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केरल के छेरतला में नंगेली अपने पति चिरुकंदन के साथ रहती थीं। साल 1800 में, जब राजसी शासन चलता था, तब कई तरह के कर वसूले जाते थे। ये ‘कर’ उनकी आमदनी पर केंद्रित नहीं थे बल्कि उनकी ‘नीची जाति’ यानी दलितों पर केंद्रित थे। ब्राह्मण जाति और कई अन्य तथाकथित ऊँची जाति के लोग कई विशषाधिकारों से भरा जीवन व्यतीत करते थे और साथ ही ऊँच-नीच का भेद बना रहे इस कारण कर वसूले जाते थे।

दलित जाति की महिलाओं को अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा यानी कि अपने स्तन को ढकने की अनुमति नहीं थी  और अगर वो ऐसा करती तो उनसे इस बात का कर वसूला जाता था। नंगेली एज़हवा जाति की थीं। उनके  समुदाय को और अन्य निचली जातियां जैसे थिया, नादर और दलित समुदायों को भी इस कर का भुगतान करना पड़ता था। इसे ‘मुलाकरम’ भी कहा जाता था। कपड़ों पर सामाजिक रीति-रिवाज एक व्यक्ति की जाति की स्थिति के अनुरूप थे, जिसका मतलब था कि उन्हें केवल उनके कपड़े पहनने के तरीके से पहचाना जा सके। इस तरह स्तन-कर का उद्देश्य जाति-संरचना को बनाए रखना था। 550 रियासतों में से त्रावणकोर की इस रियासत ने भी (जो कि ब्रिटिश हुकूमत के अंतर्गत आती थी) इस कर को लगाया था।

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नंगेली का साहसी विरोध

नंगेली ने इस बात का पुरज़ोर विरोध किया,  उनके विरोध का तरीक़ा था अपने शरीर को ढकना, बिना स्तन कर भरे। ऐसा कर वसूलना, ब्राह्मणिक पितृसत्ता को दर्शाता था कि केवल ब्राह्मण महिलाओं को शरीर ढकने की ज़रूरत है और अन्य महिलाओं का कोई अधिकार नहीं है, ख़ुद के शरीर पर। नंगेली ने इसबात का विरोध कर साबित किया की ये शरीर उनका है तो नियम भी उनके होंगे और इसे ढकने की इच्छा भी उनकी होगी। उस समय ये साहस तो अतुलनीय था।

जब शासकों के  कर वसूलने वाले अधिकारिओं को इस विरोध के बारे में पता चला कि नंगेली किस तरह ख़ुद को ढककर तथाकथित ऊँची जाति व समुदाय के लोगों और उनके इस मनुवादी ढाँचे को भी चुनौती दे रहीं हैं और किसी भी तरह से स्तन-कर देने से साफ़ मना कर रहीं हैं तब कर वसूलने नंगेली के घर जा पहुंचे। वे एक सुबह आए, उनके स्तनों पर कर लगाने के लिए, उसके आकार और आयामों पर निर्भर करते हुए आंकड़ा बकाया की गणना करने के लिए। लेकिन नंगेली ने तब भी कर का भुगतान करने से इनकार कर दिया और विरोध करते हुए अपने स्तनों को काट कर एक पत्ते पर कर की तरह वसूलने वालों के सामने रख दिया। जिसके बाद नंगेली की मृत्यु बहुत खून बह जाने के कारण उसी दिन हो गई। नंगेली के पति चिरुकंदन का ये अंतहीन दुःख उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ, जिसके कारण चिरुकंदन ने नंगेली की जलती चिता में कूद कर अपनी भी जान दे दी, इस प्रकार देश में पहली बार कोई पुरुष सती बना!

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जारी रहा विरोध

ये विरोध नंगेली ने अपनी अंतिम सांस तक जारी रखा। आखिरकार बाद में  इस जातिवादी व पितृसत्तात्मक कर को हटा दिया गया, लेकिन नंगेली की मृत्यु के बाद, उनके इतने बड़े विरोध के बाद। जिस प्रकार नंगेली को स्वयं पर इतनी हिंसा करनी पड़ी अपनी अस्मिता अपने मान के लिए व बहुत बड़ी बात है, दुःख की बात ये है की केरल के इतिहास में इस बारे में जानकारी नहीं है, और ये घटना भी बहुत कम बयां करी जाती है।

वहीं साल 2016 में एनसीआरटी ने भी सीबीएससी को अपने स्तनों को ढंकने के अधिकार के लिए नादर महिलाओं के संघर्ष पर लिखे  एक अध्याय को हटा देने की मांग तक कर डाली थी। जो कि बाद में सभी पाठ्यक्रमों से हटा दिया गया था। क्योंकि हिन्दू विरोधी कोई भी अध्याय रखना साफ़तौर पर मौजूदा सरकार पर हमला होता। इसतरह इस साहसी घटना की, विरोध की, हमारे इतिहास में जगह नहीं बनने दी गई।

लेकिन नंगेली का ये विरोध आज भी गूंजता है, उनके समुदाय उनके जाति की महिलाओं के दिल में। हम भी नंगेली का ये साहस कभी नहीं भुला सकते। जिसने न सिर्फ  ख़ुद की अस्मिता के लिए अपनी जान दी बल्कि अपनी तरह बाकी की महिलाओं को भी इस निरादर से बचाया।

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तस्वीर साभार : StudentsShow.com

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