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लखनऊ में रहने वाली मरियम कहती हैं कि ‘साल 2016  में मैंने हिजाब पहनना शुरू किया था। तब कॉलेज ख़त्म ही हुआ था। वैसे तो हिजाब पहनने के लिए सबकी अपनी-अपनी वजहें होती हैं। मेरे लिए ये मेरे आध्यात्मिक विकास की ओर एक ज़रूरी कदम था, जिसकी वजह से मैं ऊपरवाले को अपने और क़रीब महसूस कर पाई।’

28 साल की मरियम पेशे से वक़ील हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय तक काम कर चुकी हैं। एक इंसान के तौर पर मरियम की कई ख़ासियत है, जैसे कि एक होनहार वकील, एक नारीवादी और सामाजिक नाइंसाफियों के ख़िलाफ़ एक बुलंद आवाज़। उनकी एक और पहचान है। एक औरत की, ख़ासकर एक मुस्लिम औरत की, जो हिजाब पहनती है।

मरियम आगे बताती है कि ‘तब मेरा करियर शुरू ही हुआ था। मैं एक सीनियर ऐडवोकेट के साथ काम कर रही थी। एकबार एक ज़रूरी डॉक्यूमेंट तैयार करने में मुझसे कुछ गलती हो गई। मुझे पता ही था कि मुझे डांट पड़ेगी। लेकिन मैं हैरान रह गई थी जब मेरे बॉस ने मेरे हिजाब की तरफ़ इशारा करके कहा कि ‘सिर को इस कपड़े से ढककर रखती हो तभी तुम्हारा दिमाग़ काम नहीं करता।’ मुझे  इस बात से बहुत गहरी चोट पहुंची थी।’

मरियम अकेली नहीं हैं जो इस तरह के ‘हिजाबोफ़ोबिया’ की शिकार हुईं हैं। ‘हिजाबोफ़ोबिया’ हिजाब पहनी औरतों के साथ उनके पोशाक और धर्म के आधार पर होनेवाला भेदभाव है। इस्लामोफ़ोबिया की तरह ही वैश्विक स्तर पर मुस्लिम महिलाएं हिजाबोफ़ोबिया की भी शिकार होती आईं हैं। ख़ासकर अमेरिका में 9/11 में हुए हमले के बाद से। फ़्रांस और बेल्जियम जैसे कई यूरोपीय देशों में हिजाब या बुर्क़ा पहनना ग़ैरक़ानूनी है और कई हिजाबी लड़कियों को इस वजह से स्कूल से निकाला भी गया है। इसके अलावा भी यूरोप और अमेरिका में हिजाबियों को शारीरिक आक्रमण और नस्लभेदी गालियों का सामना करना पड़ता है या ये साबित करना पड़ता है कि वे आतंकवादी नहीं हैं। अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन (ACLU) के एक शोध के अनुसार 69 फ़ीसद हिजाबी महिलाओं के साथ ऐसा भेदभाव हुआ है।  

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हिजाबोफ़ोबिया का प्रभाव भारत में भी फैल चुका है। साल 2017 में दिल्ली में एक औरत को सिर्फ़ उसके ‘इस्लामिक कपड़ों’  की वजह से नौकरी नहीं दी गई थी। साल 2018 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की एक छात्रा को उसके हिजाब की वजह से UGC-NET के एग्जाम में बैठने नहीं दिया गया। और पिछले ही साल, जब संगीतकार ए. आर. रहमान की बेटी ख़दीजा एक इवेंट में बुर्क़ा पहनी नज़र आईं थीं, सोशल मीडिया पे कहर छा गया था। ट्रोल्ज़ ने ख़दीजा और उनके पिता पर तरह तरह के इलज़ाम लगाए और गालियां दीं। कुछ लोगों ने एआर रहमान को एक ‘शोषक पुरुष’ बताया, जो ज़बरदस्ती अपनी बेटी को बुर्क़े में क़ैद करके रखता है। कुछ ने ‘जिहादी’, ‘आतंकवादी’ जैसी इस्लामोफ़ोबिक गालियां बरसाईं। कुछ ने तो कहा कि हिजाब या बुर्क़ा भारतीय संस्कृति का हिस्सा ही नहीं हैं!

