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विज्ञान का काम है नए आविष्कारों के ज़रिये हमें जागरूक और अग्रसर करना, न कि पूर्वाग्रहों और मिथकों  बढ़ावा देकर हमें मानसिक तौर पर अँधेरे में रखना। इसलिए विज्ञान के क्षेत्र में औरतों और यौनिक व सामाजिक अल्पसंख्यकों का होना बेहद ज़रूरी है, ताकि ये महज़ पुरुष-केंद्रित, ख़ासकर श्वेत पुरुष-केंद्रित होकर न रह जाए। वैज्ञानिक तरक्की तभी हो पाएगी जब हम अपने पूर्वाग्रहों के बाहर सोचना और नए दृष्टिकोण अपनाना शुरू करेंगे, क्योंकि वैज्ञानिक प्रगति एक समाज के विकास के लिए बेहद ज़रूरी है।  ख़ासकर स्वास्थ्य और आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में। इन क्षेत्रों में जब तक उन्नति नहीं हो पाती, कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ पाता।  लेकिन विज्ञान की दुनिया समाज से परे नहीं है। और कई बार ये समाज में प्रचलित मिथक और अंधविश्वास मिटाने के बजाय उनसे प्रभावित ही हुआ है, जिसकी कीमत सबसे ज़्यादा औरतों को चुकानी पड़ी है। इसकी वजह है मेडिकल साइंस की दुनिया का हमेशा से पुरुष प्रधान होना और सटीक सेक्स एजुकेशन का उपलब्ध न होना। पुरुष डॉक्टरों ने औरत के शरीर के बारे में अपनी मनगढ़ंत धारणाओं को ‘विज्ञान’ का दर्जा दिया और औरतों को अपने शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों के लिए ‘इलाज’ या ‘एक्सपेरिमेंट’ के तौर पर सजा भुगतनी पड़ी। जब किसी की यौनिकता या यौनिकता की अभिव्यक्ति को ‘बीमारी’ का दर्जा दे दिया जाए तो क्या उसका जीवन स्वाभाविक रह पाता है? बेशक आपका ज़वाब होगा ‘नहीं।’ पर ये एक कड़वा सच है विज्ञान जगत का, जिसने महिलाओं की यौनिक इच्छाओं को ‘हिस्टीरिया’ जैसी बीमारी का नाम

औरत की यौनिकता से पुरुषतांत्रिक समाज डरता है और ये कोई नई बात नहीं है। इसी के चलते इसने महिलाओं की यौनिक इच्छाओं को भी ‘हिस्टीरिया’ बीमारी का नाम दे दिया। प्राचीन मिस्र में माना जाता था कि औरत के शरीर की सारी बीमारियां यूटेरस यानी गर्भाशय से शुरू होती हैं। और किसी औरत को जब हस्तमैथुन से अपनी ‘अत्याधिक यौन इच्छा’ पूरी करने का मन होता है, इसका ये मतलब है कि उसका गर्भाशय अपनी जगह से हिल गया है। हिले हुए यूटेरस को अपनी जगह वापस लाने के लिए कुछ तरीके अपनाए जाते थे, जैसे वैजाइना के पास खुशबूदार चीज़ें रख देना या नाक के पास कड़क गंध वाली चीज़ रखकर छींकें लाना। ग्रीस के प्लेटो ने इस ‘हिले हुए यूटेरस की बीमारी’ का नाम ‘हिस्टेरिकल सफोकेशन’ रखा था। इसी से इसका नाम ‘हिस्टीरिया’ पड़ा, जो 19वीं सदी के डॉक्टर इस्तेमाल करने लगे। 

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साल 1880 में फ्रांस के डॉक्टर ज्यां मार्टिन शार्को हिस्टीरिया पर वैज्ञानिक शोध करने वाले पहले व्यक्ति थे। तस्वीरों के ज़रिये उन्होंने अपने स्टूडेंट्स को समझाया कि हस्तमैथुन और यौनिक सहजता जैसे ‘लक्षणों’ का कारण नर्वस सिस्टम पर पहुंची चोट है। उनके एक छात्र थे जाने-माने मनोवैज्ञानिक, सिगमंड फ्रायड। अपने कार्यकाल में फ्रायड ने शार्को की थ्योरीज़ को आगे बढ़ाया। उनका मानना था कि हिस्टीरिया की वजह  कोई शारीरिक चोट नहीं, बल्कि मानसिक पीड़ा है। फ्रायड मानते थे कि औरतों का मूल्य मर्दों से कम हैं, खासकर इसलिए क्योंकि उनके पास लिंग नहीं है। इसलिए वे मर्दों से नफ़रत और ईर्ष्या करती हैं और मर्दों से संबंध इसलिए बनाती हैं ताकि वे अपने शरीर में लिंग महसूस कर सकें। इसका नाम फ्रायड ने ‘पीनिस एनवी’ या ‘पीनिस एंग्जायटी’ रखा और कहा कि इसका इलाज शादी और बच्चे ही है। यानी किसी भी औरत को अगर यौन इच्छा हो और वो हस्तमैथुन करती हो तो उसे तुरंत शादी कर लेनी चाहिए!

