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नारीवाद शब्द का मतलब आमतौर पर हम –  समानता या बराबरी जानते हैं। लिंग के आधार पर ग़ैर बराबरी के विरुद्ध एक सोच, एक आंदोलन, एक विचारधारा है ये नारीवाद। सरल शब्दों में कहूँ तो हर वो व्यक्ति जो अपने ज़हन में इस सोच को संजो कर रखता है वह व्यक्ति नारीवादी हुआ। “मैं नारीवादी हूँ” कह देने से हमें तो भले ही अच्छा लगे, लेकिन ज़रूरी नहीं की सामने वाले को भी ये सुनने में उतना ही अच्छा या प्रभावशाली लगे। लोगों को खुद को नारीवादी कहने में इसीलिए हिचक होती है क्यूंकि इस शब्द के बारे जानकारी से ज़्यादा इससे संबंधित तमाम ग़लतफ़हमियां प्रचलित हैं। खैर, मैं एक नारीवादी महिला हूँ और मुझे ये कहने में कोई भी हिचकिचाहट नहीं हैं, क्यूंकि मैं सामने वाले व्यक्ति से इस बात पर संवाद या चर्चा कर सकती हूँ। काश जितना इसे कहना मेरे लिए आसान होता उतना ही इस विचारधारा को भारत में इस्तेमाल में लाना भी उतना ही आसान होता।

एक भारत में कितने भारत

भारत में नारीवादी होना वाकई एक बहुत मुश्किल काम है, मेहनत सिर्फ इस बात को समझाने में लगती हैं की हम गैर बराबरी के खिलाफ हैं। माने कि लड़की अगर खिलखिला कर हँसे तो उसे कोई शुर्पनखा न कहे, ये सामने वाले व्यक्ति को उतना ही सहज लगे जैसे मर्द आमतौर पर गली की किसी टपरी में बैठकर हँसते हैं और पॉलिटिक्स बतियाते हैं।

भारत, एक तरफ़ जहां ग्रामीण भी है तो वहीं दूसरी तरफ़ शहरी भी है। यहाँ की लड़कियां एक ओर तो चाँद तक पहुंची हैं और वहीं दूसरी ओर लड़कियां कोख में ही मार दी जाती है। यहाँ साक्षरता भी है और निरक्षरता भी। यहाँ  देश का एक वर्ग लिव-इन-रिलेशनशिप पर बात करता है तो दूसरा हिस्सा आज भी बाल विवाह जैसी कुप्रथा से जकड़ा हुआ है। यहाँ रूढ़िवादी सोच है और कही किसी हिस्से में थोड़ी सांस भी। यहां आज भी कई के जीवन में पितृसत्ता है तो कुछ के जीवन में आज़ादी। ऐसे देश में नारीवादी होना मुश्किल है।

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संघर्ष है समझाना

जैसे कि मैंने ये बात कही कि मैं ये बात मानती हूँ कि मेरे देश में नारीवादी होना मुश्किल है, मैं तो फिर भी बड़े पहलू पर ये बात रख रही हूँ, अगर मैं ये कहूँ की मेरा किसी रिश्तेदार के घर पर भी नारीवादी होना मुश्किल है तो ज़रा गौर फरमाइए की ऐसा क्यों है। जब मेरी एक दूर की बहन की शादी हो रही थी तो फेरो का समय आया और कन्यादान शुरू हुआ, तब मैं वहाँ से थोड़ा हटकर खड़ी हो गई, जिसे देखकर मेरे एक रिश्तेदार मेरे पास आकर पूछने लगे की कही मैं परेशान तो नहीं। उस वक्त हाँ, मैं परेशान थी तो सिर्फ कन्यादान की रीति से जिसमें औरत को एक वस्तु समझा जाता है। मेरा ये कारण बताते ही वो गुस्से से तमतमा गए और कहने लगे ‘ऐसी नारीवादी बातें मत कहो! ये तो हमारी रस्मे हैं!’ मुझे मन ही मन हंसी आयी और मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

