बचपन में जब राखी का त्यौहार आने को होता तो उसकी तैयारी ही बड़ी उमंग-तरंग भरी हुआ करती थी। तब इस त्यौहार के और इसके नाम (रक्षाबंधन) के उद्देश्य और संदेश के बारे में ज़्यादा नहीं सोच पाती थी। हर त्यौहार की तरह ये भी एक त्यौहार समझ आता, जिसमें भाई को राखी बाँधकर दिनभर मिठाई, पकवान और ख़ूब मस्ती होती।

आज जब इस त्यौहार के उद्देश्य, नाम और मौजूदा समय में इसके सरोकार का विश्लेषण करती हूँ तो बस यही समझ में आता है कि ये त्यौहार भी बेहद जीवंत तरीक़े से लैंगिक भेदभाव और पितृसत्ता को न केवल पोसता है बल्कि इसे आगे बढ़ाने का भी काम करता है। पितृसत्ता जो कि हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था है इसने अपने विचारधारा के तहत हर विशेषाधिकार में पुरुष को केंद्र में रखा है। वहीं, महिलाओं को महज़ एक परजीवी लता की तरह इस्तेमाल किया है। ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता का बोझ सिर्फ़ महिलाओं के माथे पर है। ये पुरुषों को भी उतना ही प्रभावित करता है, जितना महिलाओं को।

इस त्यौहार के पीछे बेशक हमारी सुनहरी संस्कृति के चमकदार क़िस्से है, पर आज जब हम अपने समाज में महिलाओं की स्थिति पर नज़र डालते है तो ये त्यौहार नहीं महज़ एक फ़ैशन मात्र समझ आता है। हो सकता आपको मेरी बात अज़ीब लगे। आपको ये लगे कि मैं क्या बकवास लेकर बैठ गयी। आपकी सारी बात आपके नज़रिए से सही और लाज़मी है। क्योंकि जब भी हम परंपरा, त्यौहार और संस्कृति की बात करते है तो उसमें हम अपनी ज़रा-सी भी तार्किकता या इसके सरोकार पर बात नहीं करना चाहते है। इसके कई कारण भी हो सकते हैं, पर मुख्य ये है ‘हम सभी जानते है कि सच कड़वा है।’

रक्षाबंधन के त्यौहार में बहन अपने भाई की कलाई में बड़े शौक़ से राखी बाँधती है, जो इसबात का सूचक है की बहन की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अब भाई की है। किसी भी तरह की समस्या में भाई उसका साथ देगा, उसे सुरक्षा देगा। ये बात हमने आपने बचपन से सुनी है। यही वजह है कि इस त्यौहार से न केवल इस दिन बल्कि एक लड़की की ज़िंदगी में भाई की अनिवार्यता बढ़ जाती है। मैं ये नहीं कहती कि ये विचार ग़लत है, पर ये ज़रूर कहूँगी कि ये भेदभाव का पोषक है, जो बिल्कुल ग़लत है।

ये त्यौहार भी बेहद जीवंत तरीक़े से लैंगिक भेदभाव और पितृसत्ता को न केवल पोसता है बल्कि इसे आगे बढ़ाने का भी काम करता है।

क्योंकि जब हम लड़की की सुरक्षा या किसी भी समस्या से निपटने की ज़िम्मेदारी बक़ायदा किसी त्यौहार और राखी जैसे किसी सूचक से किसी दूसरे से हाथ देते है तो साफ़तौर पर इसबात को दिखाता है कि लड़की अपनी ज़िम्मेदारी ख़ुद लेने में असक्षम है और वो एक ऐसी वस्तु है जिसे हमेशा सुरक्षा की ज़रूरत है।

वहीं दूसरी तरफ़ ये पुरुषों को दूसरी एक बड़ी ज़िम्मेदारी से लैस कर देता है कि अब उन्हें अपने साथ-साथ अपनी बहन की भी सुरक्षा करनी है। बाक़ी हम और आप इसबात को अच्छी तरह से जानते है कि भाई का बहन के लिए कर्तव्य सिर्फ़ उसकी सुरक्षा तक ही नहीं बल्कि उसकी ज़िंदगी के अहम फ़ैसलों तक होता है। ग़ौरतलब है कि अगर भाई बहन से छोटा है तो उसके लिए ये कर्तव्य वाली बात एक समय तक बोझ होती है और अगर भाई बहन से बड़ा है तो वो शुरुआती दौर से ही इसे अपने विशेषाधिकार के रूप में इस्तेमाल करता है।  

