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एक ऐसी महिला, जो की न सिर्फ क्रांतिकारी विचारों की थीं, बल्कि आगे चलकर एक प्रभावशाली नेता बनकर उभरी। हम बात कर हैं भारत की प्रथम स्वास्थ्य मंत्री के बारे में। जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में देश की स्वंतत्रता के बाद बनी पहली महिला स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी बीबीजी अमृत कौर। अमृत २ फ़रवरी 1889  में लखनऊ में जन्मी अपने माता-पिता की आठवीं पुत्री थीं। उनके पिता पंजाब के कपूरथला राज्य के एक राजसी घराने के सदस्य थे, राजा हरनाम सिंह और माँ रानी प्रिसिला कौर साहिबा की बेटी अमृत कौर वाकई कुछ बड़ा करने के लिए जन्मी थीं। शेरबोर्न स्कूल ऑफ़ गर्ल्ज़ डोरसेट इंग्लैंड में स्कूल की पढ़ाई करने के बाद ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से कॉलेज की तालीम पूरी करके अमृत वापस भारत लौट आईं। भारत लौटने के बाद ही, उन्हें भारतीय स्वंतत्रता आंदोलन में दिलचस्पी आई और एक सच्चे नागरिक की तरह उन्होंने जीवन का संघर्ष देश की आज़ादी और बढ़ोतरी के नाम न्योछावर कर दिया।

अमृत सबसे ज़्यादा महात्मा गांधी की विचारधारा और दृष्टिकोण से प्रभावित रही, वह पहली बार महात्मा गाँधी से साल 1919 में बॉम्बे में मिली। अमृत अंग्रेजी हुकूमत का पुरज़ोर विरोध तो करती ही आ रही थी, लेकिन जब जलियावाला बाग नरसंहार हुआ तब वो ब्रिटिश शासन की सबसे कड़ी आलोचक बनकर सामने आयी। अमृत ने तब औपचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी में सदस्यता ली और स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया। उन्होंने न सिर्फ स्वंतत्रता को एकमात्र मरकज़ बनाया पर सामाजिक सुधार बदलाव पर भी ध्यान केंद्रित किया। अमृत हर रूप से एक कुशल महिला थी, अच्छी तालीम और नेतृत्व कुशल के कारण वह अखिल भारतीय महिला सम्मेलन 1927 की सह संस्थापक भी रही और आगे चलकर साल 1930 में वह पहले इसकी सेक्रेटरी बनीं और साल 1933 में वह इसकी प्रेसिडेंट भी रहीं।

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साल 1930 महात्मा गांधी द्वारा आयोजित दांडी मार्च में अमृत ने भी भाग लिया, जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बन्दी बनाया। गाँधी जी से प्रेरित रही अमृत ने साल 1934 में कुछ समय गांधी आश्रम में व्यतीत किया और अपना भव्य जीवन छोड़ सादा जीवन वहां गुज़ारा। अमृत के सियासी जीवनकाल में जितना हो सका उन्होंने हर गतिविधि में अपना किरदार निडर होकर निभाया। साल 1937 में भारतीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में वह बन्नू (अब के समय में खाइबर पखतूनख्वा) सद्भावना के मिशन पर गईं, जिसके कारण वह एकबार फिर से ब्रिटिश राज की आँखों की किरकिरी बनी और अंग्रेजी हुकूमत ने उनपर राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें कैदी बना लिया। बार-बार लगातार संघर्ष करतीं अमृत कभी भी अज़माइशों से नहीं घबराई और बेख़ौफ़ वो अपनी आवाज़ और बुलंद करती गईं। ब्रिटिश अधिकारियों ने जब समझा की वह हार मानने वालों में से नहीं हैं तब उन्होंने अमृत को अडवाइज़री बोर्ड ऑफ़ एजुकेशन में सदस्य चयनित किया। लेकिन साल 1942 में असहयोग आंदोलन का अटूट हिस्सा बनी। अमृत ने इस सदस्यता से तुरंत इस्तीफ़ा दे दिया, जिसके कारण अंग्रेजी अधिकारियों ने उनपर सुनवाई कर उन्हें एक बार फिर कारावास में रखा। लेकिन फिर भी अमृत के हौसलों ने हार नहीं मानी।

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अमृत ने सबके मत के अधिकार की बात यानी सार्वभौमिक मताधिकार की बात को भी आगे बढ़ाया, उन्होंने लोथियन कमिटी के समक्ष भारतीय मताधिकार और संवैधानिक सुधार पर अपने विचार प्रस्तुत किये और ब्रिटिश संसद की सयुंक्त चयन समिति के आगे भी भारतीय संवैधानिक सुधार की बात को रखा।

