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एक किसान परिवार में पति-पत्नी का जोड़ा मिलकर दिनभर खेती बारी का सारा काम करते हैं। शाम को जब वे काम करके लौटते हैं तो पुरुष आराम करने चला जाता है और वही औरत रात का खाना बनाने काम और घर के दूसरे कामों में लग जाती है। वैसे ये केवल किसान परिवार की ही नहीं बल्कि हर दूसरे भारतीय परिवार की स्थिति है। फिर वो चाहे शहरी हो या ग्रामीण। हमारे परिवार में पुरुष घर के कामों में कोई दिलचस्पी नहीं लेते।

ऐसे में सवाल आता है कि आख़िर पुरुषों के ऐसे व्यवहार की वजह क्या है? इस सवाल का ज़वाब है – हमारा पितृसत्तात्मक समाज। वो जेंडर के खाँचे में इंसान को उनके लिंग के आधार पर ‘महिला’ और ‘पुरुष’ के दो खाँचों में बाँटकर उनके विशेषाधिकार तय करता है। आइए हम समाज के दिए विशेषाधिकार की परतों को खोलकर उसे समझने की कोशिश करें –

भारतीय समाज एक पितृसत्तात्मक समाज है, जो पुरुषों को श्रेष्ठ मानता है। इसीलिए उसने बक़ायदा अपने रचना में पुरुषों के लिए ख़ास विशेषाधिकार तैयार किए हैं। ये विशेषाधिकार पुरुषों को समाज के संसाधनों पर क़ाबिज़ होने का अधिकार देता है। फिर चाहे वेतन की बात हो या विकास के अवसरों की। इन्हीं विशेषाधिकार के चलते पुरुष खुद को सत्ता के करीब पाता है और खुद को एक विशेष भूमिका में रखता है। एक ऐसा समूह जो दूसरों को कमतर आंकता है।

यही वजह है कि समाज के बनाए पुरुष अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए खुद को विशेष भूमिका जैसे आय जुटाने वाले कामों में ही रखता है। वहीं घर के कामों में वो दिलचस्पी नहीं लेता।

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विशेषाधिकार के चलते पुरुष ख़ुद को इतना श्रेष्ठ मानते है कि वे महिलाओं को मात्र एक भोग की वस्तु समझते है, जिसका उद्देश्य सिर्फ़ पुरुषों की यौनिक इच्छाओं को पूरा करना है।

पुरुष के वो विशेषाधिकार जो उन्हें बलात्कार करना सिखाते है

इन विशेषाधिकार के चलते पुरुष ख़ुद को इतना श्रेष्ठ मानते है कि वे महिलाओं को मात्र एक भोग की वस्तु समझते है, जिसका उद्देश्य सिर्फ़ पुरुषों की यौनिक इच्छाओं को पूरा करना है।  समाजशास्त्री डायना शक्ल पुरुषों के बलात्कार करने की प्रवृत्ति पर एक शोध किया जिसमें उन्होंने पाया कि पुरुष औरतों की हांया को कोई महत्व ही नहीं देते हैं। उनके अंदर केवल जहर भरा, जहर जो इस पितृसत्ता ने उनमें डाला है। ऐसा नहीं है कि इस सोच के लिए सिर्फ़ पुरुष ज़िम्मेदार है, बल्कि इसके लिए पूरा समाज ज़िम्मेदार है जो अक्सर महिला हिंसा की घटनाओं में महिलाओं को दोषी ठहराने की कोई कसर नहीं छोड़ता है।

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इस कड़ी में हम अपने देश के कई नेताओं के भाषण सुन ले, जैसे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव जिन्होंने एक रैली में कहा था ,”लड़के है, गलती हो जाती है”। और भी कई ऐसे नेता है जिन्होंने कभी महिलाओं के पहनावे तो कभी उनके घर के निकलने के समय को बलात्कार जैसे अपराध के लिए महिलाओं को ज़िम्मेदार ठहराया है।

इन्हीं विशेषाधिकार के चलते महिलाओं के वेतन भुगतान के लिए भी उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है। साल 2019 में एक मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स सर्वे के अनुसार, भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में 19 फ़ीसद कम कमाती हैं। एक ही कंपनी में, एक ही स्तर वाले काम करने के बावजूद महिलाओं को कम वेतन मिलता हैं और यह सब केवल हमारे स्टीरीयोटाइप सोच का नतीजा है।

‘लड़की है। साइंस थोड़ी आता होगाइसे तो होम साइंस पढ़ाओ,घर-गृहस्थी में काम आएगा।’

हम अक्सर महिलाओं एक लिए ऐसी धारणा लेकर चलते है। इतना ही नहीं, अक्सर लड़कियों को पढ़ाई में भी आगे बढ़ने नहीं देते, अपनी इस सोच के चलते कि ‘लड़की है, पढ़कर क्या करेगी। उसे तो चूल्हा-चौका ही करना है।’ जब ऐसी सोच से दो-चार होता हूँ तो मुझे राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले के संघर्ष याद आते है, जिसमें उन्होंने लड़कियों के लिए समान शिक्षा के अवसर से अपनी ज़िंदगी बीता दी।  अब सरकार की तमाम योजनाओं के चलते बेशक प्राइमरी शिक्षा में लड़कियों को शामिल किया जाता है। लेकिन अधिकतर जगहों में जैसे-जैसे लड़की बड़ी होती जाती है, उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है।

इस तरह अलग-अलग पैंतरों के ज़रिए पितृसत्तात्मक समाज को बरकरार रखने के लिए पुरुषों के दिए विशेषाधिकार का इस्तेमाल दूसरों के शोषण के लिए किया जा रहा है। जिसे अब जड़ के ख़त्म करने की सख़्त ज़रूरत है। क्योंकि अभी नहीं तो कभी।  

और पढ़ें : पितृसत्तात्मक सोच वाला हमारा ‘रेप कल्चर’ तस्वीर साभार : creativepool

एक करुणा से भरा लेखक,जो इस समाज के लिए लिखता है।
पढ़ना जुनून हैं,केवल किताबें ही नहीं, लोगों को भी।

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