हिजाब और हिजाबियों पर आक्रमण दोनों तरफ़ से होता है। एक तरफ हैं – धार्मिक कट्टरपंथी, जिन्हें इस्लाम और मुसलमानों से संबंधित हर चीज़ से नफ़रत है। दूसरी तरफ़ हैं – तथाकथित ‘प्रगतिशील’ वर्ग जो कहता है कि हिजाब ‘स्त्री-विरोधी’  है और इसे पहननेवाले क़ैदी या ग़ुलाम से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। पर क्या ऐसा सच है? क्या एक हिजाबी औरत की अपनी मर्ज़ी या अपने ख़्यालात नहीं हो सकते? क्या वो पितृसत्ता की ग़ुलाम है? आइए आज ‘वर्ल्ड हिजाब डे’ के दिन कुछ ग़लतफ़हमियाँ दूर करते हैं। 

पिता एआर रहमान के साथ ख़दीजा रहमान
तस्वीर :यूट्यूब

सिर्फ़ महिलाओं के लिए नहीं है हिजाब

पच्चीस वर्षीय निख़त बताती है कि, ‘हिजाब सिर्फ़ औरतों के लिए नहीं है। इस्लाम में मर्द और औरत दोनों के पोशाक के बारे में बताया गया है। चाहे मर्द हो या औरत, सादे और ढीले कपड़े पहनने का नियम सबके लिए है। इसकी वजह ये है कि हमें खुद पर घमंड न होने लगे और इबादत से हमारा ध्यान न भटक जाए।’

सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग करती निख़त को हिजाब पहनते क़रीब पाँच साल हो गए हैं। वो बताती है कि ‘साल 2015 के जून में मैं पहली बार मक्का गई थी। वहां मेरी मुलाक़ात दुनियाभर की औरतों से हुई जो हिजाब या बुर्क़ा पहनती हों। मैंने सोचा था कि उनकी तरह मैं भी पहनना शुरू करूंगी पर इस बात का डर था कि लोग क्या कहेंगे। फिर कुछ महीने बाद मेरी बेस्ट फ्रेंड ने कहा कि वो हिजाब पहनना शुरू कर रही है तो मैंने सोचा मैं भी उसी के साथ शुरू करूं। हमने एक साथ हिजाब अपनाया और अलहमदुलिल्लाह, ये मेरी ज़िन्दगी का सबसे अच्छा फ़ैसला था।’

निख़त का कहना है उनका हिजाब उन्हें अनुशासन में बांधकर रखता है। उनका मन उनके काम से भटकने नहीं देता। इस संदर्भ में वह कहती है कि, ‘कभी-कभी मुझे भी मन करता है कि मैं दोस्तों के साथ ड्रिंक करूं या देर रात तक पार्टी करूं। पर मेरा हिजाब मुझे याद दिलाता है कि ये बुरी आदत है और मुझे खुद पर काबू रखना चाहिए। मुझे ये एहसास भी दिलाता है कि मुझे अपने दोस्तों के साथ रहने के लिए ड्रिंक करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि मैं जैसी हूं वैसी ही अच्छी हूं। इसपर अमल करना थोड़ा मुश्किल तो है पर मैं हमेशा कोशिश करती हूँ।’

क्या निख़त को इसकी वजह से भेदभाव का सामना करना पड़ा है? इसपर वह कहती है कि ‘अभी तक तो नहीं।  मैं पहले बहुत नर्वस फ़ील करती थी कि हिजाब पहनने की वजह से मुझपर किसी तरह का हमला हो सकता है पर आज तक ऐसा कुछ नहीं हुआ। एक बात तो है कि मैं जहां भी जाती हूं, लोग मुझे घूरते हैं और देश के माहौल में साम्प्रदायिकता के बढ़ जाने की वजह से वो पुराना डर वापस भी आ गया है कि मुझ पर कभी भी कोई भी हमला कर सकता है।’