सुनने में ये हास्यास्पद लगता है ज़रूर, मगर विज्ञान के ज़रिये औरतों और उनके शरीर के बारे में ऐसी ग़लतफ़हमियों को जस्टिफाई करना उनके लिए बेहद ख़तरनाक हो सकता है। जैसा कि हुआ था जब इंग्लैंड के डॉक्टर आइज़ैक बेकर ब्राउन ने इस ‘बीमारी’ को ‘जड़ से मिटाने’ का प्रस्ताव किया था।

मेडिकल साइंस आज भी एक पुरुष-प्रधान क्षेत्र है जिसे औरतों पर ही नहीं बल्कि समलैंगिकों और ट्रांसजेंडरों पर नियंत्रण रखने के लिए भी इस्तेमाल किया गया है।

हिस्टीरिया का एक प्रचलित इलाज था ‘मसाज’। डॉक्टर ऑर्गैस्म आने तक मरीज़ के क्लिटोरिस को सहलाते थे। इस ऑर्गैस्म को डॉक्टर ‘हिस्टेरिकल पैरोसिज़्म’ कहते थे और इस ‘मसाज’ का उद्देश्य था महिलाओं से हस्तमैथुन की लत उतारना। दुनिया के पहले वाइब्रेटर का आविष्कार इसी दौरान हुआ था, क्योंकि मरीज़ को ऑर्गैस्म होने तक डॉक्टरों के हाथ थक जाते थे। आज कई औरतें शारीरिक सुख के लिए वाइब्रेटर का इस्तेमाल करती हैं, मगर इसका आविष्कार लंदन के अस्पतालों में इलाज के लिए हुआ था।

आइज़ैक बेकर ब्राउन इस तरीके से सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि इस तरह डॉक्टर इस बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि मसाज से महिलाओं को शारीरिक सुख ही मिल रहा था। अगर इस बीमारी को ख़त्म करना है, तो महिलाओं के क्लिटोरिस को काट देना ज़रूरी है। उन्होंने अपनी सर्जरी क्लिनिक में महिला पेशेंट्स की रज़ामंदी के बग़ैर उनका क्लिटोरिस काटना शुरू कर दिया। इसकी कड़ी निंदा हुई और आइज़ैक को उनकी नौकरी से भी निकाला गया, फिर भी ये प्रथा, जिसे फीमेल जिनाइटल म्यूटिलेशन (FGM) या महिलाओं का ख़तना भी कहते हैं, आज भी कई देशों में प्रचलित है। वजह आज भी यही है कि लड़कियां ‘क़ाबू में’ रहें, अपनी यौन इच्छा को अभिव्यक्त न करें।

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साल 1980 में हिस्टीरिया को ‘डायगनॉस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैन्युअल ऑफ़ मेन्टल डिसऑर्डर्स’ (DSM) से निकाला गया। नए-नए शोधों से पता चला था कि महिलाओं की यौन इच्छा कोई बीमारी नहीं बल्कि स्वाभाविक है। तब फेमिनिस्ट आंदोलन भी ज़ोर-शोर से शुरू हो गए थे और नारीवादियों ने इस बात पर ज़ोर डाला की औरतों को भी यौन सुख का उतना ही हक़ है जितना मर्दों का और वे सिर्फ बच्चे पैदा करने का साधन नहीं हैं।  इसलिए ‘हिस्टीरिया’ को अब बीमारी की तरह नहीं माना जाता, बल्कि पुरुषों की यौनिकता की तरह ही साधारण और स्वाभाविक माना जाता है।

हिस्टीरिया जैसी कोई बीमारी नहीं है, ये हमने आज स्वीकार किया है। फिर भी, मेडिकल साइंस आज भी एक पुरुष-प्रधान क्षेत्र है जिसे औरतों पर ही नहीं बल्कि समलैंगिकों और ट्रांसजेंडरों पर नियंत्रण रखने के लिए भी इस्तेमाल किया गया है। साल 1970 के दशक तक अमेरिका में समलैंगिकता को एक मानसिक बीमारी माना जाता था और समलैंगिकों को ‘इलाज’ के तौर पर बिजली के झटके दिए जाते थे। एलजीबीटीआइक्यू लोगों की ब्रेन सर्जरी करके उन्हें ‘स्वाभाविक’ बनाने की बात भी बहुत पुरानी नहीं है।

विज्ञान का काम है नए आविष्कारों के ज़रिये हमें जागरूक और अग्रसर करना, न कि पूर्वाग्रहों और मिथकों  बढ़ावा देकर हमें मानसिक तौर पर अँधेरे में रखना। इसलिए विज्ञान के क्षेत्र में औरतों और यौनिक व सामाजिक अल्पसंख्यकों का होना बेहद ज़रूरी है, ताकि ये महज़ पुरुष-केंद्रित, ख़ासकर श्वेत पुरुष-केंद्रित न जाए। वैज्ञानिक तरक्की तभी हो पाएगी जब हम अपने पूर्वाग्रहों के बाहर सोचना और नए दृष्टिकोण अपनाना शुरू करेंगे।

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तस्वीर साभार : thenib.com

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