FII is now on Telegram
3 mins read

“न समझे हम कुफ़्र को क्या है,
न कुछ हम जानें मुसलमानी।
नज़रों में हमारे मंदिर मस्जिद को एक सा देख,
दुनिया को होती है हैरानी..|”

यह पंक्तियाँ लुत्फुन्नीसा इम्तियाज़ की हैं। लुत्फुन्नीसा उर्दू की पहली ‘साहिबान-ए-दीवान’ थीं अर्थात पहली शायरा, जिनकी किताब प्रकाशित हुईं थीं।

लुत्फुन्नीसा बेग़म का जन्म 1761(1176 हिजरी) में हैदराबाद राज्य के एक अमीर परिवार में हुआ था। महज़ एक साल की उम्र में उनकी माँ चल बसीं और पिता का प्यार उन्हें नहीं मिला, जिनका गहरा ग़म लुत्फुन्नीसा के कईं शेरों में झलकता है। एक निःसन्तान परिवार ने उन्हें प्यार, शिक्षा और सम्मान से पाला। लुत्फुन्नीसा कहतीं है की, बचपन से ही वो “शायराना मिजाज़” की थीं। पर समय के रीत के अनुसार किशोरावस्था में उनका निकाह हुआ हैदराबाद के उर्दू शायर असद अली खान तमन्ना से। अपने शौहर के साथ लुत्फुन्नीसा शेरों शायरी की दुनिया बसाने ही लगी थीं के उनका भी इंतकाल हो गया।

लुत्फुन्नीसा अब बिल्कुल तन्हा और दुख से सराबोर थीं। पर तब प्रख्यात संत शाह अताउल्लाह ने उनको आध्यात्मिकता और सकारात्मकता का दिशा दिखाया। सन्त के प्रेरणा से लुत्फुन्नीसा हज पर गयीं और लौट कर अपना पूरा जीवन धर्म, साहित्य रचना और जनसेवा में उत्सर्ग कर दिया।

दखिनी उर्दू ज़ुबान

उन दिनों, हैदराबाद सहित दक्षिण भारत के राज्यों में उर्दू की एक शाखा जन्म ले रही थी, जो ‘दखिनी उर्दू’ के नाम से प्रसिद्ध हो रहा था। अरबी, फ़ारसी, हिंदुस्थानी उर्दू और दक्षिण के आंचलिक भाषाओं से शब्द एकत्रित होकर यह नई उपभाषा बनी। दक्षिण के तत्कालीन उर्दू शायरों ने इस भाषा में ही साहित्य रच रहे थें। लुत्फुन्नीसा जो इम्तियाज़ छद्मनाम से लिखा करती थीं, दखिनी उर्दू ज़ुबान को अपनी सारी रचनाओं में बखूबी उतारने में सक्षम रहीं।

Become an FII Member

लुत्फुन्नीसा के रचनाएँ

लुत्फुन्नीसा की रचनाओं का विशाल भंडार सिर्फ शेरों में ही सीमित नहीं थीं। उन्होंने उर्दू साहित्य की हर लेखन-शैली को छूकर एक सम्पूर्ण दीवान लिखा, जिनमें 184 ग़ज़लें, 15 रुबाइय्यत, 5 ख़िलात, कईं मक़में , मथनवी, नाद और क़सीदे थीं। गुलशन-ए-शूरा नाम के आठ हज़ार आयतों से बनी एक विशाल मसनवी में लुत्फुन्नीसा सुल्तान फ़िरोज़ बख़्त नाम के काल्पनिक किरदार के अनोखे सफ़रों पर एक बर्णनात्मक लोक-कथा लिखा। 

साल 1796 (1212 हिजरी) में उनकी दीवान किताब के रूप में प्रकाशित हुई थीं। लुत्फुन्नीसा इम्तियाज़ भारतीय उपमहादेश की पहली प्रकाशित कवियत्री मानी जातीं हैं। उनके पांडुलिपि के कुछ हिस्सें हैदराबाद के सलारजंग लाइब्रेरी में संरक्षित की गई हैं।

और पढ़ें : गौहर जान: ‘भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार’ | #IndianWomenInHistory

