अकादमिक संस्थानों में ICC यानी इंटरनल कंप्लेण्ट्स कमिटी का मुख्य काम यौन-उत्पीड़न की शिकायतों को दबाने का होता जा रहा है। ऐसे ही लड़कियाँ निराश रहती हैं कि कुछ होना-जाना तो है नहीं इसलिए लिखित शिकायतें दर्ज करने से बचती हैं ताकि शोषण के साथ थोड़ा-बहुत चैन से जी लें बजाय इसके कि शिकायत डालकर जीवन को नरक बना लें और करियर तबाह कर लें। उसपर से जो लड़कियाँ शिकायत करें उन्हें पूरा संस्थान दबाने में लग जाता है, अक्सर घरवाले भी। घर की और संस्थान की इज़्ज़त और साख नहीं बिगड़नी चाहिए। इसलिए नासमझ लड़कियों के ख़िलाफ़ पितृसत्ता को एक होना पड़ता है। आपको यकीन नहीं इसका मतलब आपने अपने यहाँ आईसीसी की किसी अध्यक्ष महिला को उस कलीग पुरुष  की नौकरी पर मंडराते खतरे को सोचकर रोते हुए नहीं देखा जिसने स्टूडेंट को अपने साथ सोने के लिए दबाव बनाया था। बेचारा कैसे घर चलाएगा अगर नौकरी चली गई? या फिर प्रिंसीपल से लेकर चपरासी को उस लड़की के पाँव पर दया की भीख के लिए गिरे हुए नहीं देखा होगा जिसने आईसीसी के रवैयेसे तंग आकर FIR लिखवा दी थी।इंटरनेट पर खबरें और शोध पर्चे पढिए – यह अकादमिक जगत में अब एक कल्चरल प्रॉब्लम की तरह देखा जा रहा है।

वूमन स्टडीज़ के कोर्स में महिलाओं को ही तमीज़ और हद में रहना सीखना हो तो ऐसे कोर्स बंद ही हो जाने चाहिए, जोकि हो भी रहे हैं। यही तो मकसद भीहै। कल ही एक और विद्यार्थी ने मुझे बताया कि उत्तर प्रदेश के एक संस्थान में वे लोग वूमन स्टडीज़ के परास्नातक कोर्स का आखिरी बैच बन गए हैं क्योंकि अध्यापक लगातार कहते हैं कि इसका कोई स्कोप तो है नहीं, क्यों ले लेते हो?

अपना नाम न बताने की शर्त के साथ एक स्टूडेंट ने मुझे अपने संस्थान का यह सच लिख भेजा है। बहरहाल, आप पढिए इसे और सोचिए कि जेण्डर स्टडीज़ का या कहिए देश के शिक्षण संस्थानों में जेण्डर-बराबरी का सच क्या है? – सुजाता 

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किनके और कितने सच लिखूँ ?

हमारा संस्थान एक ऐसा संस्थान है जहाँ पहुँचना अपने आप में बहुत बड़ी बात मानी जाती है। न सिर्फ कैरियर के दृष्टिकोण से बल्कि आदर्शों के भी नजरिये से। मैं भी जब बहुत से संघर्षों के बाद इस संस्थान में पढ़ने आई तो लगा कि मेरे सपनों को पंख लग गए हैं, थोड़ी खुशी तो इस बात की भी थी कि लंबे समय से जारी जो निजी संघर्ष (जो अपने आप में निजी नहीं हैं, पूरी तरह से पितृसत्ता की देन हैं) थे, वे किसी मोड़ पर आकर आसान हुए हैं। मग़र जल्दी ही संस्थान ने एहसास करा दिया कि पितृसत्ता एक छोटे शहर के एक छोटे मोहल्ले में समाई संस्कृति भर नहीं है बल्कि इस संस्थान ने उसे प्रगतिशील मूल्यों के साथ इस तरह से मिला दिया है कि आपको समस्याएं महसूस तो होंगी मग़र दिखाई नहीं देंगी।

