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एक छोटे से गाँव में रहने वाली लीलावती ने अपनी आधी ज़िंदगी घरेलू हिंसा से घुटते और समझौता करते गुज़ार दी। शादी से पहले मायके में कभी शराबी पिता तो कभी शराबी भाई की हिंसा का शिकार हुई और शादी के बाद शराबी पति की। दूसरों के खेतों में मज़दूरी करने वाली लीलावती ने अपनी बेटी के लिए ये तय कर लिया था कि वो उसे इतना सशक्त बनाएगी कि उसे कभी ऐसी हिंसा का सामना न करना पड़े। एकदिन जब शराबी पति ने बेटी के साथ बलात्कार करने की कोशिश की तो लीलावती ने बिना हिचके उसकी पिटाई करते हुए पुलिस में शिकायत की। इतना ही नहीं, उसने बक़ायदा अपने पति से तलाक़ लिया और बेटी के साथ शहर आ गयी। बरसों से हिंसा सहती आ रही लीलावती ने कभी किसी को ज़वाब नहीं दिया लेकिन बेटी के लिए उसने वो वादा खुद से किया उससे वो न केवल अपनी के बेटी के लिए बल्कि खुद के लिए भी सशक्त रूप से खड़ी हुई।

वहीं मुंबई में रहने वाली माही ने पत्रकारिता के क्षेत्र को चुना, जिसे उसके घर में महिलाओं के लिए सही क्षेत्र नहीं समझा जाता था। उसने अपनी जीवनसाथी लक्ष्मी का हाथ थामा तो घर वालों ने माही से सारे रिश्ते ख़त्म कर लिए। माही और लक्ष्मी ने अपनी अलग दुनिया बसाई और गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल शुरू किया।

कानपुर की शैली होममेकर है। घर को सँभालना-संवारना उन्हें पसंद है। बेहद साधारण परिवार की शैली की कहानी तब असाधारण बनी जब उन्होंने अपनी शादी के मंडप पर दहेज की माँग बढ़ने पर शादी से इनकार कर दिया। इसके बाद उनकी शादी राहुल से हुई। शैली ने बच्चे पैदा नहीं करने का निर्णय लिया और अपने फ़ैसले पर अड़ी रही। नतीजतन शादी टूट गयी लेकिन शैली के हौसले नहीं टूटे और शैली ने अपने अनुभवों को लिखना शुरू किया। आज वो एक सफ़ल लेखिका है और अपनी गोद ली हुई बच्ची गुड़िया के साथ बेहद खुश है।

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लीलावती, माही और शैली हमारे समाज के तीन अलग-अलग तबकों से ताल्लुक़ रखती है। सभी की पृष्ठभूमि और परिवेश एक-दूसरे से बेहद अलग भी है। लेकिन जो एकबात इन सभी में समान है वो है इनकी सशक्त छवि। आज महिला दिवस के दिन मैं सलाम करती हूँ उन सभी महिलाओं का जो अपने लिए खड़े होना सीख रही है, जो अपने लिए फ़ैसले लेना सीख रही है और जो अपने लिए लड़ना सीख रही है।

यों तो महिला दिवस साल में एक़बार आता है। इसदिन अख़बारों और टीवी चैनलों महिलाओं के नामपर ढेरों कार्यक्रम भी होते है। लेकिन इस एक दिन के बाद ये सब ठंडे बस्ते में चला जाता है। ऐसे में ये भी ग़ौर करने वाली बात है कि ये दृश्य हम केवल अख़बारों, टीवी चैनलों या फिर बड़े शहरों में ही देख पाते है। क्योंकि आज भी हमारे गाँव में तीज-त्योहार को ही महिला दिवस माना जाता है, जिस दिन उनके ऊपर घर के कामों के साथ-साथ व्रत-पूजा का अधिकतम बोझ होता है। 

लैंगिक समानता के विषय पर हमें और सजग व संवेदनशील होने की ज़रूरत है और इसके लिए हमें ये समझना बेहद ज़रूरी है कि लैंगिक समानता की शुरुआत कहीं बाहर से नहीं बल्कि हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से अपने घर से होगी।

ऐसे में हमें ये समझना होगा कि महिला दिवस को किसी एकदिन का क़िस्सा बनाने की नहीं बल्कि हर रोज़ का हिस्सा बनाने की ज़रूरत है। क्योंकि जब हम किसी भी ख़ास दिन को मनाने और उसे प्रस्तुत करने के लिए किन्हीं ख़ास माध्यमों और लोगों को चुनते है तो ऐसे में एक बड़ा तबका इससे बेहद पीछे रह जाता है। आज भी हमारे देश की आधी से अधिक जनता गाँव में रहती है। रोज़गार के लिए बेशक शहरों की तरफ़ पलायन बढ़ा है, लेकिन महिलाओं के संदर्भ में कमोबेश हालत जस की तस है। ऐसे में जब लैंगिक समानता, महिला सशक्तिकरण और महिला अधिकार की बात करते है तो इसके लिए हमें ग्रामीण महिलाओं को केंद्र में रखना होगा।

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इसके साथ ही, ज़रूरत है कि हमें समाज के बनाए गये सफलता और सशक्तिकरण के तथाकथित मानक को चुनौती देने की भी। क्योंकि हो सकता है लीलावती आर्थिक रूप से मज़बूत न हो और न शैक्षणिक रूप से। हो सकता है उसने अभी तक घूँघट लेना भी ना छोड़ा हो, पर जिस दिन उसने अपने बेटी के लिए हिंसा को ना कहा और सालों सहती आयी हिंसा को सख़्ती से ‘ना’ कहा, ये उसका सशक्तिकरण है।

अक्सर हम किन्हीं मानकों को महिला अधिकार, लैंगिक समानता या सशक्तिकरण मान लेते है, पर हमें समझना होगा कि महिला किसी एक वर्ग, जाति, क्षेत्र से नहीं आती है। बेशक महिला होना एक पहचान है, लेकिन जब इसमें जाति, शिक्षा, अवसर, रोज़गार और संस्कृति का हिस्सा जुड़ता है तो ये बेहद पेचीदा हो जाता है। इसलिए ज़रूरत है कि हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपने घरों में और आओने आसपास के हिस्सों में सशक्त होती महिलाओं को समझें, सराहे और उनका साथ दें।

जैसा की हर साल की तरह संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस की एक थीम भी रखी जाती है तो इसबार की थीम में भी महिलाओं को उनके अधिकार के लिए जागरूक करना और लैंगिक समानता को केंद्र में रखा गया है। मौजूदा समय में हमें, लैंगिक समानता के विषय पर हमें और सजग व संवेदनशील होने की ज़रूरत है और इसके लिए हमें ये समझना बेहद ज़रूरी है कि लैंगिक समानता की शुरुआत कहीं बाहर से नहीं बल्कि हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से अपने घर से होगी। इसी तरह हम महिला दिवस को सिर्फ़ एक दिन का क़िस्सा नहीं बल्कि रोज़मर्रा का हिस्सा बना पाएँगें।  

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तस्वीर साभार : straitstimes

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