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बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी एक़बार फिर सुर्खियो में है। पिछली बार की तरह इसबार भी मामला यौन उत्पीड़न का है। बीते दिनों बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग के एक प्रोफेसर पर छात्र-छात्राओं ने छेड़खानी और अभद्र व्यवहार करने का आरोप लगाया था। विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति ने इन आरोपों को जांच में सही पाया और आरोपी प्रोफेसर पर कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा की। स्टूडेंट्स का आरोप है कि प्रशासन ने बिना किसी कार्रवाई के प्रोफेसर को दोबारा शैक्षणिक ज़िम्मेदारियां सौंप दी हैं।

ग़ौरतलब है कि छात्राओं से छेड़छाड़ को लेकर विगत सालों में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में कई विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। लेकिन इनके बावजूद ऐसे मामले के प्रति प्रशासन का उदासीन रवैया बदलता नहीं दिख रहा है। बेशक पिछले विरोध प्रदर्शन के बाद विश्वविद्यालय में व्यवस्थागत सुधार तो किए गये, लेकिन नीयत में कोई सुधार नहीं किया गया।

हाल ही में सामने आया मामला जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एसके चौबे से संबंधित है। प्रो चौबे को छात्राओं के साथ अश्लील हरकतें, अभद्रता और भद्दी टिप्पणियों का दोषी पाए जाने और जांच कमेटी ने कठोरतम कार्रवाई के आग्रह के बावजूद बहाल कर दिया गया है। ऐसा तब हुआ है जब छेड़खानी के मामले में ढीले रवैया अपनाने के चलते पिछले कुलपति को जबरन छुट्टी पर भेजना पड़ा था और बीएचयू कैंपस को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने के लिए किया गया छात्राओं का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था।

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जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एसके चौबे

क्या था ये पूरा मामला ?

अक्टूबर 2018 में जंतु विज्ञान विभाग के बीएससी के पांचवे सेमेस्टर के छात्र-छात्राओं ने कुलपति को पत्र लिखकर प्रो चौबे पर एक शैक्षणिक यात्रा छात्राओं के साथ शारीरिक छेड़खानी और अश्लील हरकतें करने का आरोप लगाया था और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।

छात्र-छात्राओं का यह समूह 3 अक्टूबर से 9 अक्टूबर 2018 तक प्रो चौबे के साथ भुवनेश्वर की शैक्षणिक यात्रा पर थे। इस यात्रा से लौटने के बाद 13 अक्टूबर को प्रो चौबे के बर्ताव को लेकर यह सामूहिक शिकायत की गई थी। शिकायत के अनुसार, स्टूडेंट्स ने बताया कि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क जाकर जंतुओं के विषय में अध्ययन करना था, लेकिन प्रो चौबे पार्क में बहुत कम समय देकर सभी को कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर ले गए। वहां जाकर उन्होंने परिसर की प्रतिमाओं की यौन भाव-भंगिमाओं के बारे में बताना शुरू किया, जिससे सभी असहज हो गए।

स्टूडेंट्स का कहना है कि साथ ही उन्होंने समूह के साथ चल रहे गाइड को ‘मेन पॉइंट’ पर आने के लिए बोला, जिससे उनका आशय यौन क्रियाओं की बातों से था। छात्र-छात्राओं ने यह भी आरोप लगाया था कि शिकायत करने की स्थिति में प्रोफेसर की तरफ से प्रैक्टिकल में कम नंबर देने की धमकी भी दी जाती है।

अब प्रशासन को यह गाँठ बाँध लेना चाहिए कि स्टूडेंट्स अब किसी भी तरह की हिंसा और अन्याय पर चुप नहीं बैठने वाले है।

छात्र-छात्राओं का कहना है कि प्रो चौबे पर सालों से इस तरह के आरोप लगते आए थे। इस मामले को तूल पकड़ता देख तब कुलपति राकेश भटनागर ने इस शिकायत को विश्वविद्यालय की इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) को जांच के लिए सौंप दिया था। कुलपति ने यह आश्वासन भी दिया गया था कि दोष साबित होने पर आरोपी खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।

