समाजकानून और नीति महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित भारतीय पुलिस कैसे करेगी महिलाओं की सुरक्षा?

महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित भारतीय पुलिस कैसे करेगी महिलाओं की सुरक्षा?

गैर सरकारी संस्था कॉमन कॉज ने सीएसडीएस और लोकनीति के साथ मिलकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जो भारतीय पुलिस में जेंडर की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

वैसे तो किसी भी कार्यक्षेत्र में महिलाओं के साथ भेदभाव की घटना आम बात है लेकिन जब यही भेदभाव उन एजेंसियों में भी होने लगे जिनपर ऐसे भेदभाव के खिलाफ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है तो फिर स्थिति औऱ चिंताजनक बन जाती है।

एक गैर सरकारी संस्था कॉमन कॉज ने सीएसडीएस और लोकनीति के साथ मिलकर स्टेट्स ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित किया है जो भारतीय पुलिस में जेंडर की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार पुलिस विभाग में कामकाज के बंटवारे को लेकर पूर्वाग्रह देखा जाता है और अधिकतर महिलाओं को पुलिस थाने के भीतर ही काम दिये जाते हैं। महिला पुलिसकर्मी को फील्ड में भेजने और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने जैसे अहम जिम्मेदारी नहीं सौंपे जाते बल्कि उन्हें कमतर समझने वाले काम दिये जाते हैं मसलन, रजिस्टर में इंट्री करना आदि।

इस रिपोर्ट में रिसर्चरों ने 21 राज्यों के 105 जगहों पर तैनात 11,834 पुलिसकर्मियों से बात करके रिपोर्ट तैयार किया है। रिपोर्ट के अनुसार हर चार में से एक मर्द पुलिसकर्मी महिलाओं को लेकर बुरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रसित है और महिला विरोधी विचार रखता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महिला पुलिसकर्मी पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले जेंडर को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं।

इतना ही नहीं, रिपोर्ट में पुलिस सेवा में महिलाकर्मियों के कम प्रतिनिधित्व पर भी चिंता जाहिर की गयी है। रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस में महिलाओं की संख्या सिर्फ और सिर्फ 7.28 फ़ीसद है। जाहिर सी बात है कि इतने कम प्रतिनिधित्व की वजह से पुलिसकर्मियों में जेंडर पूर्वाग्रह और भेदभाव का सामना करना पड़ता है और यह भेदभाव सिर्फ महिला पुलिसकर्मियों को ही नहीं बल्कि सामान्य महिलाओं को जिन्हें पुलिस के साथ संवाद करना पड़ता है उन्हें भी झेलना पड़ता है।

पुलिस विभाग में कामकाज के बंटवारे को लेकर पूर्वाग्रह देखा जाता है और अधिकतर महिलाओं को पुलिस थाने के भीतर ही काम दिये जाते हैं।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि यहां तक कि भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी जैसे वरिष्ठ पदों पर काम करने वाली महिलाओं को भी इन जेंडर आधारित भेदभावों का सामना करना पड़ता है। सर्वें रिपोर्ट में सामने आया कि पुरुष पुलिसकर्मियों में यह धारणा थी कि महिलाओं को घर के कामों में ध्यान देना चाहिए। पांच में से एक महिला पुलिसकर्मी ने माना कि थाने में उनके लिये अलग से टॉयलेट तक नहीं है। कई पुलिस थानों में तो यौन शोषण से जुड़े मामलों के लिये कानूनी रुप से अनिवार्य शिकायत समिति ही नहीं बनायी गयी है।

और पढ़ें : भारतीय राजनीति में कब बढ़ेगी महिलाओं की भागीदारी?

महिलाओं और ट्रांसजेडर समुदाय को लेकर पुलिसकर्मियों के पूर्वाग्रह जगजाहिर हैं ही। इस रिपोर्ट में शामिल आठ फ़ीसद पुलिसकर्मी का मानना था कि ट्रांसजेंडर सुमदाय की अपराधिक प्रवृति ही होती है।

महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं होने की वजह से पुलिसकर्मी महिला मामलों को भी न्यायपूर्ण तरीके से डील नहीं कर पाते। इस रिपोर्ट में इस बात की तरफ इशारा किया गया है कि महिला पुलिसकर्मियों के साथ न्यायपूर्ण और बराबरी का व्यवहार करके महिलाओं के प्रति पुलिसकर्मियों के स्टिरियोटाईप/पूर्वाग्रहों को खत्म या कम किया जा सकता है। महिलाओं के पुलिस सेवा में मजबूत दावेदारी से महिलाओं के प्रति होने वाले हिंसा और अपराध को भी कम किया जा सकता है और आम जनता के साथ बेहतर रिश्ते पुलिस के बनाये जा सकते हैं। 

महिला पुलिसकर्मी पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले जेंडर को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं।

कई रिपोर्ट बताते हैं कि महिला पुलिसकर्मी आम जनता के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं और वे उनके साथ क्रूर या बर्बर व्यवहार नहीं करती हैं। महिलाओं को लेकर वैसे तो ज्यादातर कार्यक्षेत्र में भेदभाव किया जाना आम बात है लेकिन पुलिस में इस भेदभाव की वजह से अन्य महिलाओं के मामलों में भी न्याय नही मिलने का खतरा बढ़ जाता है। वहीं महिला पुलिसकर्मियों के लिये रेगुलर शिफ्ट का न होना, उन्हें विकली या रेस्ट लीव का न मिलना, उनके लिये टॉयलेट जैसी सुविधा का नहीं होना या फिर यौन हिंसा के मामले में शिकायत समिति का नहीं होना एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है।

वैसे तो पूरे पुलिस क्षेत्र में ही रिफॉर्म करने की जरुरत है लेकिन महिला पुलिसकर्मियों और पुरुष पुलिस का महिला मामलों को लेकर पूर्वाग्रह बेहद खतरनाक ट्रेंड की तरफ ईशारा करता है, जहां महिलाओं के लिये कानून से सुरक्षा ले सकना एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।

और पढ़ें : उन्नाव बलात्कार : क्योंकि वह इंसाफ मांग रही थी इसलिए निशाने पर थी


तस्वीर साभार : dalitmuslims

About the author(s)

मैं एक थियेटर आर्टिस्ट हूं। ट्रेनिंग से एक पत्रकार। नारीवाद और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर लिखना पसंद है। जातिय अभिजात्यपन और ब्राह्णवाद से मुक्त नारीवाद की प्रबल समर्थक।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित लेख

Skip to content