रमेश बहुत ही खुले विचार का इंसान था। जब उसकी पहली संतान बेटी पैदा हुई तो वो ख़ुशी से फूले नहीं समा रहा था। बेटी के जन्म के दूसरे ही महीने से उसने बेटी की शादी के पैसे जमा करने शुरू कर दिए थे। उसका और उसकी पत्नी का एक ही सपना था कि वो अपनी बेटी की शादी किसी अच्छे घर में धूमधाम से करे। बचपन से ही उन्होंने अपनी बेटी को नाजों से पाला और उसकी हर फ़रमाइश पूरी की। बेटी एक अच्छी बहु बने और ससुराल जाकर अपने माता-पिता का नाम रौशन कर, इसे ध्यान में रखकर उसका लालन-पालन किया गया। इंटर करने के बाद पढ़ाई में अव्वल बेटी ने बीटेक के कोर्स में जाने-माने कॉलेज में एडमिशन लिया। बीटेक के बाद वो अपने स्टार्टअप प्लान पर काम करना चाहती थी।

इसी दरमियान उसे अमेरिका में एक नौकरी का ऑफ़र मिला, जिसे उसने ठुकरा कर अपने स्टार्टअप प्लान पर काम करने का तय किया। उसने नौकरी के इस ऑफ़र को तो ठुकरा दिया, लेकिन इस ऑफ़र के चलते उसके लिए एक अच्छी शादी का रिश्ता आ गया। बस फिर क्या था, माता-पिता ने बेटी के स्टार्टअप प्लान में मदद करने से मना कर दिया और जीवनभर की अपनी जमा पूँजी बेटी की शादी धूमधाम से करने में झोंक दी। शादी के बाद बेटी ससुराल में है और हर दिन अच्छी बीवी, बहु और औरत होने का फ़र्ज़ अदा कर रही है। रमेश को अपनी बेटी पर गर्व है और वो हर बार कहते हैं ‘मैंने बेटी को बिना किसी भेदभाव के बेटे की तरह पाला। उसके सारे शौक़ पूरे किए।’

‘अब तो कोई भेदभाव नहीं होता।’

अगर हम और आप अपने जीवन या फिर आसपास नज़र डालें तो ऐसे ढेरों रमेश से मुलाक़ात हो जाएगी। अपने समाज में ये कहानी हर उस घर में आम है जहाँ लड़की का जन्म होता है। कहने को समय बदला है। हम कहते हैं की लड़का-लड़की में कोई फ़र्क़ नहीं हो रहा है। आज लड़कियाँ, लड़कों के साथ हर क्षेत्र में क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ रही है। अब कहाँ कोई भेदभाव होता है……वग़ैरह-वग़ैरह।

बेशक आज महिलाएँ हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी दर्ज कर रही हैं, लेकिन ख़ुद का बिजनेस शुरू करने के क्षेत्र में आज भी उनकी भागीदारी न्यूनतम है। आख़िर ऐसा क्यों? हम लाख ये कहें कि अब हम भेदभाव नहीं करते। पर वहीं दूसरी तरफ़ हम इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ सकते हैं कि आज भी हम बेटी के किसी बिज़नेस प्लान पर ख़र्च करने की बजाय उसकी शादी में ज़्यादा ख़र्च करना पसंद करते है। आज भी बेटी के पैदा होते ही उसकी शादी के नामपर पैसे जमा करना हमें ज़्यादा भाता है। ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ तक तो हम सालों से सोच रहे हैं, लेकिन पढ़ने के बाद बेटी को ब्याहों या ज़्यादा से ज़्यादा नौकरी कराओ यहीं तक हमारी हम सीमित है।

आज भी हम बेटी के किसी बिज़नेस प्लान पर ख़र्च करने की बजाय उसकी शादी में ज़्यादा ख़र्च करना पसंद करते है।

बेटी की बनाई गोल रोटी शान की बात है उसकी डिग्रियाँ नहीं?

