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हमारे देश में औरतों और बच्चों का बलात्कार और शोषण हर रोज़ की बात हो गयी है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक़ यहां हर दिन क़रीब 92 औरतों का बलात्कार होता है। साल 2019 में एक थॉम्पसन रायटर्स सर्वे से ये भी पता चला था कि भारत महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश है। आज निर्भया के गैंगबलात्कार और खून, और देशभर में उसके विरोध में प्रदर्शनों हुए सात साल बीत चुके हैं। पर सवाल आज भी वही है कि, क्या हक़ीक़त में कुछ बदलाव आया है?

औरतें आज भी उतनी ही असुरक्षित हैं जितनी पहले थीं। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि देशभर में फैले हर छोटे बड़े गांवों-कस्बों में। जहां भी पितृसत्ता और लैंगिक असमानता है, वहाँ औरत का शारीरिक शोषण कोई नयी बात नहीं है। निर्भया के बलात्कार के कुछ दिन बाद ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि ऐसी घटनाएं “सिर्फ इंडिया में होती हैं, भारत में नहीं।” यानी महिलाओं का शोषण सिर्फ़ बड़े शहरों में आधुनिकीकरण की वजह से होता है। गांवों और छोटे शहरों में नहीं क्योंकि वहां देश की ‘संस्कृति’ अभी भी ज़िंदा है।

पर क्या ये सच है?

साल 2012 में पूरे भारत में 24, 923 बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे। इनमें से सिर्फ़ 3035 ही ऐसे थे जो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में हुए थे। मतलब बलात्कार सिर्फ बड़े शहरों में होता ये तो गलत है ही, बल्कि जितने महानगरों में होते हैं, उससे सात गुना ज़्यादा गांवों, कस्बों, और छोटे शहरों में होता हैं।

मोहन भागवत जैसे लोगों के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना और ओछे बयान तो हम हंसकर उड़ा सकते हैं। उनकी नीच और संकीर्ण मानसिकता पर टिप्पणी कर सकते हैं। मगर ये बात बिलकुल सच है कि एक औरत के बलात्कार की ख़बर हम तभी जान पाते हैं जब वो किसी बड़े शहर में हुआ हो। दिल्ली मुंबई जैसे शहरों में हुई बलात्कार की घटनाएं ही राष्ट्रीय मुद्दा बन जाती हैं। उनपर चर्चा होती है। सोशल मीडिया पर हैशटैग चलता है और विरोध प्रदर्शन होते हैं। और हर रोज़ देश के हर कोने में जो बलात्कार होते रहते हैं, उनकी ख़बर या तो अख़बार के चौथे या पांचवे पन्ने में दबी रह जाती है या उनके बारे में किसी को पता ही नहीं चलता। इसी को इंग्लिश में ‘अर्बन बायस’ कहा जाता है।

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‘अर्बन बायस’ यानी पत्रकारों और मीडिया कंपनीज़ का ध्यान सिर्फ़ बड़े शहरों में, मिडल क्लास और ऊंची जाति के लोगों के साथ घटी घटनाओं की तरफ़ होना। अपने रिसर्च पेपर ‘Violence Against Women In Indian Newspapers’  में समाजशास्त्री अमैंडा जिल्बर्टसन और निहारिका पंडित बताते हैं कि चार अख़बारों में (दो हिंदी, दो इंग्लिश) 1500 बलात्कार की ख़बरों में से ज़्यादातर ऐसी ही ख़बरें थीं जो बड़े शहरों में घटी हों। सिर्फ इंग्लिश ख़बरों में से 6.6 फ़ीसद और हिंदी ख़बरों में 4.9 फ़ीसद ही छोटे शहरों या गांवों में हुए बलात्कार के बारे में थीं। इसमें इन अखबारों में काम करते लोगों का ‘अर्बन बायस’  साफ़ नज़र आता है।