अमृत के आत्मविश्वासी व्यक्तित्व के चलते वह अखिल भारतीय महिला शिक्षा निधि संघ की अध्यक्ष भी रही और दिल्ली स्थित लेडी इरविन कॉलेज की कार्यकारी समिति की सदस्य भी रहीं। उनके इसी दृढ़ निश्चयिता के चलते वह साल 1945 और 1946 में लंदन व पैरिस में हुई यूनेस्को कॉन्फ्रेंस में भारतीय प्रतिनिधिमडंल की सदस्य बनकर सम्मिलित हुई। अमृत निरक्षरता और बाल विवाह जैसी कुरीति और महिलाओं के लिए बनाई गई पर्दा प्रथा के खिलाफ़ लगातार काम करती रहीं।

साल 1947 में देश को जब आज़ादी मिली तब अमृत कौर, जवाहरलाल नेहरू के प्रथम मंत्रीमंडल का हिस्सा रहीं, उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय सौपां गया। सविंधान सभा की सदस्य और देश की प्रथम महिला स्वास्थ्य मंत्री बनी, इसी के साथ ही वह मौलिक अधिकारों की उपसमिति की सदस्य और अल्पसंख्यक पर उपसमिति की सदस्य भी रही। वह अपनी आवाज़ सदैव संवैधानिक सुधार और अधिकारों की बात पर बुलंद रखती थीं। इसी कारण वह संविधान के हर पहलू और आयाम पर सक्रिय रहीं। साल 1950 में विश्व स्वास्थ्य सभा की अध्यक्ष रहीं और इस मुकाम तक पहुंचने वाली वह पहली महिला एवं पहली एशियाई रहीं।

अमृत अंग्रेजी हुकूमत का पुरज़ोर विरोध तो करती ही आ रही थी, लेकिन जब जलियावाला बाग नरसंहार हुआ तब वो ब्रिटिश शासन की सबसे कड़ी आलोचक बनकर सामने आयी।

स्वास्थ्य मंत्री होने की भूमिका उन्होंने बखूभी निभाई और अपना हर कर्तव्य पूरी निष्ठा से पूरा किया। उनका सबसे अहम् कार्य रहा दिल्ली में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की स्थापना करना, जिसके लिए उन्होंने कई देशो से जैसे की न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, वेस्ट जर्मनी, स्वीडन एवं यूनाइटेड स्टेट्स से सुरक्षित सहायता प्राप्त करने में सफलता हासिल की। अमृत 14 वर्ष तक इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की अध्यक्ष रहीं और इन्ही वर्षो में रेड क्रॉस सोसाइटी ने कई नए कार्यों की शुरुआत की खासकर ग्रामीण इलाकों में। चेन्नई, मद्रास में अमृत ने टूबरक्यूलोसिस असोसीयेशन ऑफ़ इंडिया एवं सेंट्रल लेप्रोसी टीचिंग एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट की शुरुआत की। इसी बीच अमृत कौर कॉलेज ऑफ़ नर्सिंग और नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ़ इण्डिया की स्थापना भी की गई। अमृत साल 1957 से 1964 तक राज्यसभा की सदस्य रहीं। आजीवन क्रान्ति और शिक्षा को बराबर रखते हुए, एक नए आज़ाद भारत के निर्माण में वह अडिग रूप से कार्यरात रहीं। साल 1963 में अमृत ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस दिल्ली की अध्यक्ष रहीं।

मरणोपरांत भी, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, टूबरक्यूलोसिस असोसीयेशन ऑफ़ इंडिया और सेंट जॉन एम्बुलेंस कॉर्प्स में उनकी अध्यक्षता आज भी कायम है। उन्हें रेने सैंड मेमोरियल अवार्ड से भी नवाज़ा गया। 6 फरवरी 1964 में अमृत कौर का देहांत हुआ पर उनके विचारों का नहीं! अमृत एक सफल नेता, क्रांतिकारी महिला एवं स्वास्थ्य मंत्री रहीं, जिन्होंने अपने औपचारिक कार्यों के अलावा समाज में बेहतर बदलाव एवं कुप्रथाओ के खिलाफ आवाज़ उठाई, वह एक साहसी स्वतंत्रता सेनानी भी रहीं और एक प्रभावशाली राजनैतिक व्यक्तित्व भी, जो की हम सभी को ये बतला गईं की महिलाएं भी बड़े से बड़े आन्दोलनों का संस्थानों का नेतृत्व कर सकती हैं और बखूभी निभा सकती हैं!  

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तस्वीर साभार : jivanihindi

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