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लाज़मी है ऐसे में बहन एक तरह से परजीवी लता की तरह हो जाती है जिसे अपनी सुरक्षा, जीवन की किसी भी समस्या और अहम फ़ैसलों के लिए उसे अपने भाई पर आश्रित होना होता है, वहीं भाई तमाम विशेषाधिकारों से लैस हो जाता है। स्वाभाविक है कि इससे अपने आप ही बेहद बारीकी से लड़का-लड़की के बीच पितृसत्ता के तहत बोए जाने वाले लैंगिक भेदभाव के बीज की अपनी शाखाएँ मज़बूती से फैलाने लगते हैं। अब ये तो बात हुई रक्षाबंधन के मूल्यों और इससे पनपने वाले भेदभाव के बीज की।  

अब ज़रा ग़ौर करते हैं इसके सरोकार की। मैंने बचपन से लेकर अब तक देखा है की कोई भी ऐसा भाई नहीं होता है जिसकी कलाई में राखी न बंधी हो। फिर चाहे उसकी बहन हो या न हो। अगर उसकी सगी बहन नहीं है तो रिश्तेदार या फिर मुँहबोली बहन उसे राखी बाँधती है। पर ये पक्का है की भाई की कलाई सूनी नहीं रहती है। यानी की हर भाई की एक बहन ज़रूर होती है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ जब मैं बलात्कार, महिला हिंसा, यौन उत्पीड़न, एसिड अटैक या फिर घरेलू हिंसा जैसी तमाम हिंसा को देखती हूँ तो वहाँ मुख्य भूमिका में पुरुष होता है तो महिला को हिंसा पहुँचाता है। यानी वो पुरुष वो किसी लड़की का भाई भी है।

बहन एक तरह से परजीवी लता की तरह हो जाती है जिसे अपनी सुरक्षा, जीवन की किसी भी समस्या और अहम फ़ैसलों के लिए उसे अपने भाई पर आश्रित होना होता है।

ऐसे में सवाल उठता है की क्या राखी की वैधता सिर्फ़ उस भाई-बहन तक सीमित होती है, जिसके अनुसार पुरुष सिर्फ़ उसी लड़की की रक्षा का संकल्प लेता है जिसने उसे राखी बांधी है। पर वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे ढेरों उदाहरण है जहाँ सगे भाई अपनी बहन के दुश्मन बन जाते। कई बार तो महिला सुरक्षा के लिए हमें ये भी सीख दी जाती है की अगर हम किसी पुरुष को भाई कह दें तो महिला को अपनी बहन मान लेता है और उसके साथ किसी भी तरह की कोई हिंसा नहीं करता है। इसबात में कितनी सच्चाई है ये हम महिलाएँ अच्छी तरह जानती है।

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कुल मिलाकर कहने का मतलब ये कि रक्षाबंधन को भले ही हम महिलाएँ बहन की भूमिका में अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बड़े नाजों से मनाए। लेकिन इसका सरोकार से कोई लेना-देना अब नहीं रह गया है। बेशक मेरा भाई किसी मुसीबत में मेरी मदद करता होगा, पर ये भी संभव है कि दूसरे ही पल वो सड़क पर किसी महिला के हिंसा भी करता होगा। इसलिए ज़रूरी है कि अब हम किसी भी परंपरा को सिर्फ़ इसलिए न माने कि ये बरसों से चली आ रही है, बल्कि ज़रूरी है की हम इसका विश्लेषण तर्कों के साथ करें। हम ये तलाशें कि हम इन त्योहारों के माध्यम से अपनी आने वाली पीढ़ी को जो संदेश बता रहे हैं उसे हमारी आने वाली पीढ़ी सरोकार में ओझल पा रही है और उनके साथ एक बड़ा धोखा है।

मैं ये नहीं कहती कि त्यौहार मानना बंद करना चाहिए। पर मैं ये ज़रूरी कहती हूँ कि बदलते समय के साथ उसके संदेश में बदलाव और सरोकार से जुड़ाव को और बेहतर बनाना चाहिए, जिससे हमारी संस्कृति महज़ फ़ैशन के दौर में बाज़ार के मुनाफ़े का एक हिस्सा न बने। बल्कि हमारे-आपके जीवन में भी लैंगिक समानता और संवेदना की सूत्रधार बने।

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तस्वीर साभार : livehindustan

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