रिसर्चर जोआना जॉली का कहना है कि निर्भया के केस पर इतना कवरेज इसलिए हुआ क्योंकि वो दिल्ली में रहती थी, मॉल में फ़िल्म देखने गई थी और तथाकथित ‘ऊंची’ जाति की थी। पत्रकारों और एडिटर्स को लगा था कि दिल्ली के संभ्रांत उच्च-शिक्षित मिडल क्लास लोगों तक ये खबर पहुंचनी चाहिए क्योंकि पीड़िता ‘उनके जैसी’ थी, यानी एक खास सामाजिक वर्ग की थी।  टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक पत्रकार का कहना है कि न्यूज़रूम्स में ये बहुत आम बात है। पत्रकार और एडिटर ‘अपने जैसे लोगों’ के साथ हुई घटनाओं को ही ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं। क्योंकि ज़्यादातर पत्रकार भी शहरी, सवर्ण, अपर मिडल क्लास बैकग्राउंड से आते हैं। वे ‘अपने जैसी औरतों’ को कवर करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि ग्रामीण, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, निम्नवर्गीय औरतों की कहानियां अनसुनी रह जाती हैं।

हर रोज़ देश के हर कोने में जो बलात्कार होते रहते हैं, उनकी ख़बर या तो अख़बार के चौथे या पांचवे पन्ने में दबी रह जाती है या उनके बारे में किसी को पता ही नहीं चलता। इसी को इंग्लिश में ‘अर्बन बायस’ कहा जाता है।

साल 2016 में केरला के एर्णाकुलम में एक बलात्कार हुआ था जो निर्भया के केस जितना ही भयावह था। 29 साल की लॉ स्टूडेंट जिशा को उसके घर के अंदर बलात्कार करके मार दिया गया था। उसे बिलकुल वैसे ही मारा गया था जैसे निर्भया की मौत हुई थी, फिर भी इस घटना पर बहुत कम चर्चा हुई। चर्चा भी इसलिए हुई थी क्योंकि जिशा के दोस्तों ने उसके कॉलेज में विरोध-प्रदर्शन किया था। जिशा की सामाजिक परिस्थिति निर्भया से अलग थी। वो एक दलित थी, गांव में रहती थी, गरीब थी, यानी वो ‘हमारे जैसी’ नहीं थी। जिस वजह से उसका बलात्कार निर्भया के बलात्कार की तरह ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ नहीं बना।

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पत्रकार स्मृति सिंह बताती हैं कि, ‘जिन लोगों को हम ‘अपने जैसा’ समझते हैं, उनके लिए एक शब्द है ‘पीएलयू’ यानी ‘पीपल लाइक अस’ है। निर्भया कांड के कुछ महीने पहले दिल्ली में ही एक और बलात्कार केस हुआ था जो निर्भया के केस जितना ही नृशंस था। ये खबर अख़बार के पांचवे या छठे पन्ने के एक छोटे से कोने में आई थी और इस पर चर्चा बिलकुल नहीं हुई। मैंने अपने एडिटर समझाने की बहुत  कोशिश की थी कि इसे तो फ्रंट पेज पर होना चाहिए, मगर उन्होंने मेरी नहीं सुनी। शायद इसलिए कि पीड़िता सड़क पर रहती थी, एक रिक्शा चलानेवाले की बीवी थी और 80 साल की थी। यानी वो ‘पीएलयू’ नहीं थी।“

‘दिल्ली और मुंबई के बाहर भी एक दुनिया है’, पत्रकार प्रियंका दुबे कहती हैं, ‘इन शहरों के बाहर गांवों और क़स्बों में भी बहुत क्राइम होता है और वहां के लोगों को ज़रूरत है कि उनकी कहानियां भी बाहर की दुनिया तक पहुंचे।’

जिस देश में हर 20 मिनट में एक औरत का बलात्कार और शोषण होता है, जहां हर तीसरी औरत यौन शोषण या बलात्कार की शिकार हुई है, हमारी मीडिया को चाहिए कि  वो ज़्यादा से ज़्यादा ऐसे मामले  सामने लाए, चाहे वो देश में कहीं भी हो रहे हों। किसी के साथ भी हो रहे हों। जहां पत्रकारिता के निष्पक्ष रहने की बात की जाती है, वहाँ पत्रकारों का अपने काम से अपने पूर्वाग्रहों को अलग रखना बेहद ज़रूरी  है। अगर पत्रकारिता ‘सिलेक्टिव’ रह जाए और सिर्फ एक ख़ास सामाजिक या आर्थिक तबके के बारे में रिपोर्ट करे, फिर ऐसी मीडिया किस काम की है, जो उन लोगों तक पहुँच नहीं पा रही जिन्हें उसकी सबसे ज़्यादा  ज़रूरत है?

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तस्वीर साभार : csmonitor

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