ारा कुछ और है। जब खुरई से लौटकर वापस अपने शहर आती थी, तब बहुत रोना आता था। सबसे ज्यादा नाना-नानी की याद आती थी, जो आज भी आती है। वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है। अब हम सब बच्चे बड़े हो गए हैं, अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए हैं। ध्यान से देखा जाए तो हमारे साथ हमारे मां-बाप और नाना-नानी भी बड़े हो गए हैं।

मैंने यह महसूस किया है कि ऐसे वैकेशन में पारिवारिक जुड़ाव और भी मज़बूत हो जाता है।

अब जब कभी खुरई जाती हूं तो घर के कोने हम सब के बिना सूने लगते हैं। वहां का खेल-कूद, दौड़ा-भागी, खाना-पीना और रहन-सहन अब केवल यादों में रह गया है। छुट्टियों के सफ़र से ज़्यादा बचपन के इस सफर ने मेरी ज़िंदगी पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला है। मेरे जीवन की नींव यहीं रखी गई है, मेरे अपनों के द्वारा। राजनीतिक, धार्मिक, मौलिक, सांसारिक व आर्थिक बुनियादी ज्ञान मुझे यहीं से मिला हुआ है। किसी ने सही ही कहा है, जो ज्ञान विरासत में हमें बूढ़े-बुजुर्गों से मिलता है, वह अमूल्य है!

सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो मैंने अनुभव की, वह यह है कि शहरी जीवन से ग्रामीण जीवन बहुत अलग होता है। शहरी जीवन एकाकी होता है, वहीं ग्रामीण जीवन में एक साथ रहने का मज़ा ही कुछ और है। समय के साथ हम भूल चुके हैं कि संयुक्त परिवार की परिभाषा क्या होती है। दुख की बात है कि आगे आने वाली पीढ़ी को यह अनुभव कभी नहीं मिलेंगे। आज भी जब मैं इस शहरी भागम-भाग वाली जिंदगी से थक जाती हूं, तो मुझे नानी के घर जाकर सादगी व आरामदायक दिन गुज़ारने की इच्छा होती है। मैंने समझा है कि जीवन में चाहे जितनी भी यात्राएं करूंगी, यहां से बेहतर कुछ नहीं होगा। वह सफर जिंदगी का सबसे कीमती समय था।

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तस्वीर साभार : roar.media

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