सरल शब्दों में कहूँ तो हर वो व्यक्ति जो अपने ज़हन में इस सोच को संजो कर रखता है वह व्यक्ति नारीवादी हुआ।

उस लम्हे में मैं अपनी नारीवादी विचारधारा को महसूस कर रही थी और जी रही थी और उसी वक़्त ये समझ आ गया कि कैसे पितृसत्ता एक बहुत बड़ी  अड़चन है नारीवाद से सम्बंधित कोई भी बात रखने में।

घर में नारीवादी माहौल

मैं खुद के विशेषाधिकारों को स्वीकार करते हुए ये मानती हूँ कि शायद मेरे लिए नारीवादी विचारधारा रखना किसी रिआयत से कम नहीं हैं, ये मेरा जाति, धर्म, स्थान और जन्म से जुड़ी सुविधाओं का एक परिणाम है। घर पर मेरे पिता जी अक्सर घर के कामों में बराबर हिस्सा लेते हैं और माँ का हाँथ बटाते हैं। एक दिन जब पिता जी घर के बाहर से सूखे कपड़े उठा रहे थे तो एक पड़ोसी ने देखते ही तंज़ कस दिया ‘ओहो बड़ी मदद हो रही है भाईसाहब!’ जिसपर उन्होंने हंस कर कहा ‘जी हाँ बिलकुल!’

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पिता जी ने तो सिर्फ एक रोज़मर्रा के काम में घर के सदस्य की तरह हाँथ बटाया था, जिसे पड़ोसियों ने अपनी पितृसत्तात्मक सोच से मज़ाक बना दिया। शायद उस हर पुरुष के लिए जो अपनी महिला दोस्त का साथ देता है उसकी भावनाओं को समाज की गैर-बराबरी से मिली पीड़ाओं को समझता है उसके लिए भी ये उतना ही मुश्किल होगा।

कितनी सारी ग़लतफहमियां

मेरी एक दोस्त ने एक दिन गुस्से में कहा की ‘मुझे ये औरतें नहीं पसंद जो चूड़ी बिंदी पहनकर पितृसत्ता की बेड़ियोँ को गले से लगाए फिरती हैं!’ मुझे ये बात काफ़ी अजीब लगी और मैंने उससे कहा की तुम बिलकुल उन लोगों जैसे सोच रही हो जो लड़कियों को उनके कपड़ो से आंकते हैं, अगर हम भी ऐसा करने लगे तो हम में और उनमें क्या फर्क रह जाएगा? ज़रूरी नहीं की वो अगर चूड़ी बिंदी पहनती हो तो वो सत्ताहीन हो।  क्या पता वो भी गैर-बराबरी के खिलाफ हो? ऐसे ही पहनावे पर अनुमान लगा लेना तो ठीक नहीं हुआ। अक्सर हमें ग़लतफहमी होती है की सिर्फ वो लड़किया नारीवादी हैं जो मॉडर्न कपड़े पहने या भारी साड़ियां, आम कपड़े पहने लड़की भी नारीवादी हो सकती है, ऐसे में ऊपरी दिखावे की कोई ज़रूरत नहीं।

आज भी कई के जीवन में पितृसत्ता है तो कुछ के जीवन में आज़ादी। ऐसे देश में नारीवादी होना मुश्किल है।

दोस्तों बात सिर्फ यही है की भारत में कई तरह के लोग है सबकी अपनी सोच है, अपनी विचारधारा है, कभी-कभी हर मौके पर नारीवादी होना इस देश में कठिनाईयाँ तो देता है लेकिन ये एक चुनौती भी है कि हम तब भी अडिग रहे अपनी सोच पर। क्यूंकि आखिरकार हमें पता है कि नारीवादी होने में सबका भला है, क्यूंकि नारीवाद हर असमानता के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाता है। भारत में या कही भी नारीवादी होना कई संघर्ष लाता है, लेकिन इन संघर्षों में भी अगर हम अपनी विचारधारा जारी रखने की हिम्मत रखते हैं तो सलाम है हम सभी साथियों के जज़्बे को जो सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि सबके हक़ की बात करते हैं!

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तस्वीर साभार : YourStory

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