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लड़कियों और औरतों को कमज़ोर, डरपोक, अपवित्र पर निर्भर बताने और बनाने के लिए पितृसत्ता बहुत चालें चलती रही  है।  पितृसत्ता की एक बहुत ही घातक चाल और साज़िश है कि बेटियों को पराया धन माना और कहा जाये, उन्हें बोझ माना जाये।उनके पैदा होने तक को अपशकुन और दुःख की ख़बर माना जाता है। आजीवन उनके साथ भेदभाव किया जाता है। वयस्क होने पर परिवार की सम्पत्ति नहीं दी जाती। लड़कियों का अपना नाम तक नहीं होता।  शादी से पहले पिता का नाम और पिता जब चाहें ‘कन्यादान’ करके गंगा नहा लें। शादी के बाद बेटी अपने नए मालिक, पति, स्वामी, मजाज़ी ख़ुदा की जायदाद और दासी हो जाये। नये मालिक का नाम, घर, तौर तरीक़े और परिवार अपनाने को मजबूर।  

अगर बेटी का अपने परिवार की सम्पत्ति पर कोई अधिकार न हो और न ही स्वनिर्भर होने, खुद कमाकर खाने और रहने के हुनर उन्हें सिखाए जायें तो हर लड़की के लिए शादी ज़रूरी हो जाती है। इस सबके चलते लड़कियों की जड़ें नहीं बन पातीं।  उनमें आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, हिम्मत, हौसला पनप ही नहीं पाता। बिना जड़ों की, पर-जीवी लतायें जीने और खड़े होने के लिये पति रुपी पेड़ ढूंढ़ती रहतीं हैं। सदा दूसरों पर आश्रित। किसी न किसी मर्द के सहारे के बिना वे खड़ी नहीं हो सकतीं, जी नहीं सकतीं। मर्दों के हुकुम बजाने को मजबूर l  स्वराज, स्वतंत्रता, आज़ादी का वे सोच भी नहीं सकतीं।  

निजी सम्पत्ति में पितृसत्ता की जड़ें 

चूँकि लड़कियों और औरतों की अपनी सम्पत्ति नहीं होती, वे खुद औरों की सम्पत्ति बनकर रह जाती हैं। निजी सम्पत्ति और पितृसत्ता का बहुत ही पुराना और पेचीदा रिश्ता है। साम्यवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स व  ऐंगल्स के अनुसार पितृसत्ता की जड़ें निजी सम्पत्ति में हैं। उनका मानना था की कई हज़ार साल पहले, सभ्यता के जन्म से पूर्व जब पूरी धरती सभी इंसानों की थी और सभी बच्चों का पालन  समूह किया करते थे, तब पितृसत्ता, विवाह और परिवार नहीं थे। जब इंसानों ने प्रकृति पर नियंत्रण शुरू किया, ज़मीन पर दावा करना शुरू किया, जानवर पाले और दास बनाये तब यह सवाल उठा कि उनके मरने के बाद यह सम्पत्ति किसकी होगी? इस सवाल का जवाब ही पितृसत्ता और वर्ग व्यवस्था का आधार बना।  पुरुषों को पता ही नहीं होता कि उनके बच्चे कौन हैं। यह सिर्फ़ माँ को पता होता है। पुरुषों को तभी पता लग सकता है जब वे औरतों को बंदी बना लें।  कोई और पुरुष उनके साथ यौन संबंध न बनाएं।  निजी सम्पत्ति के कारण ही पितृसत्ता शुरू हुई। ज़रा ग़ौर से सोचिये, क्या फ़र्क़ है उस प्राचीन आदमी और आज के समाज की सोच में? आज भी बेटी को अपने ही घर में पराये घर की अमानत की तरह पाला जाता है।    