लुत्फुन्नीसा के लेखन की ख़ासियत

लुत्फुन्नीसा ने ईश्वर और इश्क़ के बारे में जितनी शिद्दत से लिखा। उतनी ही गहराई से लिखा समकालीन समय की समस्याओं और औरतों के जीवन के सुख-दुख, धर्मनिरपेक्षता और प्रकृति के सौंदर्य के बारे में। वो ईद की खुशियों के बारे में लिखतीं हैं तो होली की रंगीनियत के बारे में भी। एक तरफ वो कभी अपनी अल्लाह से दुआएँ मांगतीं हैं तो साथ ही मज़हबों के बेमानी रिवाजों पर अपना ऐतराज़ जतातीं हैं। उनकी लेख में अक्सर बहोत बारीकियों से प्रकृति और रोजमर्रा के ज़िंदगी का चित्रण देखने को मिलता है। पर इन सब के बीच सामाजिक और धार्मिक विषयों पर तरह-तरह की छंदों की प्रयोग से लिखी हुई गज़लों और नज़्मों में लुत्फुन्नीसा के अंदर की शायरा सबसे बेहतर तरीके से निखरकर आई हैं।

इम्तियाज़ छद्मनाम ग्रहण करने की वजहें

लुत्फुन्नीसा बेग़म ने एक ऐसे वक़्त में क़लम और स्याही का साया लिया जब हिन्दू और मुसलमान दोनों समाजों में आम औरतों की साक्षरता के लिए कोई तिनका-सा आयोजन तो दूर की बात, कोई सोच तक नहीं था। ऐसी असम्भव समय में इस शायरा को अपनी रचनाएँ प्रकाशित करने के लिए एक पुरुष छद्मनाम को अपने साथ जोड़ना पड़ा।

लुत्फुन्नीसा अपनी सशक्त लेखनी से तमन्ना, तज्जली, एहसान, शौक़, शादान और महम्मद क़ुली क़ुतुब शाह जैसे मानी और नामी समकालीन दखिनी उर्दू शायरों के ना ही सिर्फ बराबरी में खड़ी रहीं बल्कि अपनी अलग पहचान और रुतवा कायम करने में भी सक्षम रहीं। उनके लेख के आखिर में रचयिता के तौर पर इम्तियाज़ नाम के उल्लेख रहने के कारण लम्बे वक़्त तक उन्हें ऐतिहासिकों ने एक शायर समझा। पर एक मसनवी के अंत मे ‘कनीज़’ शब्द के इस्तेमाल के कारण अनुसन्धान करते हुए शोधकर्ता उनकी असली शख्शियत को गुमनामी के अंधेरे से वर्तमान पाठकों के सामने लाने में समर्थ हुए।

लुत्फुन्नीसा इम्तियाज़ की रचनाओं में इसलामी रहस्यवाद का गहरा छाप वक़्त के साथ बढ़ता गया। उनके जीवन के आख़िरी पर्व और रचनाओं के सम्पूर्ण तथ्य अभी भी हमारे सामने अस्पष्ट हैं। पर इतना निश्चित है कि अपनी मौलिक सोच और रचनाओं के उत्कृष्टता और विविधता के नज़रिये से वो 18 वी और 19 वी सदी के मशहूर दखिनी उर्दू शायरा माहलक़ा बाई चंदा और बेग़म सुगरा हुमायूं मिर्ज़ा की सफल अग्रगामी रहीं थीं।

भारतीय साहित्य और उर्दू सहित देशज भाषाओं में युगों से राज कर रही पितृसत्ता रूढ़िवाद को अपनी लेखन के माध्यम से कुछ हद तक निकाल कर आनेवाली कईं शताब्दी की महिलाओं के लिये सृजनपथ खोलने का प्रथम श्रेय साहिबान-ए-दीवान लुत्फुन्नीसा इम्तियाज़ को ज़रूर मिलता रहेगा।

और पढ़ें : गिरिजा देवी: ममतामयी व्यक्तित्व वाली महान शख्सियत


तस्वीर साभार : kamalp.blogspot

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

1 COMMENT

Leave a Reply