सबसे पहले उन प्रोफेसरों की बात करूँगी जिन्होंने मुझे ये समझाया कि पितृसत्ता का जो देशी खाका हमने अपने मनमस्तिष्क में बिठा रखा है, वो धरातल पर कुछ और है। इस बात के लिए थोड़ा शुक्रिया अदा अभिनेता अक्षय कुमार का किया जाना चाहिए जिनकी फिल्मों ने ये प्रचारित किया कि पितृसत्ता कम पढ़े लिखे कुछ पिछड़े लोगों में प्रचलित कुसंस्कृति भर है जिसका प्रतिकार एक उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति (जो मर्द ही होगा) सहज रूप से कर सकता है। पर उच्च संस्थानों से उच्च शिक्षा पाईं ये शिक्षिकाएं जब अपनी छात्राओं से ये कहती हुई पाई जाती हैं कि उनके साथ होने वाला यौन दुर्व्यवहार उनके छोटे कपड़ों और पुरूष साथियों के साथ उनके हँसने बोलने के कारण होता है, तो मन में एकबारगी यही ख़्याल आता है कि वे ऐसी बलात्कारी समर्थक मानसिकता लेकर समाजशास्त्र के विषयों के साथ कैसे न्याय कर पा रही हैं? या फिर मुझे उन महोदया का नाम लेना चाहिए जो अनुशासन के नाम पर लड़कियों के सूने गले और उनकी उभरी छातियों को देखने लगती हैं? या फिर उनका ज़िक्र करूँ जो विचारों की भिन्नताओं की स्वीकार्यता की अवधारणा सिखाते सिखाते बलात्कारियों से सहानुभूति रखना सिखाने लग जाती हैं।

वूमन स्टडीज़ के कोर्स में महिलाओं को ही तमीज़ और हद में रहना सीखना हो तो ऐसे कोर्स बंद ही हो जाने चाहिए, जोकि हो भी रहे हैं।

ख़ैर। कुछ लोग जहाँ पितृसत्ता के पक्ष में सीधे सीधे खड़े नज़र आते हैं, वहीं कुछ लोग उसके मूक दर्शक बनकर उसको हवा देने का काम करके पितृसत्ता को संस्थानिक बनाये रखने में अपना पूरा सहयोग कर रहे हैं। वे बार बार उन छात्र छात्राओं को रोकते हैं, जो किसी भी रूप में व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं। जो मौजूदा राजनीतिक माहौल से इतर जाते हुए अपनी राय रखते हैं। ये लोग मतभिन्नता की बात तब तक स्वीकारते हैं जब तक छात्र-छात्राओं द्वारा दी हुई राय लोकप्रिय मत से मेल खाती हों, वरना वे जिस समाज के भिन्न भिन्न स्वरूपों को कोर्स के जरिये समझा रहे होते हैं, उसी भिन्नता को उसी पल तुरंत ख़ारिज कर देते हैं जब वे भिन्नताएं ‘स्टेटस को’ पर सवाल खड़ी करती हुई मिलती हैं।

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पर ऊपर लिखी हुई सभी बातों को अगर आप संस्थान की पितृसत्तात्मक मानसिकता के छोटे मोटे उदाहरण मान रहे हैं तो आपको ये बता दूँ कि इस संस्थान की आईसीसी (विशाखा गाइडलाइन्स एवं PoSH, prevention of sexual harassment एक्ट के तहत बनाई गईं आंतरिक शिकायत समिति) अपने सामने आने वाली शिकायतों को ठीक वैसे ही सुलझाती है, जैसे मौजूदा सरकार स्त्रियों के पक्ष में कोई कदम उठाती है। यानी किसी भी यौन दुर्व्यवहार के मामले में महिला को ही दोषी ठहराना, पुरुषों का बचाव करना और महिला पर इस तरह से मनोवैज्ञानिक दबाव डालना ताकि वो अपनी शिकायत को कहीं बाहर न ले जा सके। वैसे भी मीटू अभियान की सभी आलोचनाओं में सबसे बड़ी आलोचना ‘भीड़ के इंसाफ’ की मानसिकता के बनने और ‘ड्यू प्रॉसेस’ की अवहेलना को लेकर उठने वाली चिंता थी, तो वे लोग जो बार बार लड़कियों को कानून के ढांचे में रहकर भिन्न भिन्न संस्थानों के पास जाकर शिकायत करने की सलाह दे रहे थे, वे साफ साफ देख लें किस प्रकार औरतों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनी हुई समितियां उन्हें ही अपने प्रति होने वाले अपराधों के लिए कसूरवार ठहरा रही हैं।

वरना ये बात तो प्रत्येक महिला जानती है कि उसे अपनी शिकायत को बाहर ले आने से भी न्याय नहीं मिलने वाला। या तो वो अपने परिवार समेत किसी ट्रक से कुचली जाएगी या फिर आरोपी के खिलाफ अहम सबूत इकट्ठा करके भी वो खुद ही पुलिस के निशाने पर रहेगी। और बलात्कारी पुरुषों का क्या होगा, इसका भी उदाहरण सामने है। आलोकनाथ, नाना पाटेकर जैसे अभिनेता और एमजे अकबर जैसे राजनेता अपनी अपनी जगह पर बने रहेंगे और सब कुछ वैसे ही चलता रहेगा जैसे पहले था।

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यह लेख इससे पहले चोखेरबाली ब्लॉग में प्रकाशित किया जा चुका है।

तस्वीर साभार : indiatoday.in

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