बेटी की शादी धूमधाम से करना, ये सपना हर दूसरे माता-पिता का होता है। बचपन से ही उसे आशीर्वाद में भी यही कहते हैं – ‘ख़ूब अच्छा ससुराल मिले।’ या फिर बेटी के अच्छे नम्बर लाने या किसी प्रतियोगिता में जीतने पर उतनी ख़ुशी और शान ज़ाहिर नहीं की जाती जितना गुणगान घर संभालने के हुनर में निपुण होने या गोल रोटी बनाने पर ज़ाहिर होती है।

हो सकता है आपको एकपल के लिए ये बातें स्वाभाविक लगें। तो ऐसे में आप बेटी की जगह अपने बेटे को रखकर देखिए। बेटा अगर गोल रोटी बना दे तो उसपर ‘नाक कटने वाली बात’ आ जाती है। वहीं अगर बेटा किसी प्रतियोगिता में तीसरा स्थान भी लाए तो बड़े शान की बात होती है। ख़ैर, मैं यहाँ इमोशन के आधार पर नहीं बल्कि तर्कों के आधार पर बात कर रही हूँ। इसलिए बातों को व्यवहारिक परिपेक्ष्य में तार्किक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करिएगा।

इस बात से आप भी सहमत होंगें कि महिला अगर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होतो बहुत की कठिनाइयों का सामना कर सकती है। तो क्यों न बेटी की शादी की बजाय उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए पैसे जोड़े जाएँ। महँगी शादी पर आपको वाहवाही सिर्फ़ एक़बार सुनने को मिलेगी पर यक़ीन मानिए अगर आप बेटी का कोई बिज़नेस सेट करते हैं तो आपकी ज़िंदगी के बाद भी आपकी वाहवाही की जाएगी।

और पढ़ें : ‘शादी करूँ या न करूँ ये मेरी मर्जी है’

बेटी के स्टार्टअप प्लान पर हो ज़्यादा ख़र्च, न की उसकी शादी में

लैंगिक समानता के नामपर आज हम शिक्षा के मायने में थोड़ा आगे आए है लेकिन लड़की के नामपर आर्थिक परिपेक्ष्य में आज भी हम अच्छी शादी तक सीमित है। आख़िर क्यों बेटी का स्कूल में टॉप करना, जश्न का विषय नहीं बनता? क्यों अच्छी यूनिवर्सिटी में बेटी का दाख़िला और उसकी पढ़ाई शान का विषय नहीं है? समाज में बेटी का बढ़ता नाम क्यों परिवार के सदस्यों को गौरवान्वित नहीं करता? या फिर बेटी का बिज़नेस सेट करना क्यों हमारे घर-समाज में लोगों को खटकता है? ये ऐसे सवाल है जिसपर हमने गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है।

बेटियों को बचपन से ही आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए तैयार कीजिए और उन्हें एहसास दिलाइए कि आपने बेटी के नामपर पूँजी उसकी शादी के लिए नहीं बल्कि उसके बेहतर भविष्य के लिए जमा की है।

संविधान में भी आप सम्पत्ति में लड़का और लड़की के बराबर अधिकार की गयी है। पर ज़मीनी हक़ीक़त क्या है इससे हम और आप अच्छी तरह वाक़िफ़ है। ऐसा क्यों है इसे भी समझना ज़रूरी है। जब हम सम्पत्ति में बेटी के अधिकार की बात करते है तो हमेशा शादी के बाद उस अधिकार की कल्पना करते है, जो इस क़ानून को सरोकार से न जुड़ने देने का प्रमुख कारण है। अब जब महँगी शादी के बाद संपत्ति में अधिकार ही बात होगी तो गले से ये बात कैसे उतरेगी भला? इसके लिए हमें अपने सपने में थोड़ा फेर बदल करने की ज़रूरत है। पैसे की बचत ज़रूर की जाए, इसलिए नहीं कि बेटी की शादी करनी है, बल्कि इसलिए कि बेटी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। अपने घर-परिवार-समाज से लड़कर आप बेटी को शिक्षा में बराबरी दिलाने के लिए इतनी मेहनत करते हैं तो बेटी के मेडल, उपलब्धियों और डिग्रियों को शादी भी भारी-भरकम एलबम और वीडियो के सामने कैसे भूल सकते हैं भला?

इसलिए बेटियों को बचपन से ही आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए तैयार कीजिए और उन्हें एहसास दिलाइए कि आपने बेटी के नामपर पूँजी उसकी शादी के लिए नहीं बल्कि उसके बेहतर भविष्य के लिए जमा की है।

और पढ़ें : मेरी कहानी – लड़की का मायना सिर्फ शादी ही नहीं


तस्वीर साभार : shaadisaga

Leave a Reply