इसके बावजूद निख़त अपना हिजाब पहनने से नहीं कतराती।  उनका कहना है कि ‘हिजाब मुझे मेरे मज़हब, मेरी पहचान के क़रीब लाया है। मैं इस्लाम के बारे में बहुत चीज़ें जान पाई हूं जो मैं पहले नहीं जानती थी।  मीडिया में इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बहुत ग़लतफ़हमियां दिखाई जाती है, जिसकी वजह से लोगों के मन में हमारे लिए नफ़रत पैदा हो जाता है। फिर भी मुझे मालूम है कि मेरा मज़हब मुझे एक अच्छा इंसान बनने को सिखाता है और मुझे गर्व है कि मैं अपने ईमान की पक्की हूँ।’

हर इंसान को अपने तरीक़े से जीने का, अपने हिसाब के कपड़े पहनने का अधिकार है और मैं वही करती आई हूँ। इसलिए किसी को जाने बिना, उसके अनुभवों से वाक़िफ़ हुए बिना उसे जज करना छोड़ दीजिए।

मेरा हिजाब, मेरी मर्ज़ी। तुमको क्या?

‘यूट्यूब पर वीडियोज़ देखने के बाद मैंने 13 साल की उम्र में हिजाब पहनना शुरू किया।’ 24 साल की पत्रकार, सानिया,  कहती हैं कि ‘मैं भी उन वीडियोज़ की लड़कियों की तरह ‘कूल’ दिखना चाहती थी। इसके अलावा अपने मज़हब को लेकर थोड़ी क्यूरिऑसिटी तो मुझे थी ही। मेरी फ़ैमिली को मेरे इस फ़ैसले से थोड़ा ताज्जुब तो हुआ, पर उन्होंने ज़्यादा कुछ कहा नहीं। ये फ़ैसला मेरा बिलकुल अपना था और मैं इस बात से कतई सहमत नहीं हूं कि हिजाबी औरतें ‘शोषित’ और ‘अनपढ़’ होती हैं, जिन्हें ज़बरदस्ती हिजाब में रखा जाता है। मैं मानती हूँ कि ऐसा बहुत देशों में होता है, जो कि ग़लत है पर ये फ़ैसला एक औरत ख़ुद भी ले सकती है, जैसा कि मैंने और मेरे दोस्तों ने लिया था।’

वहीं समिया अपनी डायरी में लिखती हैं कि, ‘क़ुरान शरीफ़ ने औरतों से कहा है कि हम ‘अपने गुप्तांगों को ढककर रखें और अपने शरीर का श्रृंगार किसी को न दिखाएं’ (सूरा 24:31), फिर क्या हम मुस्लिम औरतों को इतना हक़ नहीं कि अपने मज़हब का पालन करें? क्यों हमारे पोशाक की वजह से हमें समाज में, अपने वर्कप्लेस में भेदभाव सहना पड़ता है? क्या हमें अपने फ़ैसले ख़ुद लेने का हक़ नहीं? हम तो कभी आपके ड्रेस के बारे में टिप्पणी नहीं करते। आप छोटे कपड़े पहनती हैं, वो आपकी मर्ज़ी है। हम आपको कुछ नहीं कहते। फिर हमारे ड्रेस पर आप क्यों दख़लअंदाज़ी करते हैं? मेरे लिए हिजाब साहस और ताक़त का परिचय है। ये मेरे लिए एम्पॉवरिंग है। अगर आप मेरे इस चॉइस की इज़्ज़त नहीं कर सकते तो आप कैसे फ़ेमिनिस्ट हैं?’

हिजाब पहनने के लिए कुछ औरतों को बाहर की दुनिया ही नहीं, अपने परिवारों से भी लड़ना पड़ता है।  मरियम कहती हैं, ‘मेरे पापा और उनके रिश्तेदार मेरे फैसले से बहुत नाराज़ थे। उन्हें लगता था कि मैं उन्हें दिखाना चाह रही हूँ कि मेरा ईमान उनसे ज़्यादा मज़बूत है, जिसकी वजह से मुझ पर घर तोड़ने का इलज़ाम लगा। घर में मेरी मम्मी ही थीं जिन्होंने मेरा समर्थन किया, क्योंकि उन्होंने खुद बहुत देर से हिजाब पहनना शुरू किया था। मैंने फिर भी हिजाब पहनना जारी रखा क्योंकि मुझे इससे आध्यात्मिक तौर पर सुकून मिलता है और मुझे देशभर से ऐसी औरतों से मुलाकात हुई है जो मुझसे अलग होने के बावजूद भी मेरे जैसी हैं।’

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मुझे शक़ की नज़र से क्यों देखते हो?