क़ानूनी अधिकार 

भले ही हमें अपने आस पास देखकर ऐसा प्रतीत न हो, पर भारत के संविधान ने महिलाओं को समानता का पूरा हक़ दिया है।  हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) नियम 2005 के अंतर्गत हिन्दू (एवम सिक्ख,बौद्ध और जैन) बेटियों का पारिवारिक सम्पत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना बेटों का। इसके अलावा संयुक्त परिवार में भी सम्पत्ति पर बेटियों के बेटों के बराबर के अधिकार हैं।  साल 2005 के पूर्व शादीशुदा महिलाओं का अपने मायके में (कानूनी रूप से) निवास अधिकार भी नहीं था। क़ानून भी महिलाओं का असल घर ससुराल को ही मानता था। पर साल 2005 में इसको बदला गया और शादी के बाद भी बेटियों को मायके की संपत्ति पर बराबर के अधिकार दिए गए।  माँ  के घर वापस जाने का यह अधिकार विवाह में घरेलू हिंसा से शोषित औरतों के लिए राहत के  रूप में आया। बीना अग्रवाल (जिनके नेतृत्व में 2005 में क़ानून बदलने का अभियान चला) ने केरल में एक शोध किया जिसमें यह सामने आया कि सम्पत्तिहीन महिलाओं में 49 फ़ीसद महिलाएं  घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं और सम्पत्तिवान महिलाओं में ये आंकड़ा सिर्फ़ 6%है। इससे यह साबित होता है कि संपत्ति पर अधिकार न केवल महिलाओं को एक अपमानजनक और हिंसात्मक  विवाह छोड़ने का विकल्प देता है पर उनपर होती हिंसा पर रोक भी लगाता है।   

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चूँकि लड़कियों और औरतों की अपनी सम्पत्ति नहीं होती, वे खुद औरों की सम्पत्ति बनकर रह जाती हैं।

समस्या एक, रूप अनेक 

यह मुद्दा विभिन्न रूपों में हर वर्ग, जाति और धर्म की महिलाओं को ग्रसित करता है। आदिवासी समुदाय की औरतों के लिए जंगल ही जीविका का स्रोत है और क़ानून इन्हें वह अधिकार देता भी है पर विकास के नामपर सरकारें जंगलों की ज़मीन पूंजीवादी कम्पनियों को बेच रहीं हैं।

विधवा महिलाओं का हाल तो सबसे दयनीय है। उनके पास भी पति की सम्पत्ति पर अधिकार है पर ज़्यादातर औरतों को यह पता ही नहीं होता। पता होने पर भी परिवार में निंदा के भय से वे चुप रहती हैं और पुरुष रिश्तेदारों की मेहरबानी पर सारा जीवन काटती हैं। आजकल कई प्रदेशों की सरकारें महिलाओं के नामपर योजनाएं चला रही हैं जैसे कि झारखण्ड में  महिला के नाम से संपत्ति खरीदने पर पंजीकरण शुल्क 1 रुपया हो गया है। मगर ज़्यादातर इन योजनाओं का फ़ायदा महिलाओं तक पहुँचता ही नहीं है। उस ज़मीन पर उनका न नियंत्रण होता है और न ही उन्हें उस भूमि से हुई कमाई का प्रत्यक्ष लाभ होता है। उनका नाम सिर्फ़ टैक्स बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैl  

समाज में महिलाओं का एक खंड ऐसा भी है जिन्हें अभी भी क़ानूनी रूप से बराबरी हासिल नहीं है, जैसे मुसलमान औरतें।इस्लाम वह पहला धर्म था जिसने महिलाओं को तब अधिकार दिये  जब किसी और धर्म ने नहीं दिये। आज शरीयत के हिसाब से बेटियों के पास सम्पत्ति पर अधिकार तो हैं पर बेटों के बराबर नहीं। समस्या यह भी है कि जहाँ क़ानून अधिकार देता भी है तो समाज स्वीकार नहीं करता। हिन्दू लड़कियों को दहेज़ देकर विदा कर दिया जाता है। जो बेटी हिम्मत कर अपना हिस्सा मांग भी ले तो उसे बुरा भला कहा जाता है, समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है, समझा जाता है कि लड़की ने परिवार की नाक कटा दी।  