इसके बाद 25 अक्टूबर 2018 लेकर 30 नवंबर 2018 तक आईसीसी ने इस मामले की जांच की और जहां कमेटी ने सभी पीड़ितों, गवाहों, आरोपी, विभागाध्यक्ष, पूर्व विभागाध्यक्षों और मामले से जुड़े हुए लोगों से बात की है। डेढ़ दर्जन से ऊपर शिकायतकर्ताओं, गवाहों और दस पूर्व विभागाध्यक्षों, शिक्षकों, कर्मचारियों से बात करने के बाद कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें उसने प्रो चौबे पर लगे आरोपों सिद्ध पाया। कमेटी की जांच में यह भी सामने आया कि प्रो चौबे छात्राओं के साथ अश्लील हरकतों के आदी हैं और लंबे समय से ऐसा करते आ रहे हैं।

आईसीसी रिपोर्ट के अनुसार छात्राओं की आपबीती प्रो चौबे के व्यवहार पर सवालिया निशान खड़े करती है। रिपोर्ट में एक पहली शिकायतकर्ता ने बताया कि प्रो चौबे अक्सर शारीरिक बनावट को लेकर कमेंट करते थे और क्लास में महिलाओं के रिप्रोडक्टिव सिस्टम और जननांगों को लेकर बातें करते थे। उक्त विषय प्रो चौबे का न होने के बावजूद भी वे जानबूझकर ऐसी चर्चा करते थे, जो हम लोगों को बेहद असहज करता था।’

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आरोप है कि आपाधापी में स्टूडेंट्स को न्याय दिलाने का आश्वासन गुस्सा शांत कराने का एक हथकंडा मात्र निकला और सभी आरोपों में दोषी पाए गए आरोपी प्रोफेसर के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की अनुशंसा की रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए प्रो चौबे को विश्वविद्यालय आने की अनुमति दे दी गई।

बेशक पिछले विरोध प्रदर्शन के बाद विश्वविद्यालय में व्यवस्थागत सुधार तो किए गये, लेकिन नीयत में कोई सुधार नहीं किया गया।

छुट्टी पर भेजे गये प्रोफ़ेसर

ये पहली बार नहीं है जब बीएचयू में छात्राएँ यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर है। इससे पहले भी साल 2017 में छात्राओं ने यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया था और उनकी आवाज़ पूरे देश में गूँजी थी। नतीजतन विश्वविद्यालय में व्यवस्थागत स्तर पर कई सुधार किए गये। इससे यह उम्मीद जगी थी कि शायद अब प्रशासन ऐसी घटनाओं पर गंभीरता और संवेदनशीलता से काम करेगा, लेकिन मौजूदा मामले से साफ़ है कि अभी भी प्रशासन की नीयत जस की तस है।

उल्लेखनीय है कि देर रात प्रशासन की तरफ़ से यह घोषणा की गयी कि आरोपी प्रो चौबे को लंबी छुट्टी पर भेजा जा रहा है। पर अब सवाल ये है कि क्या छुट्टी पर भेजा जाना काफ़ी है? वो भी तब जब सभी आरोप साबित हो चुके है। साफ़ है हर बार की तरह प्रशासन ने अपनी नीयत के अनुसार प्रतीकात्मक रूप से स्टूडेंट्स को ठगने का प्रयास किया है। इसलिए अब प्रशासन को यह गाँठ बाँध लेना चाहिए कि स्टूडेंट्स अब किसी भी तरह की हिंसा और अन्याय पर चुप नहीं बैठने वाले है। बाक़ी बदलाव तो एक़बार फिर प्रशासन और फ़ैसलों में होना तय है।

बीएचयू के स्टूडेंट्स की एकता और संघर्ष को सलाम।

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तस्वीर साभार : theprint.in

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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