बनारस: हर साल बारिश की तबाही से जूझते इन मुसहर परिवारों की सुध कब ली जाएगी
तस्वीर साभार: रेणु
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बारिश का मौसम आते ही नंदनी और उसके परिवार की नज़रों में डर का मंजर छाने लगता है। यह डर इस तरह का होता है कि इससे ज़्यादा बेहतर उन्हें तपती हुई गर्मी लगती है। नंदनी का परिवार पिछले क़रीब पचीस-तीस साल से बनारस ज़िले के सेवापुरी ब्लॉक के चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती में रहता है। नंदनी के परिवार के लिए गर्मी, सर्दी और बरसात का मौसम का किसी आफ़त से कम नहीं होता है, क्योंकि अभी तक न केवल नंदनी बल्कि इनके बस्ती के किसी भी परिवार को आवास नहीं मिल पाया है।

इस हल्की बारिश के बाद ही नंदनी को अपने परिवार के साथ अपनी झोपड़ी छोड़नी पड़ी। नंदनी के परिवार के लिए हर बारिश एक आफ़त बनकर आती है, जो उन्हें उनके घर से दूर कर देती है। नंदनी बताती है कि इस बार भीषण गर्मी के दौरान उन्होंने अपने परिवार के साथ महुआ के पेड़ के नीचे डेरा डाला था। इन बस्तियों में रहनेवाले लोग बताते हैं कि उनकी कई पीढ़ियों ने इसी तरह बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी।

पीड़ित परिवार, जन्हें बारिश के दिनों में अपनी कच्ची झोपड़ी छोड़नी पड़ती है

बस्ती में रहनेवाली एक और महिला बताती हैं कि बरसात आते ही दिक़्क़त शुरू हो जाती है। पास के पोखरें में पानी भर जाता है, जिससे उन लोगों की झोपड़ी में पानी भर जाता है। उन लोगों के यहां साफ़ पीने के पानी का कोई साधन नहीं है, हमलोग पोखरें के पानी से अपना काम चलाते हैं। बारिश में पूरा पानी एक हो जाता है, सारी गंदगी उसमें मिल जाती है। बरसात में ख़ाली घर की नहीं पीने के पानी की भी दिक़्क़त होती है, जिससे बस्ती के बच्चे भी बीमार पड़ने लगते हैं। मुसहर बस्ती में रहनेवाले लोगों को न तो प्रधान की तरफ़ से कोई मदद मिलती है और न ही सरकार की तरफ़ से।

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हाल ही में, उत्तर भारत में मानसून की शुरुआत होना शुरू हुई है। हल्की आँधी-बारिश के साथ अब मौसम ने करवट लेनी शुरू की है। मौसम की ये करवट कुछ परिवारों के बहुत सुकून देने वाली है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि ये मौसम की करवट बहुत से परिवारों के लिए किसी बड़ी समस्या से कम नहीं है। जैसे, नंदनी के परिवार को बारिश की शुरुआत होते ही अपने परिवार के साथ अपनी झोपड़ी को छोड़कर सड़कों के किनारे जाना पड़ता है। नंदनी का परिवार अकेला नहीं है जो हर साल बारिश के मौसम में इन चुनौतियों का सामना करता है। इस बस्ती में रहनेवाले क़रीब पचीस से तीस परिवार को कभी भीषण गर्मी तो कभी बरसात की वजह से अपने परिवार को लेकर यहां-वहां भटकना पड़ता है।

ये ब्लॉक, वाराणसी ज़िले का है। वह वाराणसी ज़िला जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और पिछले सात-आठ सालों से जहां से देशभर के लिए अलग-अलग विकास योजनाओं की घोषणा जाती है। लेकिन अफ़सोस इस ज़िले में रहनेवाले ये लोग आज भी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। ग़रीबों को आवास देने के सपने से प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत की गई थी, जिसमें यह लक्ष्य रखा गया था कि 2022 तक समाज के हर ज़रूरतमंद परिवार को सरकार आवास उपलब्ध करवाएगी पर ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और भी बया करती है।  

नंदनी के परिवार को बारिश की शुरुआत होते ही अपने परिवार के साथ अपनी झोपड़ी को छोड़कर सड़कों के किनारे जाना पड़ता है। नंदनी का परिवार अकेला नहीं है जो हर साल बारिश के मौसम में इन चुनौतियों का सामना करता है। इस बस्ती में रहनेवाले क़रीब पचीस से तीस परिवार को कभी भीषण गर्मी तो कभी बरसात की वजह से अपने परिवार को लेकर यहां-वहां भटकना पड़ता है।

और पढ़ें:  हर बुनियादी सुविधाओं से दूर, किस तरह का जीवन जीने को मजबूर हैं मुसहर समुदाय

इतना ही नहीं आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी ज़िले के इस सेवापुरी ब्लॉक को साल 2020 में नीति आयोग ने एक मॉडल ब्लॉक बनाने के लिए गोद लिया, जिसमें यह तय किया गया कि इस ब्लॉक के 87 गाँवों में सभी सरकारी योजनाओं को सौ प्रतिशत लागू किया जाएगा। पिछले दो सालों में मॉडल ब्लॉक बनाने के नाम पर काफ़ी बजट पास हो चुके होंगें और कई बड़ी बैठक भी हुई होंगी, लेकिन बाक़ी सुविधाएं तो छोड़ दीजिए इन बस्तियों में आवास और साफ़ पीने के पानी जैसे अभावों तक को दूर नहीं किया गया है।

सरकार समान विकास का दावा तो करती है, लेकिन जब भी बात हाशिए पर रहने को मजबूर समुदायों की आती है तो सरकार के सारे वादे और इरादे खोखले मालूम होते हैं। अगर हम इस जाति की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति देखें तो यह वह वर्ग है जहां आज भी ग़रीबी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव वैसे ही कायम है जैसे कुछ दशक पहले था।

ये विकास के नाम पर बढ़ते अपने देश और समाज के लिए शर्म का विषय है कि आज भी गाँव की इन बस्तियों में रहनेवाले हज़ारों परिवार और लाखों लोग, अपने मौलिक अधिकार से वंचित हैं। शिक्षा-रोज़गार तो क्या पीने के पानी, सिर पर पक्की छत और दो वक्त के लिए भी मज़दूरी करने को मजबूर इन मुसहर बस्तियों की कोई सुध लेनेवाला नहीं है। इस बस्ती में कई पीढ़ी के लोगों ने अपनी ज़िंदगी ऐसे ही अभाव में गुज़ार दी, जिसके चलते अब इन लोगों इसे अपनी नियति मान लिया है।

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तस्वीर साभार: सभी तस्वीरें रेणु द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं

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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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