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संपत्ति स्त्री की भी

दो साल पहले, NDTV की एक पत्रकार राधिका बोर्डिया ने हमें एक आश्चर्यचकित करने वाली बात बताई। अपनी एक कहानी के लिए वे कुछ युवतियाँ ढूंढ रहीं थीं जो कैमरे के सामने यह बतायें कि उनके माता पिता ने उन्हें पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा दिया या नहीं दिया। ताज्जुब की बात यह थी कि पूरे दिल्ली में उन्हें एक भी ऐसी माहिला नहीं मिली। महिला आंदोलन के लम्बे संघर्ष और उससे मिली प्रगति के बाद भी आज की पढ़ी-लिखी, युवतियाँ सम्पत्ति पर अपने अधिकार के बारे में खुलकर बात करने से कतराएं यह जितनी आश्चर्य की बात है उतनी ही निराशाजनक भी है। इस बातचीत ने हमारे मन में सम्पत्ति पर महिलाओं के अधिकार के लिए एक अभियान के बीज बोये। जागोरी व एक्शन एड के साथ मिलकर  संगत ने मई, 2017 में एक दो दिवसीय सम्मलेन का आयोजन किया जिसमें इस मुद्दे पर काम करने वाले 60 शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता ,वकील और डिजिटल मीडिया के प्रतिनिधि शामिल हुए। दो दिन तक हमने साथ बैठकर महिलाओं के सम्पत्ति पर अधिकार के बारे में जमकर बातें कीं, एक दूसरे के काम से सीखा और इस काम को साथ मिलकर किस तरह बढ़ाया जाए इस पर विचार किया। इसी सम्मलेन में जन्म हुआ हमारे सामूहिक अभियान का ‘ Property For Her’ जायदाद औरतों की भी, सम्पत्ति स्त्री की भी।    

संविधान की इज्ज़त और देश की तरक़्क़ी के लिए महिला आंदोलन हर तरह की समानता की बात करता रहा है और करता रहेगा।हमारी ‘सम्पत्ति स्त्री की भी’ अभियान ने जगह-जगह इस विषय पर हो रही चर्चा को आगे बढ़ाया है। हम पहले से चल रहे कार्यक्रमों से सीखकर उन्हें और फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। 

किसी भी बदलाव के लिए समाज की मानसिकता बदलना ज़रूरी है और यह काम अकेले महिलाओं का नहीं है।

हम बदलें तो समाज बदले            

किसी भी बदलाव के लिए समाज की मानसिकता बदलना ज़रूरी है और यह काम अकेले महिलाओं का नहीं है। महिलाओं के समान अधिकारों का लाभ पूरे परिवार और समाज को होता है। शोध से पता चलता है कि महिलाओं के संपत्ति पर अधिकार से परिवार में दरिद्रता की सम्भावना कम होती है और बच्चों का बेहतर भविष्य निर्माण होता है। हमें यह भी भूलना नहीं चाहिए की एक समान परिवार ही एक सुखी परिवार हो सकता है। आज पूरी दुनिया को पता है कि स्त्री-पुरुष समानता के बग़ैर परिवार, समाज और देश तरक़्क़ी नहीं कर सकते।  

अंत में हम एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहते हैं। इस अभियान में हम अधिकारों, क़ानूनों और न्याय से ज़्यादा हमारे अपने सोच और तौर-तरीक़ों को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। देश के संविधान और क़ानूनों ने हमें समानता दे दी है, तो हम फिर हम भारत के नागरिक क्यों पिछड़ रहे हैं? हम क्यों अपने दिलों और परिवारों में समानता नहीं ला पा रहे? क्यों हम अपनी ही बेटियों को नहीं अपना रहे? ऐसी कौन चीज़ है जो आज हमारी बेटियां नहीं कर सकतीं? अब तो वे हर अग्नि परीक्षा दे चुकी हैं और अपनी क़ाबलियत दिखा चुकी हैं l आज हज़ारों बेटियाँ अपने माँ बाप के बुढापे का सहारा हैंl  देवियों को पूजने वाला हमारा देश कब तक बेटियों को मारने वालों में अव्वल आता रहेगा ?

हमें बेटियों को बचाना है, अपनाना है, पढ़ाना है और जायदाद में हिस्सेदार बनाना हैl

अगर हम अपनी बेटियों को प्यार करते हैं तो लगायें ये नारे और बदलें अपने परिवारों और समाजों की तस्वीर —

बेटी दिल में 
बेटी will में 
न दहेज न मँहगी शादी 
बेटी को देंगे सम्पत्ति आधी
”  

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यह लेख कमला भसीन और मीनल मनोलिका ने लिखा है|

तस्वीर साभार : unicef

Kamla Bhasin is an Indian developmental feminist activist, poet, author and social scientist.

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