पिछले महीने अंबर के साथ कुछ ऐसा हुआ था जिसका सामना उन्होंने पहले कभी नहीं किया। तीस साल की ये पीएचडी स्कॉलर बेंगलूरु एयरपोर्ट में सिक्योरिटी चेकिंग करवा रही थीं, जब सिक्योरिटी गार्ड ने उनसे उनका हिजाब उतारने को कहा। ‘मैं हैरान रह गई थी और मुझे बहुत अजीब लगा’, अंबर कहती हैं। ‘मैं कॉलेज के दिनों से हिजाब पहन रही हूं और मेरे साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। ये ज़्यादा कुछ तो नहीं था, फिर भी मुझे बहुत अजीब लगा।’

अंबर के साथ जो हुआ, उसका सामना दुनिया के कई एयरपोर्ट्स में मुस्लिम औरतों को करना पड़ता है।  ‘सिक्योरिटी चेकिंग’ के नामपर उनके कपड़े उतरवाए जाते हैं, बाथरूम तक उनका पीछा किया जाता है या उनके बैग से उनका सामान निकाला जाता है। यूरोप के कई देशों में हिजाबी औरतों को इस तरह शक़ की नज़र से देखा जाता है, जिसके कारण एयरपोर्ट्स में उन्होंने इस तरह का व्यवहार झेलना पड़ता है। 

नेदरलैंड्स में रहती कॉलेज स्टूडेंट यास्मीन बताती है, ‘मैं जिस देश में रहती हूं, वहां मुझे शक़ की नज़र से देखा जाता है। मेरे मज़हब और मेरे शरीर के रंग की वजह से। मैं काफ़ी समय तक एक आइडेंटिटी क्राइसिस से गुज़र रही थी। मुझे इस बात की फ़िक्र रहती थी कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे। फिर जब मैंने अपने मज़हब के बारे में पढ़ना शुरू किया, मुझे इस्लाम के इतिहास में मशहूर औरतों की जीवनी से प्रेरणा मिली। मैं भी उनकी तरह बनना चाहती थी। मुझे अपने मुस्लिम होने पर गर्व महसूस होने लगा और तब से मैंने हिजाब पहनना शुरू कर दिया। अब मुझे अपनी आइडेंटिटी को लेकर कोई शंका नहीं है और मुझे ख़ुद पर नाज़ है।’

‘पीड़िता’, ‘कट्टरपंथी’, ‘आतंकी’, ‘ग़ुलाम’…ऐसे कई लेबल्स थोपे जाते हैं हिजाबियों पर। उन्हें स्टीरियोटाइप करते समय, अपने पूर्वाग्रह उन पर थोपते समय हम कहीं भूल जाते हैं कि वे भी इंसान हैं।  औरतें हैं।  आज़ाद ख़यालों वाली होनहार, ताक़तवर, परिपूर्ण औरतें जिनका अस्तित्व महज़ उनकी पोशाक तक ही सीमित नहीं हैं।’

हमें ज़रुरत है अपने पूर्वाग्रहों को ‘अनलर्न’ करने की। लोगों को स्टीरियोटाइप नहीं इंसानों के तौर पर देखने की। जैसा की ख़दीजा रहमान ने अपने ट्रोल्ज़ से कहा था, “हर इंसान को अपने तरीक़े से जीने का, अपने हिसाब के कपड़े पहनने का अधिकार है और मैं वही करती आई हूँ। इसलिए किसी को जाने बिना, उसके अनुभवों से वाक़िफ़ हुए बिना उसे जज करना छोड़ दीजिए।”

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तस्वीर साभार : Mina News

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